नोटबंदी के लेकर छिड़ी बहस, अर्थव्यवस्था की ''सर्जरी'' थी नोटबंदीः विशेषज्ञ

नई दिल्लीः भारतीय रिजर्व बैंक की 2017-18 की वार्षिक रिपोर्ट आने के बाद नोटबंदी की सफलता-असफलता को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई। इस संबंध में नेशनल काउंसिल आफ एप्लाइड इकनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) के सीनियर फेलो डॉ. कन्हैया सिंह ने कुछ सवालों के जवाब दिए।

नोटबंदी से अर्थव्यवस्था को होगा फायदा 
सिंह ने कहा कि बंद किए गए सभी नोटों का बैंकों में पहुंचना नोटबंदी की सफलता है। इससे पूरा धन औपचारिक रूप से आर्थिक तंत्र में आ गया है, जिससे अर्थव्यवस्था को फायदा होगा। नोटबंदी के दौरान लोगों ने अपने पास उपलब्ध नकदी को नष्ट करने के बजाय वाजिब, गैर-वाजिब विभिन्न तरीके अपनाकर बैंकों में पहुंचाने का काम किया। जनधन खातों में अचानक जमाधन बढ़ गया। कई बैंकर पकड़े गए लेकिन धन का बैंकों में पहुंचना अच्छा है। इससे नकदी के स्रोत का पता लगाने में मदद मिलेगी। इस पर आगे क्या कारवाई होती है, यह सरकार को देखना है।      

दो लाख मुखौटा कंपनियों का पंजीकरण रद्द
कन्हैया ने कहा कि जहां तक आतंकवादी या नक्सल संगठनों को नकदी पहुंचने की बात है, उनके धन के स्रोत के बारे में जानकारियां सामने आई हैं। उनको होने वाले वित्तपोषण में भी बाधा खड़ी हुई है। धन बैंकों में आने के बाद उसे निकालने में उन्हें परेशानी हुई है। करीब दो-सवा दो लाख मुखौटा कंपनियों का पंजीकरण रद्द हुआ है। सालाना वित्तीय लेखा-जोखा नहीं सौंपने को लेकर इतनी ही और कंपनियों पर भी पंजीकरण निरस्त होने की तलवार लटक रही है। यह काम नोटबंदी के बिना नहीं हो सकता था।    

नोटबंदी से हुई अर्थव्यवस्था ‘सर्जरी’
कन्हैया के अनुसार, 'हमारा मानना है कि नोटबंदी के रूप में वास्तव में देश में चल रही नकदी और कालेधन की अर्थव्यवस्था की जरूरी ‘सर्जरी’ की गई है। इससे महंगाई पर अंकुश लगा है। रियल एस्टेट क्षेत्र के दाम जो कि आसमान पर पहुंच गए थे नीचे आए हैं। रियल एस्टेट क्षेत्र में जो कालाधन पहुंच रहा था उस पर अंकुश लगा है। अब आम मध्यम वर्ग के लोग भी घर खरीदने के बारे में सोचने लगे हैं। जहां तक जीडीपी वृद्वि में कमी आने की बात है, नोटबंदी के बाद एक- दो तिमाही में इसका असर देखा गया था, बाद में यह रिकवर हो गया। आप जानते हैं कि जब भी कोई सर्जरी होती है तो कुछ समय तक उसका असर तो शरीर पर रहता ही है।  

नए नोट छापने पर अरबों रुपए खर्च 
अर्थव्यवस्था की बेहतरी और सुरक्षा के लिए नए नोट छापने पर यदि आठ- दस हजार करोड़ रुपए खर्च हुए हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं है। अर्थव्यवस्था को कालेधन और नकली नोटों के खतरे से बचाने के लिए इतनी राशि खर्च करना गलत नहीं है। संविधान निर्माता डा. भीमराव अंबेडकर ने भी कहा था कि अर्थव्यवस्था की भलाई के लिए समय समय पर नोट बदलते रहना चाहिए। मेरा मानना है कि सरकार को 2,000 रुपए का नोट बंद कर देना चाहिए। केवल 100, 200 और 500 रुपए के नोट ही रखने चाहिए। नोटबंदी से यदि एक प्रतिशत लोगों की भी सोच में बदलाव आता है तो यह बहुत बड़ी बात है।  

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