Kundli Tv- इस ऋषि ने राक्षस को बनाया मानव, जानें कौन

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ब्रह्मपुराण की एक कथा के अनुसार प्राचीनकाल की बात है, भरद्वाज नाम से विख्यात एक बड़े धर्मात्मा मुनि थे। उनकी पत्नी का नाम पैठानसी था। वह पतिव्रत धर्म का पालन करती हुई पति के साथ गौतमी के तट पर निवास कर रही थी। एक बार मुनि ने अग्रि और सोम देवताओं के लिए तथा इंद्र और अग्नि देवताओं के लिए खीर बनाई। खीर जब पक रही थी तब धुएं से एक पुरुष प्रकट हुआ जो तीनों लोकों को भयभीय करने वाला था। उसने खीर खा लिया। यह देखकर मुनि ने क्रोधपूर्वक पूछा- तू कौन है, जो मेरा यज्ञ नष्ट कर रहा है?
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ऋषि की बात सुनकर राक्षस ने उत्तर दिया- मेरा नाम हव्यघ्न (यज्ञघ्न) है। मैं संध्या का पुत्र हूं। ब्रह्मा जी ने मुझे वरदान दिया है कि तुम सुखपूर्वक यज्ञों का भक्षण करो। मेरा छोटा भाई कलि भी बलवान और अत्यंत भीषण है। मैं काला, मेरे पिता काले, मेरी मां काली तथा मेरा छोटा भाई भी काला ही है। मैं कृतान्त बनकर यज्ञ का नाश और यूप का छेदन करूंगा।

भरद्वाज ने कहा- तुम मेरे यज्ञ की रक्षा करो क्योंकि यह प्रिय एवं सनातन धर्म है। मैं जानता हूं कि तुम यज्ञ का नाश करने वाले हो तो मेरा भी अनुरोध है कि तुम ब्राह्मणों सहित मेरे यज्ञ की रक्षा करो।
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यज्ञघ्न ने कहा- भरद्वाज! तुम संक्षेप से मेरी बात सुनो। पूर्वकाल में देवताओं और दानवों के समीप ब्रह्मा जी ने मुझे श्राप दिया। उस समय मैंने लोकपितामह ब्रह्मा जी को प्रार्थना करके प्रसन्न किया। 

तब उन्होंने कहा- जब कोई श्रेष्ठ मुनि तुम्हारे ऊपर अमृत का छींटा दे, तब तुम श्राप से मुक्त हो जाओगे। इसके सिवा और कोई उपाय नहीं। ब्रह्मन्! जब आप ऐसा करेंगे तब आपकी जो-जो इच्छा होगी वह सब पूर्ण होगी। यह बात कभी मिथ्या नहीं हो सकती।

भरद्वाज ने फिर कहा- महामते! तुम मेरे सखा हो। अत: जिस उपाय से यज्ञ की रक्षा हो, वह बताओ। मैं उसे अवश्य करूंगा। देवताओं और दैत्यों ने एकत्रित होकर कभी क्षीर समुद्र का मंथन किया था, उस समय बड़े कष्ट से उन्हें अमृत मिला था। वही अमृत मुझे कैसे सुलभ हो सकता है? यदि तुम प्रेमवश प्रसन्न हो तो जो सुलभ वस्तु हो, वही मांगो।
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ऋषि की यह बात सुनकर राक्षस ने प्रसन्नतापूर्वक कहा- गंगा का जल अमृत है। सुवर्ण अमृत कहलाता है।  गाय का घी भी अमृत है और सोम को भी अमृत माना जाता है। इन  सबके द्वारा मेरा अभिषेक करो अथवा गंगा का जल घी और सुवर्ण- इन तीनों वस्तुओं से अभिषेक करो। सबसे उत्कृष्ट एवं दिव्य अमृत है- गौतमी गंगा का जल।
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यह सुनकर भरद्वाज मुनि को बड़ा संतोष हुआ। उन्होंने बड़े आदर के साथ गंगा का अमृतमय जल हाथ में लिया और उससे राक्षस का अभिषेक किया इससे वह महाबली राक्षस शुक्लवर्ण का होकर प्रकट हुआ। जो पहले काला था वह क्षणभर में गोरा हो गया। प्रतापी भरद्वाज ने सम्पूर्ण यज्ञ समाप्त करके ऋत्विजों को विदा किया। इसके बाद राक्षस ने पुन: भरद्वाज से आज्ञा ली और चला गया।
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