NDA में पड़ चुकी है दरार, अमित शाह के नेतृत्व को लेकर घटक दलों के बीच असंतोष

नई दिल्ली (सुनील पांडेय): 5 राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों ने केंद्र में सत्ताधारी दल भाजपा के लिए बाहर ही नहीं अंदर भी परेशानी खड़ी कर दी। एन.डी.ए. के घटक दल इसे अपनी उपयोगिता बढऩे के तौर पर देख रहे हैं और इसमें कोई शक नहीं कि आने वाले समय में उनकी ओर से थोड़ा दबाव भी बढ़ेगा। एक साल के भीतर उपचुनावों में लगातार मिल रही हार और मंगलवार को 5 राज्यों में से हिंदी पट्टी के तीनों प्रमुख भाजपा शासित राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में हुई भाजपा की फजीहत ने मुश्किल में डाल दिया है। इसका असर 4 महीने बाद होने वाले लोकसभा के आम चुनावों पर भी पड़ सकता है। वह भी तब जबकि एन.डी.ए. गठबंधन में दरार पड़ चुकी है और इसकी शुरूआत भी हो चुकी है। 2 दिन पहले ही लोकसभा चुनाव के लिए एन.डी.ए. में सीट बंटवारे में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) को तरजीह नहीं दिए जाने से नाराज चल रहे केंद्र सरकार में मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने इस्तीफा दे दिया है।


अमित शाह के नेतृत्व और काम करने के तौर-तरीकों को लेकर घटक दलों के बीच असंतोष
सूत्रों का कहना है कि पांचों राज्यों के चुनाव के नतीजों ने घटक दलों को बल दे दिया है। इस हार के बाद सहयोगी दलों का तेवर और ज्यादा बदला हुआ दिखेगा क्योंकि अगर भाजपा यहां अपना दबदबा बनाए रखती तो वह दबाव को झटकने में सफल हो सकती थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। लिहाजा अब जाहिर तौर पर भाजपा पर दबाव है कि साथी और न छिटकें। खैर गठबंधन बचाना ही नहीं, बढ़ाना भी राजनीतिक जरूरत है। इसके अलावा भाजपा को अपना रवैया भी थोड़ा बदलना पड़ सकता है।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व और काम करने के तौर-तरीकों को लेकर कुछ घटक दलों के बीच असंतोष भी है। लिहाजा बदले समीकरण के अनुसार घटक दलों की आलोचना भी सहनी पड़ सकती है और असंतुष्टों को मनाना भी पड़ सकता है। इसके अलावा मिशन 2019 के लिए विपक्षी एकजुटता से भिडऩे के लिए भाजपा को अपने कुनबे को एकजुट रखने के लिए दबाव बढ़ जाएगा। सूत्रों की मानें तो लोकसभा चुनावों के लिए अब घटक दल अपनी मनमर्जी की सीट और सरकार से काम करवाने के लिए दबाव भी बनाएंगे, ऐसी संभावना देखी जा रही है।

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