उइगर मुसलमानों को अपनी ‘प्रभुसत्ता के लिए खतरा’ मानता है चीन

उइगर मुसलमानों से चीन क्यों डरता है? उइगर मुसलमानों के वैश्विक अभियान से चीन डरेगा या नहीं? उइगर मुसलमानों के वैश्विक अभियान को दुनिया का जनमत कितनी गंभीरता से लेगा? दुनिया का जनमत चीन पर उइगर मुसलमानों के मजहबी अधिकारों को बहाल करने के लिए दबाव बनाएगा या नहीं?

जब काफी समय से चीन में उइगर मुसलमानों के उत्पीडऩ की बात सामने आ रही है तो दुनिया का जनमत इस पर नोटिस तक क्यों नहीं ले रहा है, दुनिया के नियामकों की इस पर चुप्पी क्यों है, दुनिया के मानवाधिकार संगठन खामोश क्यों हैं? क्या दुनिया के नियामक और दुनिया के मानवाधिकार संगठन चीन की शक्ति के सामने विवश और लाचार हैं? अगर सही में दुनिया के नियामक और दुनिया के मानवाधिकार संगठन चीन की अराजकता और हिंसक तानाशाही शक्ति के सामने लाचार और बेबस हैं तो फिर उइगर मुसलमानों के मजहबी अधिकारों और उनके मानवाधिकार की रक्षा कौन करेगा? क्या चीन की वर्तमान कम्युनिस्ट तानाशाही हिटलर की नीति पर चल रही है, यहूदियों की तरह उइगर मुसलमानों का भी हश्र होगा क्या ? 

जानना यह भी जरूरी है कि हिटलर ने अपने विरोधी लाखों यहूदियों को गैस चैम्बर में डाल कर मार डाला था, हिटलर द्वारा यहूदी नरसंहार की कहानियां सुनकर लोग आज भी कांप उठते हैं। कहा यह जाता है कि चीन ने करीब दस लाख उइगर मुसलमानों को जेल में कैद कर रखा है। चीन की कम्युनिस्ट तानाशाही उइगर मुसलमानों को आतंकवादी मानसिकता का पर्याय मानती है, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि उइगर मुसलमानों को चीन की संप्रभुत्ता और एकता व अखंडता के लिए खतरनाक मानती है। सच तो यह है कि चीन की कम्युनिस्ट तानाशाही उइगर मुसलमानों को नियंत्रित करने के लिए उत्पीडऩ और दमन के हथकंडे अपना रही है। सैंकड़ों-हजारों उइगर मुसलमानों को फांसियों पर लटकाया गया है, फिर भी उइगर मुसलमानों की मजहबी मानसिकताएं जस की तस बनी हुई हैं, चीन की अराजक और खौफनाक शक्ति के सामने दुनिया के नियामक और जनमत खामोश ही रहते हैं। 

उइगर मुसलमानों ने खींचा ध्यान
उइगर मुसलमानों की कैद संबंधी खबर तो काफी समय से ध्यान खींच रही थी पर उइगर मुसलमानों के वैश्विक संगठनों ने जब अभियान शुरू किया तब से उइगर मुसलमानों के प्रति सहानुभूति बढ़ी है। खास कर सोशल मीडिया पर हैशटैग मीटू उइगर नाम से अभियान चला है। सोशल मीडिया पर इस अभियान के तहत दुनिया भर के उइगर मुसलमान चीन में रहने वाले अपने रिश्तेदारों की खोज कर रहे हैं और चीन से अपने रिश्तेदारों के जिंदा होने के सबूत मांग रहे हैं। इस अभियान से कहीं न कहीं चीन भी सकते में है, वह भी अपनी अंतर्राष्ट्रीय जिम्मेदारी को महसूस कर रहा है, उसे अपनी मानवाधिकार संबंधी छवि की ङ्क्षचता जरूर सता रही होगी। 

