Kundli Tv- JANMASHTAMI: इस अनोखे अंदाज़ से खुश करें कन्हैया को

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2 और 3 सितंबर को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को पर्व मनाया जाएगा। जैसे-जैसे जन्माष्टमी का त्योहार नज़दीक आता है वैसे ही हर जगह कान्हा के नाम की गूंज सुनने लगती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कान्हा के जन्मदिन की धूम पूरे देश में देखने को मिलती है। लेकिन गोकल की जन्माष्टमी की बात सबसे निराली है। मान्यता के अनुसार यहां मनाई जाने वाली रस्म कुछ अलग ही होती है। वैसे तो गोकुल सुनते ही सबसे पहले कृष्ण की छवी सामने आ जाती है क्योंकि कहा जाता है कि गोकुल की गलियों में आज भी कान्हा के होने का अहसास होता है। गोकुल की बनावट व उसके मंदिरों में आज भी अहसास होता है कि जैसे वहां के लोग आज भी कृष्ण काल में जी रहे हैं।
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इस समय पूरा गोकुल कृष्ण भक्ति में लीन रहता है और इस समय वहां की रौनक देखने लायक होती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार गोकुल में श्री कृष्ण का लालन-पालन हुआ था। यहां इस पर्व को कई अलग-अलग प्रकार से मनाया जाता है। आइए जानते हैं कितने तरीकों और रस्मों से गोकुल में मनाया जाता है जन्माष्टमी का त्योहार-

गोकुल के मंदिरों में कृष्ण जन्माष्टमी से ठीक एक दिन पहले छठी पूजन होता है। हिंदू धर्म के अनुसार बच्चे के जन्म के 6 ठें दिन छठी पूजन किया जाता है इसलिए गोकुल में कृष्ण जन्माष्टमी के एक दिन पहले यह पूजा करने की रस्म है। इसके पीछे एक कथा प्रचलित है-
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गोकुल में छठी पूजने के पीछे कथा है कि नंद जी के घर जब वासुदेव जी कृष्ण को टोकरी में रखकर छोड़ कर गए थे, तब कंस ने पुतना को आदेश दिया था कि गोकुल और उसके आस-पास छह दिन के भीतर जन्में बच्चे को मार दें। कंस के आदेश पर पूतना ने गोकुल पहुंच बच्चों को मारना शुरू कर दिया, जब इसके बारे में माता यशोदा को खबर मिलीं तो वो कृष्ण को इधर-उधर छुपाने लगीं। जिसके चलते वो छठी की पूजा करना भूल गईं। माता यशोदा ने कृष्ण को छुपाने की बहुत कोशिश की इसके बावजूद पुतना श्रीकृष्ण को उठा कर ले जाने में कामयाब रही। उसके बात पूतना ने स्तनपान कराना शुरू किया तभी कृष्ण ने पूतना के स्तन में जोर से काट लिया जिससे उसकी मृत्यु हो गई। आखिर श्रीकृष्ण तो भगवान विष्णु का साक्षात अवतार थे।
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कान्हा के जन्म के एक साल बाद जब जन्मतिथि आई तो यशोदा मईया ने गोकुल वासियों को कृष्ण जन्मोत्सव में शामिल होने के लिए न्यौता दिया तब बुजुर्ग महिलाओं और ब्राह्मणों नें यशोदा मईया से कृष्ण की छठी पूजन करने को कहा। तब माता यशोदा ने कृष्ण के जन्म के एक दिन पहले उनकी छठी पूजी और फिर उनका जन्मदिन मनाया। बस, तभी से गोकुल में यह प्रथा चली आ रही है कि जन्माष्टमी से एक दिन पहले कान्हा की छठी की पूजा की जाती है।
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