भ्रष्ट नेताओं से मुक्ति का मौका हैं आम चुनाव

आम चुनाव एक तरह से ऐसे पर्व या त्यौहार के रूप में आता है जिसे मनाने से पहले घर और बाहर या दुकान और दफ्तर की अच्छी तरह साफ-सफाई करते हैं ताकि कूड़ा-कचरा न रहे, गंदगी दूर हो और स्वच्छता का वरदान मिले, साथ ही पुरानी बेकार हो चुकी चीजों को बेच कर उनकी जगह नए मॉडल और पहले से अधिक कुशलता के साथ काम करने वाले उपकरण आदि खरीद कर लाते हैं। ये सब इसलिए करते हैं जिससे तन और मन दोनों को खुशी मिले तथा मायूसी और सुस्ती के बजाय ताजगी का एहसास हो।

अगर आम चुनाव भी एक त्यौहार है तो यही मौका है कि हम अपने आसपास और समाज में यह देखें कि बदबू कहां से आ रही है। यह पर्व मनाने का मौका पांच साल में एक बार मिलता है और अगर ढंग से सफाई नहीं हुई और जरा-सी भी गंदगी साफ करने से चूक गए तो अगले पांच साल तक इंतजार करना होगा।

जब ऐसा है तो निकालिए औजार और हथियार ताकि देश का कोई कोना ऐसा न रहे जो साफ होने से बच जाए। आपके सामने अब प्रतिदिन लुभावने वायदों, सौगातों से लेकर सैर-सपाटे और अय्याशी करने के साधन तक पेश किए जाएंगे। समझ लीजिए कि अगर कोई ये सब लेकर आपके पास आता है और आप भली-भांति सोच-विचार किए बिना उसकी बातों में आ जाते हैं तो आप एक ऐसे धोखे का शिकार हो सकते हैं जिसकी भरपाई पांच साल से पहले नहीं होने वाली और आप हाथ मलने व पछताने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते।

विभिन्न राजनीतिक दल, नए पुराने, अलग-अलग मुखौटों के साथ आपके सामने चकरघिन्नी की तरह नाचने से लेकर आपको रिझाने के लिए तरह-तरह के करतब दिखाएंगे ताकि आप उनका एक बार विश्वास कर लें और वे आपके वोट की सीढ़ी पकड़कर वैतरणी पार कर लें।

इस परिस्थिति में जरूरी है कि जब किसी दल का कोई कार्यकत्र्ता या स्वयं उम्मीदवार आपके सामने आ जाए तो आप उससे कुछ सवाल अवश्य पूछें जिनके उत्तर की जांच-पड़ताल आपको इस प्रकार करनी है कि जैसे दही में से मक्खन और छाछ को अलग किया जाता है। सवाल पूछने से पहले आपको तैयारी भी उसी तरह करनी है जैसे किसी इंटरव्यू में जाने से पहले की जाती है। आजकल इंटरनैट और सोशल मीडिया का दौर होने से यह काम बहुत आसान हो गया है और किसी के भी बारे में व्यक्तिगत से लेकर गोपनीय जानकारी तक पलक झपकते आप हासिल कर सकते हैं। 

सम्पत्ति का ब्यौरा
जो प्रत्याशी खड़ा हुआ है, अगर वह पहले से आपके इलाके का सांसद है तो उसके बारे में यह पता लगाइए कि चुने जाने से पहले की तुलना में उसकी धन दौलत, जमीन-जायदाद और रहन-सहन जैसे मकान, बंगला, गाड़ी जैसी चीजों में कितनी बढ़ौतरी हुई है। अगर यह सामान्य लगे तो ठीक वरना सवाल पूछने से मत चूकिए कि इतना जलवा कहां से इकट्ठा किया। जवाब से संतुष्ट हो जाएं तो बेहतर वर्ना यह समझकर कि दाल में कुछ काला है, अपनी जांच-पड़ताल जारी रखें और अपने साथ आसपास के निवासियों को भी इसमें शामिल कर लें। उसके यह कहने पर मत जाइए कि उसने पर्चा भरते वक्त पूरी जानकारी चुनाव आयोग को दे दी है।

