...तो क्या ब्लैक मनी से चुने जाएंगे सफेदपोश लीडर?

इलैक्शन डैस्क (संजीव शर्मा):  90 करोड़ मतदाता संख्या के साथ होने जा रहा भारत का लोकसभा चुनाव इस बार मतदाताओं के लिहाज से ही नहीं बल्कि खर्च के लिहाज से भी दुनिया के तमाम चुनावों को पछाड़ने जा रहा है। 2 साल पहले हुआ अमरीका के राष्ट्रपति का चुनाव अब तक का सबसे महंगा चुनाव था जिसमें करीब 60,000 करोड़ रुपए खर्च हुए थे लेकिन सैंटर फॉर मीडिया स्टडीज, ए.डी.आर. और अमरीका के थिंक-टैंक ‘कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनैशनल पीस’ जैसे विशेषज्ञ संस्थानों का मानना है कि भारत में इस बार चुनाव खर्च 70,000 करोड़ से अधिक का आंकड़ा पार कर जाएगा। इस लिहाज से यह अब तक का सबसे खर्चीला चुनाव होगा। तो क्या यह मान लिया जाए कि इस बार सफेदपोश लीडर ब्लैक मनी से चुने जाएंगे? इसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा यह तो समय ही बताएगा लेकिन इस वजह से दुनिया भर के सियासी पंडितों के साथ-साथ आर्थिक विश्लेषकों की भी लोकसभा चुनाव पर खास नजर है। दिलचस्प ढंग से चुनाव आयोग इस चुनाव में महज 7000 करोड़ रुपए ही खर्च करेगा। पिछले चुनाव पर आयोग का या यूं कह लें सरकार के 3870 करोड़ रुपए खर्च हुए थे लेकिन गैर सरकारी संस्थाओं के आकलन के अनुसार वास्तविक खर्च 35,000 करोड़ के करीब था। इस बार सरकारी खर्च दोगुना होगा तो उससे इतर होने वाला खर्च भी उसी अनुपात में ऊपर जाएगा।


यानी 90 फीसदी ब्लैक मनी ऐसा होगा जिसका कोई हिसाब-किताब शायद नहीं मिलेगा। यह धन कहां से आएगा यह तो हम नहीं जानते, किसका होगा और कौन-कौन कितना खर्च करेगा इसका भी शायद ही पता चल पाए क्योंकि कोई भी उम्मीदवार कागजों में तो तय सीमा के भीतर ही दिखाएगा। तो फिर बड़ा सवाल यही रहेगा कि पैसा कहां से आएगा और कहां जाएगा। रिजर्व बैंक के अनुसार मार्च, अप्रैल और मई के 3 महीनों में भारतीय बाजार में 50 हजार करोड़ की अतिरिक्त करंसी आएगी। फरवरी में ही सामान्य से 20 फीसदी ज्यादा करंसी भारतीय बाजार में दर्ज की गई है।

पहले चुनाव में खर्च हुए थे सिर्फ 10 करोड़
1951-52 में जब पहला लोकसभा चुनाव हुआ था तो उस समय निर्वाचन आयोग ने चुनाव कराने पर लगभग 10 करोड़ 45 लाख रुपए खर्च किए थे। हालांकि दूसरे आम चुनाव में महज 5 करोड़ 90 लाख खर्च हुए थे। यह नौवां चुनाव था जिसमें पहली बार चुनावी खर्च ने भी शतक मार दिया। उस चुनाव पर सरकारी खर्च था 154 करोड़ 22 लाख। 2004 के चुनाव पहले हजार करोड़ी चुनाव थे जिनमें 1 हजार 16 करोड़ 90 लाख रुपए खर्च हुए थे और 2014 में यह खर्च 3 हजार 8 सौ 70 करोड़ 35 लाख पहुंच गया जिसके इस बार डबल होने का अनुमान है लेकिन यह सरकारी आंकड़ा है। गैर-सरकारी आंकड़ा 10 गुना ज्यादा है और वही चिंता और मंथन की असली वजह है कि वह 90 फीसदी धन किस खाते से आएगा?


कायदे से बनते हैं 18,000 करोड़
चुनाव खर्च की लिमिट 70 लाख है। इसे एकमुश्त 1 करोड़ मान औसतन 5 उम्मीदवारों का 543 सीटों का खर्च हुआ 2715 करोड़। 2014 में प्रति वोटर 50 रुपए खर्च हुए थे। इसे भी डबल कर लें तो इस बार बनेगा 9000 करोड़। तब भाजपा ने 712 जबकि कांग्रेस ने 486 करोड़ खर्च किए थे। अगर अन्य पार्टियों ने भी इतना ही खर्चा किया था तो यह हो गया लगभग 2400 करोड़। अब 5 साल में इसे भी दोगुना कर लें तो मोटे तौर पर कुल चुनाव खर्च 18,000 करोड़।

अब तक करीब 3000 करोड़ जब्त
चुनाव आयोग अब तक 700 करोड़ से अधिक कैश जब्त कर चुका है। इसके अतिरिक्त 250 करोड़ की शराब और 1000 करोड़ से ज्यादा के अन्य ड्रग्स पकड़े जा चुके हैं। इसी तरह 500 करोड़ से अधिक के गहने और 50 करोड़ के अन्य उपहार भी जब्त हुए हैं। इस तरह निर्वाचन आयोग करीब 3000 करोड़ जब्त कर चुका है। यह आंकड़ा 10,000 करोड़ को पार कर जाएगा।

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