त्वरित टिप्पणी: पार्टनर की तलाश में NDA को आस

नई दिल्ली: संसद के मानसून सत्र के साथ-साथ कई घटनाएं ऐसी हुई जो संसदीय इतिहास में कभी नहीं हुईं। अविश्वास प्रस्ताव पहले भी होते रहे हैं लेकिन इस बार के अविश्वास प्रस्ताव के साथ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जिस तरह तगड़ा हमला बोला और फिर गले मिलने की घटना को अंजाम दिया, वो अप्रत्याशित था। दूसरा, सत्र के अस्त होने के पहले उपसभापति के चुनाव में राज्यसभा में अल्पमत में रहे एनडीए ने बड़ी जीत हासिल की, उस जैसे भी कम उदाहरण दिखते हैं। भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव करा सामने दिख रही हारी हुई लड़ाई को जीतकर दिखा दिया। इससे एक पंथ दो काज हुए। जीत मिली और सहयोगियों का विश्वास भी। उपलब्धि यह भी रही है कि राज्यसभा में 41 साल के बाद गैर कांग्रेसी उम्मीदवार जीता है। पर, इस सत्र की उपलब्धि और आगे की मानी जा  रही है।

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 2019 के मद्देनजर भारतीय जनता पार्टी को  इस समय सचमुच तलाश है तो पार्टनर की। तेलगू देशम पार्टी ऐसे पुराने साथी और बड़े दल के एनडीए छोडऩे के बाद नरेंद्र मोदी और अमित शाह पर यह सवाल उठाया जाने लगा था कि वे साथियों को साथ नहीं रख पा रहे हैं। शिवसेना के ठंडे-गरम रवैये ने इस मामले को और तूल दिया। अकाली दल की भी कुछ मामलों को लेकर राय अलग-अलग नजर आई। और तो और नए नवेले साथी बने नीतीश कुमार के जनता दल (यू) से भी ध्वनि ऐसी आती रही कि रिश्तों की गरम हंडिया ठंढी हो रही है। लेकिन, जिस तरह लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान उड़ीसा में बीजू जनता दल का जो रवैया रहा और फिर राज्यसभा उपसभापति चुनाव में खुलेआम हरिवंश का समर्थन किया गया, उससे साफ लगने लगा है कि बीजू जनता दल और भाजपा के बीच कुछ दाल पक रही  है। वैसे यह आसान नहीं है।

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बीजू जनता दल की सरकार उड़ीसा में पिछले 18 साल से सत्ता में लगातार है और अगले चुनावों के लिए उसे भी कुछ अपने साथियों से और कुछ सत्ता विरोधी भावना के कारण डर सता रहा है। बीजू जनता दल ने उड़ीसा में कांग्रेस का शासन 2000 में उखाड़ फेंका था और उस समय भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर यह काम किया था। सत्ता का यह प्रेम पूरे एक टर्म तक शबाब पर रहा पर दूसरे दौर में आपस में मतभेद टकराते रहे। नतीजा 2009 के चुनाव में दोनों ही दलों के रास्ते अलग हो गए और उसने थर्ड फ्रंट नाम का एक अलग गुट बना लिया था। देश के स्तर पर जिस तरह के राजनैतिक समीकरणों में बदलाव हुए, उससे यह लगने लगा है कि उड़ीसा में भारतीय जनता पार्टी को एक ऐसा ही साझेदार मिल गया है जैसे बिहार में। ऐसा बताया जा रहा है कि इस मामले में मोटा-मोटी सहमति भी हो गई है। बीजू जनता दल अपने कुछ सांसदों से मुक्ति पाएगा और भारतीय जनता पार्टी अपने उम्मीदवारों को उतारेगा।

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विधानसभा में प्रभुत्व बीजू जनता दल का रहेगा। और इस प्रक्रिया में इस मानसून सत्र की गतिविधियों का बड़ा योगदान है। इस समय बीजू जनता दल की लोकसभा में 19 और राज्यसभा की 9 सीटें हैं। ऐसी ही कुछ स्थिति आंध्र और तेलंगाना में भी बनती दिख रही है। आंध्र में चंद्रबाबू नायडू से नाता टूटने के बाद भारतीय जनता पार्टी के साथ जगन रेड्डी की पार्टी के भाजपा के साथ आने के आसार दिख रहे हैं। हो सकता है कि अधिकृत समझौता न हो लेकिन नूरा-कुश्ती की संभावना जरूर होती दिख रही है। अधिकृत समझौता होने में सबसे बड़ी बाधा आंध्र में की जा रही विशेष राज्य के दर्जे की है। इसे जगन मोहन रेड्डी की पार्टी भी मांग रही है और तेलगू देशम भी। भाजपा संविधान और कानून का हवाला देते हुए इससे बच रही है। तेलंगाना में चंद्रशेखर राव के नेतृत्व वाली  टीआरएस भी धीरे-धीरे एनडीए के करीब होती दिख रही है। उनका हरिवंश के समर्थन में आना भारतीय जनता पार्टी के लिए और रास्ते खोल रहा है।

(अकु श्रीवास्तव)

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