शिव-पार्वती से जुड़ा जुए का ये राज़ क्या जानते हैं आप

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भगवान शिव को कई नामों से जाना जाता है। कई लोग उन्हें देवों के देव महादेव भी पुकारते हैं। हमारे हिंदू धर्म में भोलेनाथ एक ऐसे देव हैं जो व्यक्ति के थोड़े से पूजा-पाठ करने से भी जल्दी खुश हो जाते हैं। आज हम आपको भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ी एक ऐसी पौराणिक कथा के बारे में बताने जा रहे हैं जो शायद ही किसी को पता है। 


एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शंकर ने माता पार्वती के साथ जुआ खेलने को कहा। उस समय खेल में भगवान शंकर अपना सब कुछ हार गए। हारने के बाद भोलेनाथ अपनी लीला को रचते हुए पत्तों के वस्त्र पहनकर गंगा के तट पर चले गए। कार्तिकेय को जब सारी बात पता चली, तो वह माता पार्वती से समस्त वस्तुएं वापिस लेने आए। इस बार खेल में पार्वती जी हार गईं तथा कार्तिकेय शंकर जी का सारा सामान लेकर वापस चले गए। अब इधर पार्वती भी चिंतित हो गईं कि सारा सामान भी गया तथा पति भी दूर हो गए। पार्वती जी ने अपना सारा हाल अपने प्रिय पुत्र गणेश को बताया तो माता के भक्त गणेश खुद खेल खेलने शंकर भगवान के पास पहुंचे।

इस बार खेल में गणेश जी जीत गए तथा लौटकर अपनी जीत का समाचार माता को सुनाया। इस पर पार्वती ने कहा कि उन्हें अपने पिता को साथ लेकर आना चाहिए था। गणेश जी फिर भोलेनाथ की खोज करने निकल पड़े। 

भोलेनाथ से उनकी भेंट हरिद्वार में हुई। उस समय भोलेनाथ भगवान विष्णु व कार्तिकेय के साथ भ्रमण कर रहे थे। उधर पार्वती से नाराज भोलेनाथ ने लौटने से मना कर दिया। गणेश जी ने माता के उदास होने की बात भोलेनाथ को बताई। ये बात सुनकर भोलेनाथ ने भगवान विष्णु को पासे का रूप धारण करने को कहा और गणेश को कह दिया कि हमने नया पासा तैयार किया है अगर तुम्हारी मां खेल खेलने को सहमत हों, तो मैं वापस चल सकता हूं। 

गणपति के भरोसे पर भोलेनाथ वापिस पार्वती के पास पहुंचे और खेल खेलने को कहा। इस पर पार्वती मां हंसी और कहा कि मेरे पास खेल खेलने के लिए कोई चीज़ नहीं, जिससे खेल को खेला जा सके। लेकिन तभी नारद जी ने अपनी वीण माता को दे दी।

इस बार भी खेल में भोलेनाथ जीतने लगे। एक दो पासे फैंकने के बाद गणेश जी समझ गए और  उन्होंने भगवान विष्णु के पासा रूप धारण करने का रहस्य माता पार्वती को बता दिया। सारी बात सुनकर पार्वती जी को क्रोध आ गया और गुस्से में उन्होंने महादेव को श्राप दे दिया कि गंगा की धारा का बोझ आपके सिर पर रहेगा। नारद जी को कभी एक स्थान पर न टिकने का श्राप मिला। भगवान विष्णु को कहा कि एक समय में रावण तुम्हारा दुश्मन होगा। माता पार्वती ने  कार्तिकेय को हमेशा बात रूप में होने का श्राप दिया। 

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