विशेष सन्दर्भ : शिमला समझौता, यादों का सफर

नेशनल डेस्क(संजीव शर्मा): 2 जुलाई,1972 यह वो तारीख है जो भारत-पाक संबंधों को लेकर हमेशा से चर्चा में रही है और आगे भी रहेगी। आज उस ऐतिहासिक समझौते को जो इंदिरा गांधी और जुल्फिकार-अली-भुट्टो के बीच हुआ था पूरे 46 साल हो गए हैं। यह स्पैन बहुत लम्बा है और इतने लम्बे दौर में कई चीज़ें बदल जाती हैं।  लेकिन अगर आज भी आप शिमला जाकर उन जगहों को देखें जहां इस समझौते की पटकथा पूरी हुई थी तो  ऐसा प्रतीत होता है मानो कल ही की बात है। बुज़ुर्ग लोग आज भी उस दौर की बातें सुनाते हैं। कैसे इंदिरा गांधी  भुट्टो के लिए सिगार खरीदने गयी। कैसे बेनजीर भुट्टो को देखने के लिए शिमला पागल हो गया और कैसे सब बात बिगड़ जाने के बाद अचानक आधी रात समझौता हो गया।
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यादों के इस सफर को शुरू करते हैं शिमला के राजभवन से जिसे उस समय हिमाचल भवन या बार्नेस कोर्ट भी कहा जाता था। 1971 के युद्ध के बाद जब भुट्टो को लगा कि अब उनकी सत्ता जाती रहेगी तो उन्होंने इंदिरा गांधी  के पास बातचीत का सन्देश भिजवाया। इंदिरा ने बात आगे बढ़ाने का फैसला लिया और 28 जून से 2 जुलाई के बीच शिमला में शिखर वार्ता तय हुई। तय कार्यक्रम के अनुसार पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल के साथ भुट्टो पहुंचे।  इंदिरा गांधी और भारतीय दल वहां पहले से मौजूद था। भारत ने पाकिस्तान के सामने दो तीन प्रमुख बातें रखीं। पाकिस्तान ने इसे मानने से इंकार कर दिया। इंदिरा गांधी भी झुकने को तैयार नहीं थी, आखिर उन्होंने तो युद्ध जीता था।  

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बात बिगड़ गयी और पहली जुलाई को तय हो गया कि समझौता नहीं होगा। दो जुलाई को पाकिस्तानी दल के लिए विदाई भोज रखा गया था। उम्मीद थी कि शायद भोजन के दौरान शायद कोई बात बन जाएगी, लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो वहां मौजूद मीडिया समेत अधिकांश अधिकारियों ने भी सामान समेट लिया था। उस समय इस घटना को कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश लोहुमी बताते हैं कि सब अपना सामन बांध वापस जाने की तैयारी में थे। अचानक उन्हें राज भवन से संदेशा आया। रात के साढ़े नौ बजे थे, वे जब राजभवन पहुंचे तो सामने इंदिरा गांघी और जुल्फिकार भुट्टो बैठे थे। करीब एक घंटे की बातचीत के बाद तय हुआ कि समझौता होगा और अभी होगा। आनन फानन में समझौते के दस्तावेज बनाये गए और अंतत: 12 बजकर 40 मिनट पर शिमला समझौता हो गया। उसके ठीक तीन मिनट बाद ही इंदिरा गांघी वहां से खुद दस्तावेज लेकर चली गयीं। वे  रिट्रीट(वर्तमान राष्ट्रपति अवकाश गृह) में ठहरी थीं, भुट्टो राजभवन में ही रुके थे। सुबह इंदिरा गांघी उनको विदाई देने हेलीपैड पहुंचीं हालांकि तब दोनों नेताओं में कोई ख़ास बातचीत नहीं हुई। 
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सब एकदम से हुआ प्रकाश लोहुमी बताते हैं कि यह सब एकदम से ही हुआ। जिस टेबल पर आमने-सामने बैठ दोनों नेताओं ने समझौते पर दस्तखत किये उस पर टेबल क्लॉथ तक नहीं था। सामने से पर्दा उतरवाकर उसे बिछाया गया। यहां तक कि  दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने के लिए जब पेन की बात आई तो खुद पत्रकारों को अपना पेन देना पड़ा और उनके ही पेन से इंदिरा और भुट्टो ने समझौते के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किये। यहां तक कि दस्तावेजों पर दोनों देशों की मुहर तक नहीं लग पायी क्योंकि पाकिस्तानी दल अपना सामन सड़क मार्ग से दोपहर को ही भेज चुका था।ऐसे में इंदिरा गांधी ने भी मुहर के बिना दस्तखत किये (मुहरें बाद में लगीं) यहीं नहीं उस समय सिर्फ दूरदर्शन ही होता था। उसकी टीम को  बुलाने और लाने में एक घंटा लगा। इस वजह से देरी भी हुई। जैसे ही दूरदर्शन का कैमरा आया तो अगले तीन मिनट में हस्ताक्षर करने की प्रक्रिया पूरी हो गयी।    

