नहीं चाहते रिश्तों में दरार तो फौरन करें ये काम

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रूठना और मनाना जीवन का स्वाभाविक क्रम है, इसके बिना जीवन की गाड़ी चल ही नहीं सकती लेकिन रूठने और मनाने की एक सीमा होती है। सभी समझदार लोग रूठे हुए को फौरन और बार-बार मनाने की सलाह देते हैं। रहीम कहते हैं-‘रूठे सुजन मनाइए जौ रूठें सौ बार, रहिमन फिरि-फिरि पौहिए टूटे मुक्ताहार।’ यदि कोई सुजन अर्थात कोई हमारा प्रिय अथवा कोई अच्छा व्यक्ति हमसे रूठ जाए तो उसे हमेशा ही मना लेना चाहिए, चाहे वह बार-बार ही क्यों न रूठ जाता हो। रहीम कहते हैं कि यदि मोतियों का हार टूट कर बिखर जाए तो उसके मोतियों को फिर से धागे में पिरो लेना चाहिए। क्योंकि ऐसा करने से वह पहले की तरह ही उपयोगी और सुंदर हो जाएगा। अन्यथा मोती इधर-उधर बिखरकर महत्वहीन हो जाएंगे अथवा खो जाएंगे। जैसे मोती जब तक एक सूत्र में गुंथे रहते हैं तब तक आकर्षक व उपयोगी रहते हैं, उसी प्रकार से जब तक संबंध भी मधुर और आत्मीय रहते हैं तभी तक उनका महत्व है।


अच्छे संबंध हमारा पोषण और विकास करते हैं जबकि खराब संबंध हमारे स्वास्थ्य के लिए घातक और हमारी उन्नति में बाधक होते हैं। जब कोई उपेक्षित अनुभव करता है तभी वह दुखी होता है अथवा रूठता है। प्राय: अहंकार, उपेक्षा अथवा स्वार्थ के कारण ही हमारे संबंध खराब होते हैं। रूठे हुए स्वजनों को फौरन मनाने का अर्थ है कि हम न केवल उनसे अगाध प्रेम करते हैं अपितु हम पूर्णत: अहंकार रहित, स्नेहशील व स्वार्थ से दूर हैं। यदि हमसे कोई गलती हो गई हो तो उसे स्वीकार कर क्षमा मांगी जा सकती है। ऐसा करेंगे तो सामने वाला न केवल अपने क्रोध और हठधर्मिता का फौरन त्याग कर देगा, अपितु ऐसे में संबंध और अधिक प्रगाढ़ हो जाएंगे। जब लंबे समय तक रूठना चलता है तो दोनों तरफ से बहुत-सी गलतफहमियां बढ़ती चली जाती हैं जिन्हें बाद में दूर करना मुश्किल हो जाता है।   

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