‘आप’ के साथ गठबंधन का सवाल ही नहींः शर्मिष्ठा मुखर्जी

नई दिल्लीः दिल्ली की वरिष्ठ कांग्रेस नेता और प्रवक्ता शर्मिष्ठा मुखर्जी ने कहा है कि दिल्ली में कांग्रेस को चुनाव लड़ने के लिए आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन की जरूरत नहीं है और पार्टी अपने दम पर चुनाव लड़ने की स्थिति में है। लिहाजा आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन का सवाल ही पैदा नहीं होता। नवोदय टाइम्स/पंजाब केसरी के संवाददाता नरेश कुमार के साथ बातचीत के दौरान शर्मिष्ठा ने दिल्ली की सियासत, अरविन्द केजरीवाल सरकार के काम और महिला आरक्षण से जुड़े मुद्दों पर बात की। 

पेश है पूरी बातचीत
केजरीवाल सरकार के दिल्ली में स्वास्थ्य व शिक्षा के क्षेत्र में काम करने के दावों में कितनी सच्चाई है?
केजरीवाल सरकार महज प्रचार वाली सरकार है। शिक्षा के क्षेत्र में विकास के दावों की पोल खुद सरकार के आंकड़े खोल रहे हैं। पिछले 3 साल में डेढ़ लाख छात्रों ने सरकारी स्कूल को छोड़कर निजी स्कूलों में दाखिला लिया है। सरकारी स्कूलों का ड्रॉप आउट रेट 2 फीसदी से बढ़कर 3.6 फीसदी हो गया है। सी.बी.एस.ई. के 10वीं और 12वीं का नतीजा सरकारी स्कूलों में राष्ट्रीय औसत 76 फीसदी से भी नीचे 68 फीसदी रहा है तो फिर सरकार किस आधार पर शिक्षा के क्षेत्र में काम करने के दावे कर रही है। 2014 तक दिल्ली के सरकारी स्कूलों का नतीजा 90 प्रतिशत था जो 3 साल में गिरा है। यही हाल स्वास्थ्य के क्षेत्र का है। दिल्ली डेंगू व चिकनगुनिया जैसी बीमारियों से जूझ रही है लेकिन इसके बावजूद सरकार मोहल्ला क्लीनिक का ढिंढोरा पीट रही है।

लोकसभा चुनाव के लिए क्या तैयारी है? दिल्ली में कांग्रेस कितनी सीटें जीतेगी?
दिल्ली में कांग्रेस का वोट 10 से बढ़कर 28 फीसदी हो गया है। हमने स्थानीय पार्षद के चुनावों में 13 में से 5 सीटें जीतीं जबकि 5 सीटों में ‘आप’ और 3 सीटों में भाजपा की जीत हुई। राजौरी गार्डन सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस 2 नम्बर पर रही और बवाना में हुए उपचुनाव में भी हमारे वोट बढ़े हैं। कांग्रेस अकेली पार्टी है जिसके वोट बढ़ रहे हैं जबकि भाजपा और आम आदमी पार्टी के वोट शेयर में लगातार गिरावट हो रही है। हम आने वाले चुनाव में भी अच्छा प्रदर्शन करेंगे।

दिल्ली में सीलिंग के मुद्दे पर कांग्रेस का क्या स्टैंड है?
इस मामले पर हुई ऑल पार्टी मीटिंग के दौरान हमने मामले का कानूनी समाधान करवाने के लिए अपने सुझाव दिए थे लेकिन न तो दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार इस मामले में समाधान चाहती है और न ही भारतीय जनता पार्टी इस मुद्दे को सुलझाना चाहती है। दोनों पार्टियां इस पर सियासत कर रही हैं। केजरीवाल ने जब अपने खिलाफ दायर हुए मानहानि के मामलों की कानूनी लड़ाई लडऩी होती है तो वह महंगे वकीलों की सेवाएं लेते हैं जबकि जनता से जुड़े इस मुद्दे के लिए कम अनुभव वाले सरकारी वकील को आदालत में भेजा गया है। यह मुद्दा शीला दीक्षित के कार्यकाल में भी सामने आया था। उस समय कांग्रेस ने देश के वरिष्ठ वकीलों के जरिए सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखकर स्टे लिया था।

आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के गठजोड़ की चर्चा पर आपकी क्या राय है?
इस गठजोड़ का सवाल ही पैदा नहीं होता। दिल्ली में आम आदमी पार्टी अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। लिहाजा पार्टी की तरफ से बार-बार कांग्रेस के साथ गठजोड़ के संकेत दिए जा रहे हैं। यदि आम आदमी पार्टी दिल्ली में इतनी मजबूत है तो अरविंद केजरीवाल सीधा सामने आकर गठजोड़ की संभावना से इंकार क्यों नहीं करते। हमारे पंजाब और दिल्ली के नेता तो खुलकर इस मामले में गठजोड़ कर रहे हैं लेकिन अरविन्द केजरीवाल इस मामले पर चुप्पी साधे हुए हैं। मेरी राय स्पष्ट है कि जिस पार्टी ने अन्य राज्यों के चुनावों में भाजपा को फायदा पहुंचाने और हमारे वोट विभाजित करने के लिए अपने उम्मीदवार खड़े किए उस पार्टी के साथ किसी कीमत पर गठजोड़ नहीं होना चाहिए।