भारत का मास्टर स्ट्रोक 
दरअसल भारत ने  इस समझौते के जरिये एक बड़ा मास्टर स्ट्रोक लगाया था। भुट्टो पर 93  हज़ार पाक सैनिकों को भारतीय कैद से रिहा करवाने का दबाव था। इसलिए उन्होंने इस मौके पर कश्मीर का जिक्र तक नहीं किया।  उधर समझौते में भुट्टो के हाथ से लिखवा लिया गया कि दोनों देश 17 दिसंबर, 1971 की स्थितियों के अनुसार  अपनी जगह पर रहेंगे और उसी को एलओसी माना  जायेगा।  भारत ने भुट्टो से यह लिखवाने  के बाद यह भी लिख दिया कि भविष्य में दोनों देश अपने झगडे आपस में बिना किसी मध्यस्थता के मिल-बैठ कर सुलझाएंगे।  यह मास्टर स्ट्रोक था जिसके दम पर आज तक भारत तीसरे पक्ष को दूर रखने में कामयाब है।  
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बेनजीर पर फिदा शिमला 
इस यात्रा में भुट्टो के साथ उनकी बेगम को आना था। लेकिन उनकी बीमारी की स्थिति में उनकी जगह भुट्टो अपनी बेटी बेनजीर को लाये। जो उस समय महज 19 साल की थीं। शिमला के बुज़ुर्ग उस वक्त को याद करके कहते हैं कि लोग बेनजीर को एक नज़र देखने के लिए दीवाने हुए जा रहे थे। जहां भी वे जातीं लोग उमड़ पड़ते। डेवीकोज रेस्तरां में जब बेनजीर काफी पीने के बहाने अंदर गयीं तो तीन घंटे तक लोग उनके बाहर निकलने का इंतज़ार करते रहे ताकि एक नज़र उन्हें देख सकें। बेनजीर  भुट्टो की जीवनी 'डॉटर ऑफ़ ईस्ट' में भी इसका  जिक्र है कि शिमला बेनजीर की झलक पाने को दीवाना हो गया था।  

इंदिरा गांधी ने खरीदे सिगार और पर्दे 
शिखर वार्ता के दौरान इंदिरा गाँधी के स्पष्ट निर्देश थे कि मेहमानों का पूरा ख्याल रखा जाए। यहां तक कि भुट्टो की पसंद का सिगार खरीदने खुद इंदिरा गांधी मालरोड की प्रतिष्ठित दुकान गेंदामल हेमराज तक गयी थींफ मालरोड की ही एक अन्य दुकान स्टाईलको से उन्होंने अंतिम दौर की बातचीत के लिए परदे खरीदे थे।  

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आज भी मौजूद है टेबल 
शिमला समझौता जिस टेबल पर हुआ उसे आनन-फानन में राजभवन के किसी कोने से लाकर रखा गया था।जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है उसपर टेबल क्लॉथ तक नहीं था। लेकिन आज वही टेबल ऐतिहासिक हो गया है और राजभवन के  मुख्य हाल में शान से रखा गया है। उस वक्त रखे गए दोनों देशों के छोटे ध्वज भी टेबल पर मौजूद हैं। समझौते की गवाह एक श्वेत-श्याम तस्वीर टेबल के पीछे दीवार पर टंगी है तो दो फ्रेम की गई तस्वीरें टेबल पर हैं। तमाम सुरक्षा प्रबंधों के बावजूद इस टेबल को राजभवन जाकर देखने वालों को आज भी बिना बिलम्ब  भीतर जाने की इजाजत दी जाती है।
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क्या हुआ आखिरी पलों में ? 
सब  बिगड़ जाने के बाद अचानक ऐसा क्या हुआ कि समझौता हो गया। उन तीन घंटों में ऐसी क्या बात हुई जो  भुट्टो दस्तखत करने को मान गए? ये बात दिलचस्प ढंग से किसी को भी पता नहीं। न तो कभी भुट्टों ने और न ही इंदिरा गांधी ने इसे कभी जाहिर किया।  उसी समझौते के गवाह रहे एक अन्य पत्रकार रवींद्र रणदेव (अब स्वर्गीय) ने एक बार बताया था कि  भोजन के बाद इंदिरा ने भुट्टो को कहा था कि बिना समझौता किये यहां से तो चले जाओगे, पर पाकिस्तान के कहाँ जाओगे ( शायद उनका इशारा बिना युद्धबंदियों के लौटने  पर होने वाली भुट्टो कीफजीहत की तरफ था) रणदेव बताते थे कि शायद इसी के बाद भुट्टोने इरादा बदला था। बहरहाल इस बात की आधिकारिक पुष्टि कभी नहीं हुई।  

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