प्रशांत किशोर का कांग्रेस से जुड़ना या न जुड़ना अनिश्चय के भंवर में

punjabkesari.in Monday, Apr 25, 2022 - 04:22 AM (IST)

रही न ताकत-ए-गुफ्तार और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पे कहिए कि आरजू क्या है। 

उर्दू के महान शायर मिर्जा गालिब ने यह शे‘र करीब 200 वर्ष पहले लिखा था मगर आज के संदर्भ में कांग्रेस पार्टी को लेकर यह बात सटीक जरूर बैठती है। द ग्रैंड ओल्ड पार्टी कांग्रेस का किसी समय केंद्र और देश के अधिकांश राज्यों की सरकारों में दबदबा रहा है परंतु पिछले कुछ सालों से केंद्र के साथ-साथ राज्यों में भी सत्ता से वंचित होकर निरंतर क्षरण की ओर अग्रसर यह पार्टी आज मात्र 2 राज्यों तक सिमट कर हाशिए पर आ गई है। पांच राज्यों के चुनावों में भारी पराजय को देखते हुए कुछ समय से एक बार फिर प्रशांत किशोर को कांग्रेस में लाने की कवायद शुरू हुई है। प्रशांत किशोर कांग्रेस के लिए एक उम्मीद की किरण बन सकते हैं। 

‘पी.के.’ के नाम से मशहूर राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर की एक सप्ताह से कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी से बातचीत चल रही है। इसमें न तो राहुल और न ही प्रियंका गांधी वाड्रा शामिल थे। अब जल्दी ही सोनिया गांधी के साथ उनकी तीसरी भेंट के बाद इस संबंध में अंतिम फैसला लिए जाने की संभावना व्यक्त की जा रही है। राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में प्रशांत किशोर ने सबसे पहले 2011 में नरेंद्र मोदी के लिए अभियान चलाया था और 2014 में भाजपा को लोकसभा के चुनावों में भारी बहुमत में विजय दिलाने में सहायता की। 

फिर प्रशांत के बलबूते पर 2016 में  अमरेंद्र सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस ने पंजाब में विजय प्राप्तकी। 2017 में आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रैड्डी के राजनीतिक सलाहकार नियुक्त किए गए प्रशांत किशोर ने उनकी पार्टी को 175 में से 151 सीटों पर जीत दिलाई। इसके बाद उन्होंने बिहार (जद यू), पश्चिम बंगाल (तृणमूल कांग्रेस), तमिलनाडु (द्रमुक) को जीत दिलवाई। 

अब इस बारे सोनिया गांधी से मुलाकातों में प्रशांत किशोर ने 2024 में होने वाले आम चुनावों, इस वर्ष के अंत में तथा अगले वर्ष के शुरू में होने वाले हिमाचल प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के चुनावों में कांग्रेस पार्टी को दोबारा अपने पैरों पर खड़ी करने के लिए ‘रोड मैप’ पेश किया। सोनिया गांधी ने प्रशांत किशोर द्वारा दिखाए गए रोड मैप पर विचार करने के लिए गठित कमेटी में इसकी स्लाइडें दिखाईं, जिसमें पार्टी के 2 राज्यों के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (राजस्थान) और भूपेश बघेल (छत्तीसगढ़) के अलावा कमलनाथ आदि शामिल थे। 

अशोक गहलोत ने कथित रूप से प्रशांत किशोर की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को लेकर सवाल उठाए और पूछा कि वह पार्टी में कितनी देर टिक पाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि प्रशांत किशोर सिर्फ नाम के बड़े हो गए हैं। इसी प्रकार मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भी प्रशांत किशोर पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि इसी कारण पार्टी में उनके प्रवेश पर आपत्ति है परंतु पार्टी उन्हें शामिल करने के लिए तैयार है जिसके बारे कांग्रेस अध्यक्ष फैसला करेगी। इस बीच सोनिया के साथ हुई बातचीत के 85 पृष्ठों के लीक होने के बाद कांग्रेस पार्टी के भीतर बवाल मच गया है। 