यह जांचने के बाद कि उसका कोई आपराधिक इतिहास तो नहीं है और अगर कोई है तो उसे दरवाजे से ही लौटा दीजिए। साम्प्रदायिक दंगों, लड़ाई-झगड़े और मनमुटाव तथा दबंगई में उसके शामिल होने बारे पता चल जाए तो भी उससे दूर से ही दुआ-सलाम कर लीजिए, उसे किसी तरह का भाव देना आपके लिए कष्टकारी हो सकता है। असल में वोट डालना तो महत्वपूर्ण है ही पर उससे भी ज्यादा जरूरी यह तय करना है कि वोट किसे दिया जाए, कहीं पात्र या सुपात्र की जगह कुपात्र को तो हमारा वोट नहीं पड़ गया।

योग्यता देखें, दल नहीं
जरूरी नहीं कि वह किसी राष्ट्रीय या क्षेत्रीय पार्टी का ही उम्मीदवार हो, अगर कोई निर्दलीय परंतु हर प्रकार से आपकी कसौटी पर खरा है तो उसे वोट दीजिए। आम तौर से पर्टियां उन्हें उम्मीदवार बनाती हैं जो किसी भी तरह से आपका वोट ले सकते हैं, चाहे कोई हथकंडे या फरेब या गुमराह या लालच से ही आपको भरोसा दिला दिया हो तो ऐसे व्यक्ति को मतदान से पहले ही नकार देने में भलाई है। कहने का मतलब यह है कि यदि कोई वैज्ञानिक है, शिक्षक है या कोई अन्य प्रोफैशन में कीर्तिमान स्थापित किए हुए है और साथ में अपनी ईमानदारी व लगन से भी आपको प्रभावित कर सकता है तो उसे भी संसद में भेजा जा सकता। है। आम तौर से ऐसे लोग अभी तक तो ज्यादातर हार का ही मुख देखते रहे हैं क्योंकि सभी प्रकार से योग्य होते हुए भी साधन न होने की वजह से वे चुनाव में विजयी नहीं हो पाते।

समाज को बदलना है और देश को तरक्की के पुख्ता रास्ते पर ले जाना है तो संसद में ऐसे लोगों को भेजिए जो बेशक किसी दल से न हों पर योग्य हों। ऐसा होने पर चाहे सत्ता किसी भी दल की हो वह इन लोगों की काबिलियत से देश को वंचित रखने का दुस्साहस नहीं करेगा और ये लोग भी ध्यान रखेंगे कि बिना लाग-लपेट और गलत रास्ता अपनाए देश के हित में सरकार को निर्णय लेने के लिए अपने तर्कों से बाध्य कर सकेंगे। ऐसे दूरदर्शी और विद्वान लोगों को संसद में अपने प्रतिनिधि के रूप में भेजने के लिए यदि वोटरों को आॢथक सहायता भी करनी पड़े तो तनिक भी मत हिचकिए। सही के स्थान पर गलत को चुन लिया तो उसकी भारी कीमत चुकाने को तैयार रहिए और तब आप कुछ कर भी नहीं सकेंगे क्योंकि जब चिडिय़ा चुग गई खेत तो फिर पछताने से कोई फायदा नहीं होगा।

किसान और नौजवान
हमारा देश कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर आधारित होने के कारण किसान के लिए यह समझना जरूरी है कि वह किसे वोट दे रहा है। कम से कम ऐसे उम्मीदवारों से तो दूर ही रहिए जो कर्ज माफी के वायदे से आपके वोट हथियाना चाहते हैं। इसके विपरीत यदि कोई दल या प्रत्याशी आपके सामने यह योजना रखता है कि किस प्रकार खेती करना फायदे का सौदा है और टैक्नोलॉजी और खेती के उन्नत तरीके अपनाकर किसान खुशहाल हो सकता है और संसद में आपको वे सब साधन उपलब्ध करवाने के लिए सरकार को मजबूर कर सकता है जिनसे आमदनी बढ़ सकती है तो ऐसे उम्मीदवार को वोट देने में कोताही मत कीजिए।

गांव-देहात में जब भी कोई उम्मीदवार आपका वोट मांगने आए तो उससे प्रश्न कीजिए कि उसको खेतीबाड़ी, पशुपालन, सिंचाई और बीज तथा कीटनाशक की कितनी जानकारी है और वह आपको किस तरह से आश्वस्त कर सकता है कि चुने जाने पर वह आपकी आवाज बनेगा। क्या वह आपको चौबीस घंटे बिजली पहुंचाने की कोई प्रणाली स्थापित करवाने की उम्मीद पूरी कर सकता है, आपके इलाके में शिक्षा की सुविधाएं और रोजगार के साधन पैदा होने की संभावना के बारे में उसके पास क्या योजना है, यह उससे जाने बिना उस पर यकीन मत कीजिए।