कुछ दिन पूर्व ही तुर्की ने चीन में उइगर मुसलमानों के बड़े नेता और शायर अब्दुल रहीम के लापता होने की बात उड़ाई थी, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि तुर्की सरकार के एक अधिकारी ने आशंका जताई थी कि उइगर शायर और संगीतकार अब्दुल रहीम की मौत हो गई है। तुर्की की यह आशंका जब चीन तक पहुंची तब चीन ने अब्दुल रहीम की स्थिति सामने लाने में ही अपनी भलाई समझी थी। अब्दुल रहीम का वीडियो जारी कर चीन ने दुनिया को बताया था कि अब्दुल रहीम जिंदा है।

उइगर मुसलमानों के वैश्विक संगठनों ने अब्दुल रहीम के जिंदा होने पर खुशी तो जताई पर यह कहने से भी पीछे नहीं रहे कि लाखों उइगर मुसलमान कहां हैं, चीन ने इन्हें किन जेलों में रखा है, इनके मानवाधिकार की सुरक्षा क्यों नहीं की जा रही है? संयुक्त राष्ट्रसंघ की एक समिति ने रहस्योद्घाटन किया था कि चीन में दस लाख उइगर मुसलमान जेलों में बंद हैं। चीन ने पहले पैंतरेबाजी दिखाई थी पर फिर स्वीकारा था कि उइगर मुसलमानों को शैक्षणिक शिविरों में रख कर मानवता का पाठ पढ़ाया जा रहा है, इन्हें कम्युनिस्ट शासन में रहने के लिए तौर-तरीके सिखाए जा रहे हैं। 

जारी है उत्पीडऩ
उइगर मुसलमानों के वैश्विक संगठनों का कहना है कि चीन ने करीब दस लाख उइगर मुसलमानों को गिरफ्तार कर जेलों में डाल दिया है, जहां पर उनका शोषण और उत्पीडऩ जारी है। उइगर मुसलमानों पर इस्लाम छोडऩे और नास्तिक बनने का दबाव डाला जा रहा है। उल्लेखनीय यह है कि चीन एक कम्युनिस्ट तानाशाही वाला देश है जहां पर मजहबी-धार्मिक बंदिशें लगी हुई हैं। जहां भी कम्युनिस्ट तानाशाही होती है वहां पर धर्म और मजहब को गौण कर दिया जाता है। धर्म और मजहब के मानने वालों को जेलों में डाल दिया जाता है। 

कम्युनिस्ट तानाशाही के आविष्कारक कार्ल माक्र्स ने धर्म और मजहब को अफीम कहा था। चीन में भी धर्म और मजहब को गौण करने की ङ्क्षहसक प्रक्रिया चली। चीन कभी बौद्ध विरासत वाला देश था, जहां पर बुद्ध की शिक्षाओं का बड़ा प्रचार था, बुद्ध की हजारों मर्तियां स्थापित थीं। पर माओत्से तुंग की लाल आर्मी की सत्ता स्थापित होते ही चीन में बुद्ध की शिक्षाओं और बुद्ध के प्रतीकों का नामोनिशान मिटा दिया गया। बुद्ध को मानने वाली जनता डर और भय के कारण नास्तिक बन गई। पर उइगर मुसलमानों ने डर और भय को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। कम्युनिस्ट सत्ता के  अराजक और हिंसक उत्पीडऩ के बावजूद उइगर मुसलमान अपनी इस्लामिक पहचान बनाए रखे हैं। 

