Kundli Tv- ये है श्री गणेश से मनचाहा वरदान पाने का सरल उपाय

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भगवान गणेश की प्रसन्नता के लिए शास्त्रों में अनेक जप, मंत्र, पूजा व आरती का महत्व बताया गया है लेकिन इसमें गणेश अथर्वशीर्ष सबसे महत्वपूर्ण है। गणपति पूजन में सबसे ज्यादा विशेषता श्रीगणेश अथर्वशीर्ष की मानी जाती है। यह मूलत: भगवान गणेश की वैदिक स्तुति है इसका पाठ करने वाला किसी प्रकार के विघ्न से बाधित न होता हुआ महापातकों से मुक्त हो जाता है। इसमें भगवान गणेश के आवाहन से लेकर ध्यान, नाम से मिलने वाले शुभ फल आदि सम्मिलित हैं। इस गणपति स्तोत्र का पाठ धार्मिक दृष्टि से सभी दोष से मुक्त करता है, वहीं व्यावहारिक जीवन के कष्टों, दुखों और बाधाओं से भी रक्षा करता है। श्रीगणेश अथर्वशीर्ष शांति पाठ-


ॐ  भद्रं कर्णेभि: शृणुयाम देवा:।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा:
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभि:। व्यशेम,
देवहितं यदायु:
ॐ  स्वस्ति न इंद्रो वृद्धश्रवा:।
स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा:
स्वस्तिनस्ताक्ष्यो अरिष्टनेमि:।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु
ॐ  तन्मामवतु तद् वक्तारमवतु
अवतु माम् अवतु वक्तारम्
ॐ  शांति:। शांति:। शांति:।
अथ श्री गणपत्यथर्वशीर्ष
ॐ  नमस्ते गणपतये।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि
त्वमेव केवलं कर्ताऽसि
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि
त्व साक्षादात्माऽसि नित्यम्। 
अर्थ- ॐ काराकृति भगवान गणपति को नमस्कार है। तुम प्रत्यक्ष तत्व हो। तुम्हीं केवल कत्र्ता हो। तुम्हीं केवल धर्ता हो। तुम्हीं केवल हत्र्ता हो। निश्चयपूर्वक तुम्हीं इन सब रूपों में विराजमान ब्रह्मा हो। तुम साक्षात नित्य आत्मस्वरूप हो।

ऋतं विच्म। सत्यं विच्म। 
मैं ऋत न्यायमुक्त बात कहता हूं।
सत्य कहता हूं।
अव त्व मां। अव वक्तारं।
अव श्रोतारं। अव दातारं।
अब धातारं। अवानूचानमव शिष्यं।
अव पश्चातात। अब पुरस्तात।
अवोत्तरात्तात।
अव दक्षिणात्तात्।
अवचोध्र्वात्तात्।। अवाधरात्तात्।।
सर्वतो मां पाहि-पाहि समंतात्।
अर्थ- तुम मेरी रक्षा करो। वक्ता की रक्षा करो। श्रोता की रक्षा करो। दाता की रक्षा करो। धाता की रक्षा करो। व्याख्या करने वाले आचार्य की रक्षा करो। शिष्य की रक्षा करो। पश्चिम से रक्षा। पूर्व से रक्षा करो। उत्तर से रक्षा करो। दक्षिण से रक्षा करो। ऊपर से रक्षा करो। नीचे से रक्षा करो। सब ओर से मेरी रक्षा करो। चारों ओर से मेरी रक्षा करो।

त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मय:।
त्वमानंदमसयस्त्वं ब्रह्ममय:।
त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽषि।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्माषि।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽषि।
अर्थ- तुम वाङ्मय हो, चिन्मय हो। तुम आनंदमय हो। तुम ब्रह्ममय हो। तुम सच्चिदानंद अद्वितीय हो। तुम प्रत्यक्ष ब्रह्म हो। तुम दानमय विज्ञानमय हो।

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते।
सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति।
 त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभ:।
त्वं चत्वारिकाकूपदानि।।
अर्थ- यह जगत तुमसे उत्पन्न होता है। यह सारा जगत तुमसे लय को प्राप्त होगा। इस सारे जगत की तुममें प्रतीति हो रही है। तुम भूमि, जल, अग्रि, वायु और आकाश हो। परा, पश्चंती, बैखरी और मध्यमा वाणी के ये चार विभाग तुम्हीं हो।