हमारे देश में जनसंख्या कुछ इस हिसाब से बढ़ती है कि हर चुनाव में करोड़ों लोग पहली या दूसरी बार मतदान करते हैं। युवाओं को चाहिए कि वे उम्मीदवारों से सवाल करें कि उनकी शिक्षा और फिर व्यवसाय या रोजगार मिलने की व्यवस्था करने की उनके पास कोई योजना है तो वह विस्तारपूर्वक उन्हें समझाएं। जाहिर है बहुत कम उम्मीदवार इन सवालों के व्यावहारिक जवाब दे पाएंगे क्योंकि अभी तक यह होता रहा है कि नेताओं के लिए पढ़ा-लिखा होना जरूरी नहीं समझा जाता और इसलिए वे कभी भी युवाओं की सोच के करीब नहीं पहुंच पाते।

इस बार युवाओं को वोट देने से पहले यह सुनिश्चित कर लेना होगा कि उम्मीदवार पढऩे-लिखने के नाम पर गोल तो नहीं है, वह अपनी दबंगई से तो आपको प्रभावित नहीं कर रहा या फिर धौंस तो नहीं जमा रहा या ख्याली पुलाव तो नहीं पका रहा। कुछ दल ऐसे लोगों को उम्मीदवार बनाने से युवाओं को भरमा सकते हैं जिनकी छवि चाहे गुंडागर्दी की हो लेकिन युवाओं के वोट उनकी झोली में डाल सकते हों, तो इनसे सावधानी बरतनी होगी। इनमें देशविरोधी नारे लगाकर अपनी नेतागीरी की धाक जमाने की कोशिश करने वालों की पहचान करनी आवश्यक है। युवा वोट डालने से पहले इन सब बातों पर गम्भीरता से विचार करें, तब ही सही निर्णय कर पाएंगे।

कानून और समाज
इस चुनाव में वोट डालने से पहले यह भी जांच पड़ताल के दायरे में रखिए कि उम्मीदवार का कोई आपराधिक रिकॉर्ड न हो बल्कि उसे यह भी समझ हो कि कैसे कानून बनें जिनसे समाज में न्यायपूर्ण व्यवस्था हो। उनसे पूछिए कि अदालत में सजा मिलने के बावजूद अपराधी को सजा देने पर अमल करने में वर्षों क्यों लग जाते हैं। कानून के कमजोर प्रावधानों का लाभ उठाने में उस्ताद वकीलों को ऐसा करने से रोकने के लिए उम्मीदवार किस तरह कानून को न्याय सम्मत और तुरंत उस पर अमल किए जाने लायक बनाने के लिए क्या कदम उठाएगा, यह भी समझिए।

रिश्वतखोरी और आर्थिक भ्रष्टाचार से निपटने के लिए उम्मीदवार से विस्तारपूर्वक योजना बताने के लिए कहिए तथा उसका यह खुलासा करना और आश्वस्त करना भी जरूरी है कि वह चुनाव इसलिए नहीं लड़ रहा कि चुने जाने के बाद धन-दौलत कमाना और सत्ता के नशे में चूर हो जाना उसका मकसद है बल्कि वास्तव में वह समाज से अशिक्षा, बेरोजगारी और गरीबी दूर करना चाहता है और इसके लिए उसके पास एक नहीं, अनेक ठोस योजनाएं हैं जिन पर अमल होने से देश तेज गति से विकसित देशों की कतार में अपनी जगह बना सकता है।

एक बात यह भी ध्यान में रखनी होगी कि राष्ट्रवाद केवल यह है कि हमारा देश दूसरे देशों से विकास के मामले में कैसे आगे रह सकता है न कि यह कि हमारे पूर्वजों ने देश को आजादी दिलाने में योगदान किया या देश की प्राचीन संस्कृति या भारतीयता को मजबूत करने में योगदान किया और पूरे विश्व में उसका परचम लहराने का काम किया। आज का वोटर इन बातों से बहुत आगे की सोच रखता है, इसलिए इस चुनाव में तो कोई दल या उम्मीदवार यह उम्मीद तो बिल्कुल न रखे कि वह बहलाने, फुसलाने में कामयाब हो जाएगा क्योंकि यह जो जनता है न, वह सब जानती है, उसे केवल जागरूक होना और अपने मताधिकार का सही इस्तेमाल करना बाकी है।-पूरन चंद सरीन

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