''अदालतों पर मुकदमों का बोझ'' ''घटाने के लिए कुछ अच्छे सुझाव''

5/29/2021 2:39:40 AM

‘नैशनल ज्यूडीशियल डाटा ग्रिड’ के आंकड़ों के अनुसार देश भर में 3.85 करोड़ से अधिक मामले इस समय विभिन्न अदालतों में लंबित हैंं। न्यायालयों में न्यायाधीशों की कमी के कारण देर से सुनाए गए मामलों के तीन उदाहरण निम्र में दर्ज हैं : 

* 33 वर्ष पूर्व 30 जून, 1988 को उत्तर प्रदेश में श्रावस्ती जिले के ‘लोनियन पूर्वा’ गांव में एक नाबालिगा से बलात्कार के मामले में संलिप्त 5 आरोपियों के विरुद्ध अदालती कार्रवाई के दौरान 4 आरोपियों की मृत्यु ही हो गई और एकमात्र जीवित बची आरोपी महिला को 13 मई, 2021 को अदालत ने 15000 रुपए नकद तथा 5 वर्ष कैद की सजा सुनाई।
* 22 वर्ष पहले 18 मार्च, 1999 को बिहार के सेनारी में हुए एक नरसंहार जिसमें अनेक लोगों को उनके घर से निकाल कर मार डाला गया, से स बन्धित केस का इस वर्ष 22 मई को फैसला सुनाते हुए पटना हाईकोर्ट ने इस केस में संलिप्त सभी 13 आरोपियों को बरी कर दिया। 

* 41 वर्ष पुराने प्रापर्टी पर अवैध कब्जे के विवाद का पीड़ित महिला की मौत के 11 वर्ष बाद 27 मई, 2021 को फैसला सुनाते हुए सुप्रीमकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमना तथा न्यायाधीश सूर्यकांत और अनिरुद्ध बोस की पीठ ने प्रापर्टी का कब्जा छुड़वा कर उसे मृतका के बच्चों को वापस दिलवाने का आदेश जारी किया। न्यायालयों में जजों की कमी से लोगों को न्याय मिलने में होने वाली गैर जरूरी देरी के कारण इसी तरह की घटनाओं को देखते हुए 13 अप्रैल, 2016 को तत्कालीन राष्टï्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने कहा था, ‘‘देर से मिलने वाला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है।’’ 

वर्तमान राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने भी उनके विचारों का समर्थन करते हुए कहा था कि ‘‘देर से मिलने वाला न्याय तो अन्याय ही है।’’ हाल ही में पूर्व मुख्य न्यायाधीश एस.ए. बोबडे ने भी सुझाव दिया कि मुकद्दमेबाजी के लिए अदालतों में जाने से पूर्व अदालतों से बाहर विवाद निपटाने के लिए देश में मध्यस्थता प्रणाली लागू की जानी चाहिए। इसी संबंध में न्यायमूॢत बोबडे के सुझाव को दोहराते हुए लुधियाना से हमारे एक पाठक श्री लाल चंद ने भी जहां अदालतों में किसी भी विवाद को लेकर केस दर्ज किए जाने से पूर्व दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता की व्यवस्था करके मामला सुलझाने का सुझाव दिया है वहीं उन्होंने हमें निम्र में दर्ज कुछ और अच्छे सुझाव भेजे हैं : 

* पुराने कानून समाप्त करके कठोर दंड वाले नए कानून लागू किए जाएं।
* रिश्वत लेने वालों को उसी समय नौकरी से निकाल दिया जाए।
* अदालतों में दीवानी मामलों के निपटारे के लिए अधिकतम समय सीमा 2 वर्ष, फौजदारी मामलों के लिए 6 महीने हो। बलात्कार, नशा तस्करी आदि के मामलों का निपटारा 2 महीने के भीतर होना चाहिए।
* गवाहों को अदालतों में बार-बार न बुलाया जाए।
* धारा 181-ए (झूठी कसम खाकर झूठा बयान देना) और धारा 182-बी (धोखा देने के इरादे से सरकारी कर्मचारी को गलत सूचना देकर अदालत का समय नष्टï करना) के अंतर्गत दोषियों पर कठोर कार्रवाई की जाए। 

* प्रवर्तन निदेशालय (इंफोर्समैंट डायरैक्टोरेट) द्वारा मारे गए छापों में जब्त की जाने वाली चल और अचल स पत्ति पर भारत सरकार का अधिकार हो और दोषी व्यक्ति को जेल भेज दिया जाए। इस समय देश की अदालतों में वर्षों से लंबित मामलों तथा लंबे समय से चली आ रही जजों की कमी पूरी करने की मांग की जा रही है।

जैसा कि ऊपर दिए गए उदाहरणों से स्पष्टï है, मौजूदा हालात में न्याय मिलने में होने वाले असाधारण विलंब के कारण कई बार तो पीड़ित न्याय के इंतजार में ही संसार से विदा हो जाता है। स्थिति की गंभीरता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि इस समय देश में 1.2 लाख से अधिक मामले 30 वर्ष से भी अधिक पुराने हैं। जानकारों के अनुसार यदि अदालतों में सुनवाई की यही धीमी गति कायम रही और मामले भी तेज गति से दर्ज होते रहे तो पिछड़ चुके काम को पूरा करने में हमारी अदालतों को तीन सौ वर्ष से अधिक का समय लग जाएगा।

अत: यदि उक्त सुझावों पर अमल किया जा सके तो इससे न्याय प्रक्रिया में कुछ तेजी आने से अदालतों में मुकद्दमों की सं या में किसी हद तक कमी आएगी तथा पीड़ित लोगों को जल्दी न्याय मिल सकेगा। इसके साथ ही न्याय प्रक्रिया में देरी होने से पैदा हताशा और क्रोध के कारण लोगों द्वारा कानून हाथ में लेने तथा बदले की भावना से हिंसा एवं अपराधों की ओर बढऩे का खतरनाक रुझान पैदा हो रहा है जो समाज के लिए उतना ही हानिकारक है जितना न्याय मिलने में देरी होना।—विजय कुमार 


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