त्वं गुणत्रयातीत: त्वमवस्थात्रयातीत:।
त्वं देहत्रयातीत:। त्वं कालत्रयातीत:।
त्वं मूलाधारास्थितोऽसि नित्यं।
त्वं शक्तित्रयात्मक:। त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं।
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वंरूद्रस्त्वं इंद्रस्त्वं अग्रिस्त्वं  वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं
चंद्रमास्त्वंब्रह्माभूर्भूव: स्वरोम् ।। 
अर्थ-तुम सत्व, रज और तम तीनों गुणों से परे हो। तुम जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं से परे हो। तुम स्थूल, सूक्ष्म और वर्तमान तीनों देहों से परे हो। तुम भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों से परे हो। तुम मूलाधार चक्र में नित्य स्थित रहते हो। इच्छा, क्रिया और ज्ञान तीन प्रकार की शक्तियां तुम्हीं हो। तुम्हारा योगीजन नित्य ध्यान करते हैं। तुम ब्रह्मा हो, तुम विष्णु हो, तुम रुद्र हो, तुम इंद्र हो, तुम अग्रि हो, तुम वायु हो, तुम सूर्य हो, तुम चंद्रमा हो, तुम ब्रह्मा हो, भू:, र्भूव:, स्व: ये तीनों लोक तथा ॐ कार वाच्य पर ब्रह्मा भी तुम हो। गणादि पूर्वमुच्चार्य वर्णाङ्क्षद तदनंतरं।

अनुस्वार: परतर:। अर्धेन्दुलसितं।
तारेण ऋद्धं। एतत्तव मुस्वरूपं।
गकार: पूर्वरूपं। अकारो मध्यमरूपं।
अनुस्वारश्चान्त्यरूपं। बिन्दुरूत्तररूपं।
नाद: संधानं। सॅं हितासंधि: सैषा गणेश विद्या।
गणकऋषि: निचृद्गायत्रीच्छंद:।
गणपतिर्देवता:ॐ गं गणपतये नम:। 
अर्थ-गण के आदि अर्थात ‘ग्’ का पहले उच्चारण करें। उसके बाद वर्णों के आदि अर्थात ‘अ’ उच्चारण करें। उसके बाद अनुस्वार उच्चारित होता है। इस प्रकार अर्धचंद्र से सुशोभित ‘गं’ ॐ कार से अवरुद्ध होने पर तुम्हारे बीज मंत्र का स्वरूप (ॐ गं) है। गकार इसका पूर्वरूप है। बिंदु उत्तर रूप है। नाद संधान है। संहिता संविधान है। ऐसी यह गणेश विद्या है। इस महामंत्र के गणक ऋषि है। निचृंग्दाय छंद है श्री मद्यहागणपति देवता हैं। वह महामंत्र है-
ॐ गं गणपतये नम:।
एकदंताय विद्महे।
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नों दंती प्रचोदयात । 
अर्थ-
एक दंत को हम जानते हैं। वक्रतुंड का हम ध्यान करते हैं। वह दंती (गजानन) हमें प्रेरणा प्रदान करें। यह गणेश गायत्री है।

एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्।
रदं च वरदं हस्तैॢवभ्राणं मूषकध्वजम्।
रक्त लंबोदर शूर्पकर्णक रक्तवाससम्।
रक्तगंधाऽनुलिप्तांगं रक्तपुष्पै: सुपुजितम्।
भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।
आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृते पुरुषात्परम्।
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वर:।
अर्थ-एकदंत चतुर्भुज चारों हाथों में पाक्ष, अंकुश, अभय और वरदान की मुद्रा धारण किए तथा मूषक चिन्ह की ध्वजा लिए हुए, रक्तवर्ण लंबोदर वाले सूप जैसे बड़े-बड़े कानों वाले रक्त वस्त्रधारी शरीर पर रक्त चंदन का लेप किए हुए रक्तपुष्पों से भली-भांति पूजित। भक्त पर अनुकंपा करने वाले देवता, जगत के कारण अच्युत, सृष्टि के आदि में आविर्भूत प्रकृति और पुरुष से पहरे श्रीगणेश जी का जो नित्य ध्यान करता है वह योगी सब योगियों में श्रेष्ठ है।