अरविन्द केजरीवाल के दिल्ली में रिकॉर्ड कामकाज और दोबारा चुनाव जीतने के दावों पर आप क्या कहेंगी?
अरविन्द केजरीवाल विरोधाभासी बात कर रहे हैं। एक तरफ तो वह कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें काम नहीं करने दे रहे और दूसरी तरफ वह रिकार्ड काम करने का दावा करते हैं। या तो प्रधानमंत्री पर काम न करने देने का लगाया जा रहा आरोप झूठा है या फिर केजरीवाल का रिकार्ड काम करने का दावा झूठा है। उन्हें पता है कि वह दिल्ली में बुरी तरह से हारने वाले हैं लिहाजा वह गठबंधन के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं।

आगामी चुनाव में कांग्रेस का मुद्दा क्या होगा?
दिल्ली का रुका हुआ विकास कांग्रेस का मुद्दा है। दिल्ली में प्रदूषण की इतनी समस्या पहले कभी नहीं हुई जितनी इस सरकार के कार्यकाल में हुई है। दिल्ली की सड़कों में गंदगी है और बीमारियां फैल रही हैं। यह व्यवस्था की नाकामी है जिसे दिल्ली के लोग झेल रहे हैं। शीला दीक्षित की सरकार के समय दिल्ली में डी.टी.सी. की 4500 बसें चलती थीं। इस सरकार ने नई बसें तो क्या डालनी थीं, पिछली सरकार की बसों में भी 1500 बसों की कमी कर दी। मुरम्मत के अभाव में ये बसें खड़ी हो गई हैं और लोगों को ट्रांसपोर्ट की समस्या से जूझना पड़ रहा है जिससे प्रदूषण बढ़ रहा है।

आने वाले चुनाव में केजरीवाल के मुकाबले कांग्रेस का चेहरा कौन होगा?
कांग्रेस पार्टी में मुख्यमंत्री का चेहरा प्रोजैक्ट करके चुनाव लडऩे की परम्परा नहीं है और चुनाव के बाद पार्टी के विधायक ही नेता का चयन करते हैं। अथवा यदि पार्टी ने चेहरा प्रोजैक्ट करना हो तो उसका फैसला पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी करेंगे लेकिन मेरी निजी राय में दिल्ली कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अजय माकन सबसे काबिल चेहरा हैं। वह दिल्ली सरकार व केन्द्र सरकार दोनों जगह मंत्री रहे हैं और काफी अनुभवी है। उन्हें दिल्ली की हर समस्या की जानकारी है लिहाजा मेरी नजर में चुनाव जीतने की स्थिति में उन्हें यह जिम्मेदारी मिलनी चाहिए। यदि माकन को यह जिम्मेदारी नहीं मिलती तो यह दिल्ली का दुर्भाग्य होगा।

महिला आरक्षण बिल पास नहीं होता तो क्या पार्टियों को अधिकतर महिलाओं को मौका देना चाहिए?
कांग्रेस पार्टी महिला आरक्षण बिल की पक्षधर हैं और कांग्रेस की पूर्व अध्यक्षा सोनिया गांधी के साथ-साथ पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस बारे में पत्र लिखा था लेकिन सरकार की नियत में खराबी है। मुझे लगता है कि पार्टी स्तर पर महिलाओं को मौका तब तक मिलना मुश्किल है जब तक सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित नहीं हो जातीं। मान लीजिए कांग्रेस ने किसी अनारक्षित सीट से महिला उम्मीदवार को मैदान में उतारा और विपक्ष की तरफ से किसी मजबूत पुरुष उम्मीदवार को उतार दिया गया तो चुनाव हारने की नौबत आ जाएगी लेकिन अगर सीट महिला आरक्षित होगी तो विपक्ष को भी महिला उम्मीदवार ही उतारनी पड़ेगी लिहाजा इस बारे में कानून बनाना जरूरी है लेकिन इस सरकार में यह संभव नहीं लग रहा क्योंकि यदि संसद के अगले सत्र में कानून पास हो भी जाता है चुनाव आयोग को आरक्षित करने वाली सीटों की पहचान के अलावा तमाम अन्य तैयारियां भी करनी पड़ेंगी जो अगले चुनाव तक नहीं हो पाएंगी। कांग्रेस की तरफ से यह साफ है कि यदि पुरुष और महिला उम्मीदवारों में जीतने की बराबर योग्यता हो तो महिला उम्मीदवार को प्राथमिकता दी जाएगी।

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