माना जाता है कि पहली बात यह है कि प्रशांत किशोर ने सबसे पहले कांग्रेस पार्टी में नेतृत्व की बात उठाई है। देश में गांधी परिवार का सदस्य   पार्टी अध्यक्ष हो सकता है परंतु कांग्रेस वर्किंग कमेटी (सी.डब्ल्यू.सी.) का अध्यक्ष किसी और नेता को बनाया जाना चाहिए। दूसरी बात, कांग्रेस पार्टी में पुराने दिग्गजों की धाक अभी भी कायम है। इनमें से कई तो चुनाव हार चुके हैं और अब जमीनी स्तर पर कार्यकत्र्ताओं से वे कम ही जुड़े हैं। पार्टी के ऐसे पुराने और वरिष्ठ नेता कभी नहीं चाहेंगे कि प्रशांत किशोर पार्टी को संभालें। वे चाहेंगे कि उनकी मनमर्जी के तहत ही पार्टी में बदलाव किए जाएं। 

तीसरी यह कि प्रशांत किशोर चाहते हैं कि करीब 70 सीटों पर कांग्रेस अपने दम पर चुनाव लड़े। उसके बाद अन्य पाॢटयों के साथ गठबंधन किया जाए और अन्य राज्यों में सशक्त पार्टियों को खुद के बलबूते पर चुनाव लडऩे देना चाहिए। हालांकि ऐसी बातों के लिए कांग्रेस के पुराने दिग्गज नेता राजी नहीं हैं। चौथी यह कि कांग्रेस में संगठन के चुनाव दो वर्षों से हुए नहीं हैं। ऐसे में यह चुनाव शीघ्र करवाने की आवश्यकता है। इससे कांग्रेस कैडर निराश हो गया है। ऐसी निराशा से वह पार्टी छोड़ सकता है जिससे कांग्रेस पार्टी  वैंटीलेटर पर आ जाएगी। 

प्रशांत के लिए यह बात देखनी होगी कि आखिर संसद में पार्टी को कौन लीड करेगा। उनका मानना है कि यदि हम यू.के. की मिसाल लें तो वहां पर शैडो कैबिनेट बनाई गई है। हर सांसद के पीछे एक विपक्षी सांसद लगा दिया जाता है। यू.के. वाली शैडो कैबिनेट का यह माडल पी.के. कांग्रेस में भी चाहते हैं। वह चाहते हैं कि उसी माडल के अनुसार नीतियां बनाई जाएं। भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण अडवानी ने भी यह फार्मूला अपनाने की बात कही थी। इससे एक लीडर ही नहीं बल्कि कई लीडर हो जाएंगे। 

कई पार्टी नेताओं का मानना है कि पी.के. कांग्रेस के लिए अगले नए अहमद पटेल बनना चाहते हैं जबकि प्रशांत किशोर का मानना है कि पार्टी को एक नए नेतृत्व की जरूरत है। आज के मुद्दे कांग्रेस पार्टी के पूर्व के मुद्दों से अलग हैं। पार्टी में यह भी स्पष्ट नहीं है कि किस वोट बैंक को प्राथमिकता दी जाए। पार्टी क्या अल्पसंख्यकों या फिर बहुमत वालों के साथ जाना चाहती है। 

वहीं पी.के. का कहना है कि यदि हम सोशल मीडिया की बात करें तो कांग्रेस इसमें हमें बेहद कमजोर कड़ी दिखाई देती है। उसे भाजपा की तरह ऐसी टीम तैयार करनी होगी जो 24 घंटे तैयार रहे फिर चाहे लोकसभा के चुनाव हों या निगम के। ऐसी टीम इन चुनावों पर अपनी कड़ी निगरानी रखे। क्या कांग्रेस में प्रशांत किशोर को एक विशेष पद दिया जाएगा? क्या उन्हें कांग्रेस वर्किंग कमेटी (सी.डब्ल्यू.सी.) का अध्यक्ष बनाया जाएगा? 

अब सवाल यह उठता है कि क्या प्रशांत किशोर ऐसा सब कुछ कर पाएंगे? क्या उनमें इतनी योग्यता है कि वह कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी को संभाल सकें? कांग्रेस प्रशांत किशोर को फ्री हैंड नहीं दे सकती जबकि पुराने दिग्गजों को सोनिया गांधी को खुद हैंडल करना होगा। क्या प्रशांत किशोर युवा तथा पुराने दिग्गजों के बीच संतुलन बिठा पाएंगे। 


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