राफेल डील विवाद: देरी के चलते हो रहा है देश की सुरक्षा से समझौता

नेशनल डेस्क (मनीष शर्मा): आजकल मीडिया में राफेल डील को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। एनडीए सरकार ने जो 36 राफेल एयरक्राफ्ट की जो डील की है वह महंगी है या सस्ती है? राफेल डील पर घोटाला हुआ है या नहीं? राफेल एयरक्राफ्ट को लेकर किसकी डील अच्छी है वर्तमान एनडीए सरकार की या तत्कालीन यूपीए सरकार की? क्या किसी प्राइवेट कंपनी को फायदा पहुंचाया गया है या नहीं? हर कोई अपनी सफाई दे रहा है और दूसरे पर आरोप लगा रहा है। लेकिन इन आरोप प्रत्यारोप के चलते 38 राफेल विमानों की खरीद में देरी ना हो जाये और कहीं देश की रक्षा तैयारियों को हानि न उठानी पड़े। इसी चिंता का जि़क्र रक्षा मामलों की स्थाई समिति की 2017 की रिपोर्ट में भी है।



एक नजर, क्या कहती है रिपोर्ट

  • भारतीय वायु सेना इस समय अपनी स्वीकृत ताकत से 9 स्क्वाड्रन कम है मतलब 162 विमान कम हैं। 
  • उसके पास इस वक्त सिर्फ 33 विमान स्क्वाड्रन हैं जबकि उसकी स्वीकृत ताकत 42 स्क्वाड्रन की है।
  • एक स्क्वाड्रन में 18 लड़ाकू जेट विमान होते हैं।
  • चीन तथा पाकिस्तान के साथ एक ही समय पर युद्ध के लिए 45 स्क्वाड्रन की स्वीकृति दी गई है।
  • 2027 तक  मिग-21, मिग-27 और मिग-29 के 10 स्क्वाड्रन बेड़े से हटा लिए जायेंगे जिससे स्क्वाड्रन की संख्या गिर कर 19 हो जाएगी।
  • 2032 में यह स्थिति और भी खराब हो जाएगी उस समय यह संख्या 16 ही रह जाएगी।
  • समिति सालों से स्क्वाड्रन शक्ति में कमी का मुद्दा बार-बार उठा रही है लेकिन हर सरकार का रवैया उदासीन ही रहा है।
  • समिति रक्षा मंत्रालय के जवाब से भी असंतुष्ट है।




 

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