सिर्फ ‘नकारात्मक प्रचार’ से लोगों पर छाप नहीं छोड़ सकती कांग्रेस

2014 से अलग इस बार किसी राजनीतिक दल के पक्ष में कोई स्पष्ट लहर न होने के कारण आगामी चुनाव भी गठबंधन सहयोगियों के बीच लड़े जाने की सम्भावना बन रही है। पिछले कुछ समय में हुए घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि जहां राजग गठबंधन करने के लिए पूरी तरह सक्रिय है, वहीं पहल करने में नाकाम रहने के कारण यू.पी.ए. पिछड़ रहा है। 

कांग्रेस ने नहीं सीखा सबक
ऐसा लगता है कि यू.पी.ए. की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस ने इतिहास से सबक नहीं  सीखा है और ये निष्क्रियता की शिकार है। राहुल गांधी ‘चौकीदार चोर है’ का मुद्दा उठा रहे हैं, इसके बावजूद स्थिति में कोई परिवर्तन होता नहीं दिख रहा है। कांग्रेस अपने सहयोगियों तक पहुंच बनाने में असफल रही है जबकि भाजपा नेतृत्व ने इस संबंध में व्यावहारिक रवैया अपनाते हुए कई पाॢटयों से गठबंधन कर लिया है। जबकि उनमें से कई अपने हिस्से की सीटों से कुछ ज्यादा की मांग कर रहे थे।

गठबंधन में नाकामी
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस बसपा और सपा के साथ गठबंधन कायम करने में नाकाम रही है जोकि महागठबंधन का हिस्सा हो सकती थीं। इन दोनों पार्टियों ने आपस में गठबंधन कर लिया और कांग्रेस के लिए दो सीटें छोड़ दीं। इसके जवाब में कांग्रेस ने इन दोनों पार्टियों से बात करने की बजाय उनके लिए 7 सीटें छोड़ दीं। यह स्पष्ट है कि अब चुनाव नजदीक होने के कारण कांगे्रस की उक्त दलों से कोई समझौता होने की सम्भावना न के बराबर है। कांग्रेस की इस स्थिति से भाजपा को फायदा मिल सकता है जो अब तक खुद को राज्य में पिछड़ा हुआ मान रही थी। 

भाजपा ने फिर मारी बाजी
उधर गोवा में हुए ताजा राजनीतिक घटनाक्रम में कांग्रेस ने एक बार फिर अकर्मण्यता का परिचय देते हुए भाजपा को गठबंधन करने और सरकार बनाने का अवसर दे दिया। 2017 में विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस अकेली सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी लेकिन सरकार बनाने का दावा नहीं कर पाई थी तथा भाजपा गवर्नर के सहयोग से सरकार बनाने में सफल रही थी।

मशहूर नेता मनोहर पार्रिकर की असामयिक व दुर्भाग्यपूर्ण मौत के बाद भाजपा ने अपनी त्वरित कार्रवाई से एक बार फिर कांग्रेस को पछाड़ दिया है। भाजपा ने 2 छोटी पार्टियों महाराष्ट्र गोमांतक पार्टी तथा गोवा फारवर्ड पार्टी  से सम्पर्क किया। जिन्होंने भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ा था। इस प्रकार उसने गोवा में भाजपा गठबंधन की सरकार बरकरार रखने में सफलता हासिल कर ली जबकि कांग्रेस हाथ मलती रह गई।

हालांकि भाजपा ने प्रदेश में सत्ता बनाए रखने के लिए उचित तरीकों का इस्तेमाल नहीं किया। भाजपा उपमुख्यमंत्रियों के दो पद नए सहयोगियों को देने के लिए राजी हो गई है। 40 सदस्यीय विधानसभा में इस तरह की सरकार का गठन उचित नहीं कहा जा सकता। इसके साथ ही ऐसा शायद पहली बार हो रहा है कि मुख्य पार्टी (भाजपा) के मंत्री गठबंधन सहयोगियों के मुकाबले कम होंगे। नई सरकार में 11 मंत्री हैं जिनमें से 7 पद सहयोगी दलों तथा आजाद विधायकों के पास हैं।

शिवसेना को भी मना लिया
भाजपा अपनी आलोचक शिवसेना को भी मनाने में सफल रही है तथा उसने इस पार्टी से लोकसभा चुनावों के लिए समझौता कर लिया है। पार्टी के मुख्य रणनीतिकार अमित शाह कुछ सीटों पर अपना दावा छोडऩे के लिए सहमत हो गए हैं ताकि दोनों दलों का गठबंधन बना रहे। ओडिशा में भी पार्टी ने गठबंधन किया है और दक्षिण में भी गठबंधन के लिए प्रयासरत है। उधर असम में पार्टी वो हासिल करने में कामयाब रही है जो एक महीने पहले तक असम्भव लग रहा था। असम गण परिषद (ए.जी.पी.) ने सिटीजनशिप एक्ट पास होने के विरोध में असम सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। ए.जी.पी. पूरे राज्य में प्रदर्शन कर रही थी लेकिन भाजपा उसे वापस अपने पाले में लाने में कामयाब रही।

दूसरी तरफ कांग्रेस सभी गैर भाजपा दलों के साथ गठबंधन करने के लिए बेहतर स्थिति में होने के बावजूद ऐसा करने में असफल रही। अब इसकी सम्भावना कम होती जा रही है। पश्चिम बंगाल में भी, जहां यह तृणमूल कांग्रेस की प्रतिद्वंद्वी है, गठबंधन की सम्भावनाएं कम होती जा रही हैं। कांग्रेस को यह समझना होगा कि वह केवल नकारात्मक प्रचार और ‘चौकीदार चोर है’ के बारे में लोगों को आश्वस्त कर अपनी छाप नहीं छोड़ सकती। उसे लोगों को यह बताना होगा कि उसके पास देश और जनता के लिए क्या विजन है। जितना जल्दी कांग्रेस यह कर लेती है, उतना ही उसके लिए यह अच्छा होगा।-विपिन पब्बी

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