उइगर मुसलमानों से क्यों डरता है चीन
अब यहां यह प्रश्न उठता है कि उइगर मुसलमान हैं कौन और उनसे चीन को खतरा क्या है? उइगर मुसलमान इस्लाम को मानने वाले हैं और ये तुर्की मूल के हैं। चीन में अधिकतर उइगर मुसलमान शिंजियांग प्रांत में रहते हैं, शिजिंयांग प्रांत की सीमा मंगोलिया और रूस सहित आठ देशों से मिलती है। इनकी संख्या करीब एक करोड़ से ऊपर है। श्ंिाजियांग में रहने वाले उइगर मुसलमान ईस्ट तुर्कीस्तान इस्लामिक मूवमैंट चला रहे हैं। इस मूवमैंट का असली मकसद चीन से अलग होना और चीन की संप्रभुत्ता को खंडित कर उइगर देश की स्थापना करना है। कहने का अर्थ यह है कि जिस तरह का आतंकवाद कश्मीर में चल रहा है, जिस तरह का आतंकवाद रूस के चेचेन्या में चल रहा है उसी तरह का आतंकवाद शिजिंयांग में चल रहा है।

प्रारंभ में तुर्की सहित पाकिस्तान और अफगानिस्तान के कई मुस्लिम आतंकवादी संगठनों ने उइगर मुस्लिम आतंकवादियों को समर्थन दिया था। इनके तार जुड़े हुए थे। पर चीन की कड़ाई के बाद पाकिस्तान ने उइगर मुसलमानों को समर्थन देना बंद कर दिया है। फिर भी दुनिया भर के मुस्लिम आतंकवादी संगठनों के साथ उइगर मुसलमानों के रिश्ते काफी मजबूत बने हुए हैं। खासकर अलकायदा और आई.एस. जैसे खतरनाक आतंकवादी संगठन चीन में इस्लाम का शासन लागू करने के लिए प्रयासरत हैं। 

चीन ने उइगर समस्या का समाधान करने के लिए आबादी संतुलन की नीति अपनाई है। उइगर बहुलता वाले प्रदेश शिंजियांग में हान मूल के चीनियों को बसाने की नीति बनाई है। बड़ी संख्या में हान मूल के चीनियों को बसाया गया है। हान और उइगर मुसलमानों के बीच भयानक दंगे हुए हैं। हान मूल के चीनियों को चीन की कम्युनिस्ट सत्ता से कई प्रकार की रियायतें और सुविधाएं मिली हुई हैं। सरकार के ऊंचे पदों पर हानों की सर्वश्रेष्ठता सुनिश्चित है। यह भी सही है कि हान मूल के चीनियों की संख्या बढऩे से उइगर मुसलमानों की ङ्क्षहसा और आतंकवाद पर थोड़ा नियंत्रण तो लगा है, उइगर मुसलमानों की विघटन नीति को चुनौती मिली है। 

चीन और उइगर दोनों गुनहगार की श्रेणी में खड़े हैं। करीब दस लाख उइगर मुसलमानों को कैद में रखना भी स्वाभाविक नहीं है। उइगर मुसलमानों की विघटनकारी भूमिका भी स्वीकार नहीं की जा सकती है। चीन की संप्रभुत्ता भी एक विचारणीय विषय है। दुनिया के उइगर मुसलमानों के संगठनों को भी चीन की संप्रभुत्ता हनन की स्वीकृति-समर्थन संभव नहीं है। अगर उइगर मुसलमान अपने मानवाधिकार की सुरक्षा चाहते हैं तो फिर उन्हें चीन की संप्रभुत्ता का सम्मान करना चाहिए। फिर भी उइगर मुसलमान हिंसा और विघटन की प्रक्रिया से विरक्त नहीं हुए तो फिर उनका हश्र यहूदियों जैसा भी हो सकता है,क्योंकि चीन की कम्युनिस्ट तानाशाही दुनिया के नियामकों और मानवाधिकार संगठनों की परवाह कहां करती है। चीन की कम्युनिस्ट तानाशाही पहले ही हजारों उइगर मुसलमानों को फांसी पर लटका चुकी है। दुनिया के नियामकों को चीन के साथ ही साथ उइगर मुसलमानों को भी शांति और सद्भाव का पाठ पढ़ाने के लिए आगे आना चाहिए।-विष्णु गुप्त

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