नमो व्रातपतये। नमो गणपतये।
नम: प्रमथपतये। नमस्तेऽस्तु
लंबोदरायैकदंताय। विघ्ननाशिने
शिवसुताय। श्रीवरदमूर्तये नमो।
अर्थ-व्रात (देव समूह) के नायक को नमस्कार गणपति को नमस्कार। प्रथमपति (शिवजी के गणों के अधिनायक) के लिए नमस्कार। लंबोदर को, एकदंत को, शिवजी के पुत्र को तथा श्वीरदमूर्ति को नमस्कार-नमस्कार। 

एतदथर्वशीर्ष योऽधीते।
स ब्रह्मभूयाय कल्पते।
स सर्व विघ्नैर्नबाध्यते।
स सर्वत: सुखमेधते।
स पञ्चमहापापात्प्रमुच्यते। 
अर्थ-यह अथर्वशीर्ष (अथर्ववेद का उपनिषद) है। इसका पाठ जो करता है, ब्रह्मा को प्राप्त करने का अधिकार हो जाता है। सब प्रकार के विघ्न उसके लिए बाधक नहीं होते। वह सब जगह सुख पाता है, पांचों प्रकार के महान पातकों तथा उप पातकों से मुक्त हो जाता है।

सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति।
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति।
सायंप्रात: प्रयुंजानोऽपापो भवति।
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति।
धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति। 
अर्थ-सायंकाल पाठ करने वाला दिन के पापों का नाश करता है। प्रात:काल पाठ करने वाला रात्रि के पापों का नाश करता है जो प्रात: सायं दोनों समय इस पाठ का प्रयोग करता है वह निष्पाप हो जाता है। वह सर्वत्र विघ्नों का नाश करता है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करता है। 

इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्।
यो यदि मोहाद्दास्यति स
पापीयान् भवति।
सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते तं
तमनेन साधयेत्। 
अर्थ-इस अथर्वशीर्ष को जो शिष्य न हो उसे नहीं देना चाहिए। जो मोह के कारण देता है वह पातकी हो जाता है। सहस्र (हजार) बार पाठ करने से जिन-जिन कामों-कामनाओं का उच्चारण करता है, उनकी सिद्धि इसके द्वारा ही मनुष्य कर सकता है।

अनेन गणपतिमभिॄषचति
स वाग्मी भवतिचतुथ्र्यामनश्र्नन जपति स विद्यावान भवति।
इत्यथर्वणवाक्यं।
ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्न बिभेति कदाचनेति।
अर्थ-इसके द्वारा जो गणपति को स्नान कराता है, वह वक्ता बन जाता है। जो चतुर्थी तिथि को उपवास करके जपता है वह विद्यावान हो जाता है, यह अथर्व वाक्य है जो इस मंत्र के द्वारा तपश्चरण करना जानता है वह कदापि भय को प्राप्त नहीं होता।

यो दूर्वांकुरैंर्यजति
स वैश्रवणोपमो भवति।
यो लाजैर्यजति स यशोवान भवति स मेधावान भवति।
यो मोदकसहस्रेण यजति
स वाञ्छित फलमवाप्रोति।
य: साज्यसमिद्भिर्यजति
स सर्वं लभते स सर्व लभते।
अर्थ-जो दूर्वांकुर के द्वारा भगवान गणपति का यजन करता है वह कुबेर के समान हो जाता है। जो लाजो (धानी-लाई) के द्वारा यजन करता है वह यशस्वी होता है, मेधावी होता है। जो सहस्र (हजार) लड्डुओं (मोदकों) द्वारा यजन करता है, वह वांछित फल को प्राप्त करता है। जो घृत के सहित समिधा से यजन करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है।

अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा
सूर्यवर्चस्वी भवति।
सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासंनिधो
वा जत्वा सिद्धमंत्रों भवित।
महाविघ्नात्प्रमुच्यते।
महादोषात्प्रमुच्यते।
महापापात् प्रमुच्यते।
स सर्वविद्भवति से सर्वविद्भवति।
य एवं वेद इत्युपनिषद्। 
अर्थ-आठ ब्राह्मणों को सम्यक रीति से ग्राह कराने पर सूर्य के समान तेजस्वी होता है। सूर्य ग्रहण में महानदी में या प्रतिमा के समीप जपने से मंत्र सिद्धि होती है। वह महाविघ्न से मुक्त हो जाता है जो इस प्रकार जानता है, वह सर्वज्ञ हो जाता है वह सर्वज्ञ हो जाता है।
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