Kundli Tv- वक्री ग्रह क्या वाकई अशुभ फल देते हैं

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लगभग हर दूसरे व्यक्ति की जन्म कुंडली में एक या इससे अधिक वक्री ग्रह पाए जाते हैं तथा ज्योतिष में रुचि रखने वाले अधिकतर लोगों के मन में यह जिज्ञासा बनी रहती है कि उनकी कुंडली में वक्री बताए जाने वाले इस ग्रह का क्या मतलब हो सकता है। वक्री ग्रहों को लेकर विभिन्न ज्योतिषियों तथा विद्वानों के विभिन्न मत हैं। सर्वप्रथम तो यह जानना जरूरी है कि वक्री ग्रह की परिभाषा क्या है। कोई भी ग्रह जब अपनी सामान्य दिशा की बजाय विपरीत दिशा में चलना शुरू कर देता है तो ऐसे ग्रह की इस गति को वक्र गति तथा ऐसे ग्रह को वक्री ग्रह कहा जाता है।


शनि यदि अपनी सामान्य गति से तुला राशि में भ्रमण कर रहे हैं तो इसका अर्थ यह होता है कि शनि तुला से वृश्चिक राशि की तरफ जा रहे हैं, किन्तु वक्री होने की स्थिति में शनि उल्टी दिशा में चलना शुरू कर देते हैं अर्थात तुला राशि से कन्या राशि की ओर, और जैसे ही शनि का वक्र दिशा में चलने का यह समय काल समाप्त हो जाता है, वह अपनी सामान्य गति और दिशा में कन्या राशि से तुला राशि की तरफ चलना शुरू कर देते हैं। वक्र दिशा में चलने वाले अर्थात वक्री होने वाले अन्य सभी ग्रह भी ऐसा ही व्यवहार करते हैं। 

ज्योतिषी वक्री ग्रहों के बारे में मुख्य रूप से अलग-अलग धारणाएं रखते हैं। ज्योतिषियों का एक वर्ग यह धारणा रखता है कि वक्री ग्रह किसी भी कुंडली में सदा अशुभ फल ही प्रदान करते हैं क्योंकि वक्री ग्रह उलटी दिशा में चलते हैं इसलिए उनके फल भी अशुभ ही होंगे।

ज्योतिषियों का एक दूसरा वर्ग मानता है कि वक्री ग्रह किसी कुंडली विशेष में सामान्य रूप से अशुभ फल दे रहा है तो वक्री होने की स्थिति में वह शुभ फल देना शुरू कर देता है। इस धारणा के मूल में यह विश्वास है कि क्योंकि वक्री ग्रह उल्टी दिशा में चलने लगता है इसलिए उसका शुभ या अशुभ प्रभाव भी सामान्य से विपरीत हो जाता है। 
ज्योतिषियों का एक अन्य वर्ग यह मानता है कि अगर कोई ग्रह अपनी उच्च की राशि में स्थित होने पर वक्री हो जाता है तो उसके फल अशुभ हो जाते हैं तथा यदि कोई ग्रह अपनी नीच की राशि में वक्री हो जाता है तो उसके फल शुभ हो जाते हैं। 

ज्योतिषियों का एक अन्य वर्ग है जो यह धारणा रखता है कि वक्री ग्रहों के प्रभाव बिल्कुल सामान्य गति से चलने वाले ग्रहों की तरह ही होते हैं तथा उनमें कुछ भी अंतर नहीं आता। इन विद्वानों का यह मानना है कि प्रत्येक ग्रह केवल सामान्य दिशा में ही भ्रमण करता है तथा कोई भी ग्रह सामान्य से उल्टी दिशा में भ्रमण करने में सक्षम नहीं होता।

इतने सारे मतों और धारणाओं पर तथा अनुभव के अनुसार किसी ग्रह के वक्री होने की स्थिति में उसके व्यवहार में क्या बदलाव आते हैं?

प्रथम तो यह जान लें कि किसी भी वक्री ग्रह का व्यवहार उसके सामान्य होने की स्थिति से अलग होता है तथा वक्री और सामान्य ग्रहों को एक जैसा नहीं मानना चाहिए परंतु यहां यह जान लेना भी आवश्यक है कि अधिकतर मामलों में किसी ग्रह के वक्री होने से कुंडली में उसके शुभ या अशुभ होने की स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ता अर्थात सामान्य स्थिति में किसी कुंडली में शुभ फल प्रदान करने वाला ग्रह वक्री होने की स्थिति में भी शुभ फल ही प्रदान करेगा तथा सामान्य स्थिति में किसी कुंडली में अशुभ फल प्रदान करने वाला ग्रह वक्री होने की स्थिति में भी अशुभ फल ही प्रदान करेगा। अधिकतर मामलों में ग्रह के वक्री होने की स्थिति में उसके स्वभाव में कोई फर्क नहीं आता किन्तु उसके व्यवहार में कुछ बदलाव अवश्य आ जाते हैं। वक्री होने की स्थिति में किसी ग्रह विशेष के व्यवहार में आने वाले इन बदलावों के बारे में जानने से पहले यह जान लें कि नवग्रहों में सूर्य तथा चन्द्र सदा सामान्य दिशा में ही चलते हैं तथा ये दोनों ग्रह कभी भी वक्री नहीं होते।

इनके विपरीत राहू-केतु सदा उल्टी दिशा में ही चलते हैं अर्थात हमेशा ही वक्री रहते हैं इसलिए सूर्य-चन्द्र तथा राहु-केतु के फल तथा व्यवहार सदा सामान्य ही रहते हैं तथा इनमें कोई अंतर नहीं आता। अब बाकी के पांच ग्रहों के स्वभाव और व्यवहार में उनके वक्री होने की स्थिति में अंतर आते हैं।
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