मानवता के प्रचारक गुरु रविदास जी

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श्री गुरु रविदास महाराज जी दबे-कुचले साधनहीन लोगों को आजाद करवा कर स मानपूर्वक जीवन जीने की उच्च कोटि की सूझ-बूझ रखने वाले खोजकत्र्ता, इतिहासकार, क्रांतिकारी महान विद्वान थे। इनके जन्म तथा जीवन काल के समय भारत की ज्यादातर रियासतों पर मुगलों का राज  था। यह युग अंधकारमय था।इस युग में राज सत्ता हासिल करने के लिए अति की धक्केशाहीकी जाती थी। राज सत्ता का विस्तार तथा सुरक्षा जोर जबरदस्तीतथा तलवार के जोर पर की जाती थी। जब ऐसे तरीकों से राजसत्ता हथियाई जाए तो राजाओं का जालिम होना स्वाभाविक ही है।


सभी राजा सत्ता के नशे में चूर धक्केशाही के बल पर जनता को दबाते थे वहीं तथाकथित धर्म के ठेकेदार दबे-कुचले लोगों पर हर तरह का जुल्म करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते थे। वे वर्ण-व्यवस्था को लागू करना धर्म का मु य तथा मजबूत हिस्सा मानते थे। इसी कारण वे आड बर, पाखंड, कर्म कांडों द्वारा दलितों का शोषण करते थे। इन कारणों से दलितों की हालत इतनी दयनीय थी कि पशु भी उनसे बेहतर जीवन जी रहे थे। 

ऐसे दर्दनाक तथा खौफनाक हालात में श्री गुरु रविदास महाराज जी ने जालिम राजाओं तथा धर्म के ठेकेदारों के विरुद्ध बगावत का बिगुल बजाया। इन्होंने अपने हम याली विद्वानों तथा रहबरों के साथ मिल कर भारत की चारों दिशाओं में मानवता का प्रचार किया। इस प्रचार दौरान उन्होंने दबे कुचले लोगों को पाखंड-आड बरों, कर्मकांडों से ऊपर उठ कर विद्या प्राप्त करके ज्ञानवान होकर अपनी समस्याएं खुद हल करने के लिए कहा। श्री गुरु रविदास महाराज जी ने गुरबाणी द्वारा दलितों तथा साधनविहीन लोगों को समझाते हुए कहा : 

माधो अविद्याहित कीन बिबेक 

दीप मलीन।।

(आदि ग्रंथ, पन्ना 486)


गुरु रविदास जी महाराज ने कहा कि शिक्षा के बगैर मनुष्य की बुद्धि चली गई जिस कारण मनुष्य की उन्नति रुक गई, काम-धंधे, कारोबार रुक गए। पैसा आना बंद हो गया जिससे दलित बर्बाद हो गए तथा गुलाम हो गए। 

श्री गुरु रविदास महाराज जी ने उस समय के दबे-कुचले लोगों को सामाजिक बराबरी के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी। उन्होंने जात-पात तथा जन्म सिद्धांत को न मानने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि जन्म के आधार पर कोई छोटा न कोई बड़ा है। छोटा-बड़ा तो अच्छे या बुरे कर्मों से बनता है। कुदरत के लिए सभी बराबर हैं। 


क्रांतिकारी विचार तथा तर्कशील उदाहरण देकर श्री गुरु रविदास महाराज जी ने उस समय के दबे-कुचले लोगों को एकजुट होकर हर प्रकार के जुल्म के खिलाफ लडऩे की प्रेरणा दी तथा सारा जीवन आपने ऐसे संघर्षमय ढंग से बिताया और जालिम शासन तथा मनुवादी सोच को बदल बेगमपुरे का संकल्प दिया। श्री गुरु रविदास महाराज जी जहां सामाजिक तौर पर चेतन थे वहीं वह प्रगतिशील विचारों को पहल देते थे। इसी कारण उनकी सोच को समझते हुए असं य श्रद्धालुओं के अलावा कई राजे उनके चरणों में लगे जिन्होंने गुरु रविदास महाराज जी के बेगमपुरा फलसफे का प्रचार-प्रसार किया, मानवता को पहल दी, जात-जमात, मजहब को नकारा। आइए हम सभी श्री गुरु रविदास महाराज जी की विचारधारा तथा मिशन की किरणें जागृत करके मानवता को बचाने का प्रण करें। 
—अजय कुमार 
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