नजरिया: मोदी के सामने फेल हुआ राहुल गांधी का हर दांव!

नेशनल डेस्क (संजीव शर्मा): पीएम नरेंद्र मोदी की सधी हुई रणनीति के आगे नौसिखिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का हर दांव धराशायी हो रहा है। एक माह के भीतर कांग्रेस ने दूसरी बार संसद में मुंह की खाई है। पहले लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव में हुई वोटिंग पर और अब राज्यसभा के उपसभापति के चुनाव में। खास बात यह रही की दोनों ही बार कांग्रेस ने जिस समर्थन के दावे किए उससे कम ही मत मिले।  

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अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में महज 125 वोट पड़े थे और सरकार के पक्ष में 325 वोट गए थे। और आज भी राज्यसभा में सरकार /एनडीए के पक्ष में 125 मत गए जबकि कांग्रेस उम्मीदवार 105 पर जाकर रुक गए। हालांकि दोनों ही बार एनडीए/सरकार की जीत तय थी, लेकिन जो बात  आश्चर्यजनक थी वो थे कांग्रेस के दावे। अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग को लेकर यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा था कि कौन कहता है हमारे पास नंबर गेम नहीं है। हालांकि अविश्वास प्रस्ताव तेलगुदेशम पार्टी ने रखा था लेकिन कांग्रेस ही उसे लेकर ज्यादा सक्रिय थी।

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बाद में सोनिया गांधी के नंबर गेम वाले उस ब्यान की जो हवा सदन के भीतर निकली उसने कांग्रेस को तगड़ा झटका दिया। इसके बावजूद कांग्रेस ने राज्यसभा के उपसभापति का चुनाव लड़ा। हालांकि शुरू में यह खबर आई थी कि एनसीपी की वंदना चव्हान उम्मीदवार होंगी, लेकिन बाद में कांग्रेस ने कर्नाटक से अपने सांसद हरी प्रसाद को मैदान में उतारा। वास्तव में एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार चतुर सुजान हैं। वे यह तो जानते ही थे कि उनका उम्मीदवार नहीं जीतेगा, लेकिन उम्मीदवार वापस लेकर उन्होंने अपने लिए भविष्य की संभावनाएं भी जिन्दा रखी हैं। वे जब चाहें तब पाला बदल सकते हैं। 

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उधर इन दोनों घटनाओं के बाद मोदी-शाह की टीम उत्साह से लबालब है। उन्होंने लोकसभा में तथाकथित महागठबंधन को धत्ता बताने के बाद अब कांग्रेस को राज्यसभा में धूल चटाकर पार्टी का मनोबल ऊंचा रखने में सफलता हासिल की है। इस बहाने अब राफेल जैसे मसले भी नेपथ्य में चले जाएंगे। कांग्रेस वैसे भी लगभग उस मुद्दे से किनारा कर चुकी है। यहां भी जिस तेजी से सरकार ने फ्रांस सरकार की स्टेटमेंट जारी करवाई वह सरकार के रणनीतिकारों की कुशलता का परिचायक था। उधर राहुल गांधी का सारा किया धरा बराबर हो चुका है। 

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कार्यसमिति से पुराने चेहरों को बाहर करने के बाद उनसे कुछ नया करने की उम्मीद थी। लेकिन इन दो असफलताओं से निश्चित ही कांग्रेस बैकफुट पर है। इसका सीधा असर कांग्रेस की लोकसभा की संभावनाओं पर पड़ेगा। यह लगभग अब साफ होता जा रहा यही कि अव्वल तो महागठबंधन बनेगा ही नहीं और यदि बना भी तो कांग्रेस की सरमायेदारी में नहीं,और राहुल गांधी के नामपर तो बिलकुल भी नहीं। ऐसे में राहुल गांधी को अपनी टीम पर फिर से सोचना होगा। निश्चित तौर पर जिस राह वे जा रहे हैं वो प्रधानमंत्री पद और सरकार बनाने की तरफ जाती प्रतीत नहीं हो रही। अगर यह तुरंत नहीं किया गया तो बहुत देर हो जाएगी।  

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