Kundli Tv- तुलसी पर इस सामान को चढ़ाते हुए जपे ये मंत्र, परेशानी होंगी कम

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हिंदू धर्म में तुलसी यानि तुलसी के पौधे को बहुत महत्व दिया जाता है। मान्यताओं के अनुसार जो भी श्रद्धा से तुलसी की पूजा करता है उसको सभी देवी-देवता की कृपा प्राप्त होती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हिंदू धर्म में तुलसी का पौधा एकमात्र पूजनीय और पवित्र पौधा है। इसमें इससे संबंधिक कई उपाय भी बताए गए हैं। अगर कोई व्यक्ति इन उपायों को पूरी निष्ठा से करे तो कुंडली के दोष और दुर्भाग्य से बचा जा सकता है। तो आईए जानते हैं तुलसी के कुछ ऐसे ही उपायों के बारे जिससे बुरे समय को दूर किया जाता है। 
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पहला उपाय
हिंदू धर्म मेंएक माह में दो एकादशी आती हैं। एक कृष्ण पक्ष में और दूसरी शुक्ल पक्ष में। इन दोनों एकादशियों पर भगवान विष्णु की विशेष पूजा करने के साथ ही तुलसी की भी पूजा करें। तुलसी की पूजा में दीपक जलाएं। 

इसके साथ इस विशेष मंत्र का जाप करने से समृद्धि का वरदान 1000 गुना बढ़ जाता है। रोग, शोक, बीमारी-व्याधि आदि से छुटकारा मिलता है। 
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मंत्र-
महाप्रसाद जननी, सर्व सौभाग्यवर्धिनी
आधि व्याधि हरा नित्यं, तुलसी त्वं नमोस्तुते।। 

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तुुलसी को महीने में कम से कम दो बार सुहाग का सामान जैसे कुमकुम, आभूषण, बिंदी, चूड़ियां, लाल साड़ी या चुनरी आदि चीजें ज़रूर चढ़ाएं। इसके बाद तुलसी को कच्चे दूध और मिठाई का भोग लगाएं। पूजा के बाद ये चीजें किसी गरीब सुहागिन को दान करें। इस उपाय से दुर्भाग्य दूर हो सकता है और घर में सुख-समृद्धि बढ़ सकती है।
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ज्योतिष शास्त्र के साथ वास्तु शास्त्र के अनुसार  में तुलसी का गमला घर में रखना अच्छा माना जाता है। इसे आंगन में या छत पर रखने से घर के कई दोष दूर होते हैं। 

अगर संतान जिद्दी है तो तुलसी का गमला पूर्व दिशा में रखें और संतान से तुलसी की पूजा करवाएं। संतान को रोज तुलसी के पत्तों का सेवन करवाएं। इससे संतान का स्वभाव शांत हो सकता है।
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रोज सुबह तुलसी को जल चढ़ाएं और शाम को तुलसी के पास दीपक जलाएं। इस उपाय से बुरा समय दूर हो सकता है।

घर में बाल गोपाल को जब भी भोग लगाएं तो उसमें तुलसी के पत्ते जरूर डालें। एेसा माना जाता है कि अगर भोग में तुलसी के पत्ते होने पर ही भगवान भोग स्वीकार करते हैं।
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पुराणों में तुलसी को भगवान विष्णु की पत्नी कहा गया है। मान्यता है कि श्रीहरि ने छल से तुलसी का वरण किया था। इसलिए श्रीहरि को पत्थर हो जाने का शाप मिला और श्रीहरि ने शालिग्राम रूप लिया। शालिग्राम रूप में भगवान विष्णु की पूजा बिना तुलसी के स्वीकार नहीं की जाती। 
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