नजरिया: केजरीवाल न बनें उद्धव ठाकरे

नेशनल (संजीव शर्मा ): मुख के बजाए मुखपत्र की राजनीति करने वाली शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना के सोमवासरीय अंक में रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण पर निशाना साधा है। बकौल शिवसेना भारतीय  सेना का नेतृत्व इस समय कमजोर हाथों में है। इसलिए ही सरहद खासकर पाकिस्तान के साथ लगती सरहद पर  अशांति और हमले  बढे हैं। वैसे पाठकों को याद ही होगा कि पाक सरहद के सिवा शिवसेना किसी और देश के साथ लगती सरहद को लेकर ज्यादा चिंतित भी नहीं रहती। आखिर उसकी राजनीति का आधार ही हिन्दू मुसलमान, भारत पाकिस्तान के बीच का तनाव है।  खैर तो मुद्दा यह है कि  क्या सच में  निर्मला सीतारमण एक कमजोर रक्षामंत्री हैं ? 


इंदिरा गांधी के बाद पहली बार रक्षामंत्रालय किसी महिला के हाथों में है। ऐसे में बीजेपी ने निर्मला के बहाने नारी स शक्तिकरण की जो नई परिभाषा गढ़ी थी क्या वो खोखली निकली? या फिर उसका एक नाराज पुराना साथी महज अपनी राजनीति चमकाने के लिए ऐसे  ब्यान अपने मुखपत्र में छाप रहा है ? यह सवाल भी खंगालना होगा।  और जब यह काम किया जाए तो यह जांचना भी जरूरी होगा कि उनके पूर्ववर्ती कितने सक्षम थे। शुरुआत पहले रक्षामंत्री बलदेव सिंह से कर लीजिये और वहां से होते हुए जगजीवन राम , यशवंत च्वहाण, मुलायम सिंह, शारद पवार और प्रणब मुखर्जी तक सबको खंगालना होगा तभी जाकर यह तय हो पाएगा कि  सक्षम और  कमजोर की परिधि और परिभाषा  का आधार और दायरा क्या है। इस बीच इंदिरा, राजीव, नरसिम्हा राव ,वीपी सिंह और चंद्र शेखर समेत पांच प्रधानमंत्रियों के पास भी रक्षा मंत्रालय रहा उस दौर को भी वांचना होगा।  

वास्तव में इंदिरा गांधी के दौर के बाद कोई भी रक्षामंत्री उतना प्रभावी नहीं रहा है जितना शिवसेना के आदर्श मापदंड  ब्यान करते हैं। वजह यही रही कि हमारे देश में रक्षामंत्री का दर्जा गृहमंत्री  के बाद आता है।  युद्ध जैसी स्थिति में भी प्रधानमंत्री के बाद रक्षामंत्री नहीं बल्कि  गृह मंत्री ज्यादा अहम भूमिका में रहता है।  इस सूची में आप सरदार पटेल, शास्त्री जी  से लेकर राजनाथ सिंह तक का जिक्र कर सकते हैं। इंदिरा गांधी भी अगर प्रभावी थीं तो इसलिए की वे प्रधानमंत्री पद के साथ साथ रक्षा मंत्रालय भी संभाल रही थी। मौजूदा दौर को ही ले लें तो मोदी सरकार में ही तीन रक्षामंत्री हो चुके हैं।  मनोहर पर्रिकर के बाद अरुण जेटली ने भी यह पद संभाला। 

उधर गृहमंत्री के पद पर राजनाथ सिंह जैसे दबंग सियासतदान आसीन हैं। जाहिर है ऐसे में शिवसेना ने अगर घाटी की हिंसा और हालात का बहाना बनाकर निर्मला पर निशाना साधा है तो उसने मजह एक सॉफ्ट टारगेट ढूंढा है। यह जाहिर करता है कि शिवसेना या उद्धव ठाकरे को घाटी में शांति बहाली की नहीं अपनी राजनीती चमकाने की चिंता ज्यादा है। कायदे से यह हमला राजनाथ सिंह पर होता तो मजा आता। लेकिन शिवसेना को पता है कि राजनाथ सिंह पलटवार भी करेंगे , लिहाजा उसने चालाकी से काम लिया।  दरअसल ऐसी ही चालाकियों की वजह से शिवसेना ने लगातार अपना आधार खोया है। जनता अब महज सस्ती लोकप्रियता पाने की सियासत को बेहतर भांपने लगी है।  इसलिए उसने गंभीर मुद्दों पर अपरिपक्व राजनीति  करने वाले दलों को उनकी जगह दिखाई है। शिवसेना के लिए बेहतर होगा कि  वह बीजेपी से अलग अपने वजूद की तलाश में  गंभीर मुद्दों पर चर्चा करे ताकि जनता उसके प्रति संजीदा हो।  अगर घाटी की हिंसा के बजाए शिव सेना ने गोवा में बिना सीएम के चल रही सरकार या केंद्र में बिना वित्त मंत्री के चल रहे मंत्रालय का मसला उठाया होता तो वह कहीं ज्यादा कारगर प्रहार होता।  

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