‘पंजाब कांग्रेस में फिलहाल युद्ध विराम!’ ‘नवजोत सिद्धू बने पार्टी अध्यक्ष’

2021-07-24T04:13:54.783

2 वर्ष पूर्व पंजाब के मुख्यमंत्री कै. अमरेंद्र सिंह द्वारा नवजोत सिंह सिद्धू से महत्वपूर्ण मंत्रालय छीन लेने पर मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे देने के बाद से नवजोत सिद्धू ने उनके विरुद्ध मोर्चा खोल रखा था, जिसमें बाद में कुछ अन्य विधायक व मंत्री भी शामिल हो गए। 

कांग्रेस आलाकमान द्वारा गठित मल्लिकार्जुन समिति की ओर से पंजाब के 100 से अधिक नेताओं से बातचीत करने तथा अमरेंद्र सिंह और नवजोत सिद्धू सहित पंजाब के कांग्रेसी नेताओं की दिल्ली में राहुल और प्रियंका गांधी से मुलाकातों के बावजूद यह झगड़ा सुलझने में नहीं आ रहा था। अंतत: 15 जुलाई को पंजाब कांग्रेस प्रभारी हरीश रावत ने यह विवाद समाप्त करने बारे फार्मूला तैयार हो जाने की बात कही जिसमें नवजोत सिद्धू को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने का संकेत दिया गया था।

इसके अगले दिन 16 जुलाई को अमरेंद्र सिंह ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक पत्र लिख कर सिद्धू को पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने पर पैदा होने वाले संभावित संकटों और चुनौतियों का उल्लेख किया। 17 जुलाई को हरीश रावत से चंडीगढ़ में भेंट के बाद अमरेंद्र सिंह ने सोनिया गांधी का हर फैसला मंजूर करने की बात तो कही परंतु इसके साथ ही यह भी कहा कि जब तक सिद्धू अपने ट्वीटों बारे माफी नहीं मांगते तब तक वह उनसे मिलेंगे नहीं।

एक ओर कैप्टन अमरेंद्र सिंह 18 जुलाई को भी सिद्धू की माफी पर अड़े रहे तो दूसरी ओर उसी दिन सोनिया गांधी द्वारा पंजाब के कांग्रेसी नेताओं से वर्चुअल बैठक के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर सिद्धू को नियुक्त किए जाने का पत्र जारी कर दिया गया। लेकिन इससे पहले ही सिद्धू ने पंजाब के माझा, मालवा और दोआबा जिलों में पार्टी के कार्यकत्र्ताओं और विधायकों के साथ मुलाकातों का सिलसिला शुरू कर दिया तथा पंजाब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्षों प्रताप सिंह बाजवा, शमशेर सिंह दूलो, लाल सिंह और सुनील जाखड़ से भेंट की।

इसके बाद सिद्धू चंडीगढ़, मोहाली, पटियाला और नवांशहर में पार्टी विधायकों तथा विधानसभा अध्यक्ष राणा के.पी. सिंह आदि से मिले। इसका नतीजा यह रहा कि जब ताजपोशी से दो दिन पहले सिद्धू ने अमृतसर में दरबार साहिब जाने के लिए विधायकों को अपने घर बुलाया तो लगभग 60  विधायक उनके साथ नजर आए और बस में सिद्धू के साथ दरबार साहिब, दुग्र्याणा मंदिर और रामतीर्थ पर माथा टेकने गए।

इस बीच, हालांकि  अमरेन्द्र सिंह ने नवजोत सिद्धू की ताजपोशी में शामिल नहीं होने की बात कही थी परंतु एकाएक 23 जुलाई को उन्होंने पंजाब भवन में ब्रेकफास्ट का आयोजन करके सिद्धू व अन्य नेताओं को आमंत्रित किया तो सिद्धू न सिर्फ इसमें शामिल हुए बल्कि अमरेन्द्र सिंह की बगल में बैठे। इससे पूर्व सिद्धू ने अपने तथा 55 विधायकों के हस्ताक्षरों के साथ ताजपोशी समारोह में शामिल होने के लिए अमरेन्द्र सिंह को निमंत्रण भेजा था जिसे सिद्धू के माफी न मांगने के बावजूद अमरेन्द्र ने स्वीकार कर लिया और ताजपोशी समारोह में शामिल होकर इस विवाद का पटाक्षेप कर दिया।

हालांकि सुलह होने से पूर्व का समय दोनों पक्षों के लिए कटुतापूर्ण रहा और एक-दूसरे पर इल्जाम तराशी भी हुई पर फिलहाल एक युद्ध विराम हो गया प्रतीत होता है। नवजोत सिद्धू एक अच्छे वक्ता और जोशीले नेता हैं जिनके नेतृत्व में पार्टी को चुनावों में लाभ अवश्य पहुंचेगा। ताजपोशी समारोह में जिस प्रकार सिद्धू ने तमाम विवाद भूल कर राज्य के लिए मिलजुल कर काम करने की बात कही है उस पर यदि दोनों पक्ष कायम रहें तो यह पंजाब के लिए लाभकारी ही होगा।

सभी दलों को यह बात महसूस करनी चाहिए कि देश में अंतत: दो-तीन दल ही अधिक प्रभावी रहेंगे और देश को प्रभावी विपक्षी दल की भी आवश्यकता है। भारत एक बड़ी जनसं या और अनेक भाषाओं वाला देश होने के कारण इसकी समस्याएं भी बहुत हैं। अत: आपसी विवादों में उलझ कर समय नष्टï करने की बजाय परस्पर सहमति से समस्याएं सुलझाने पर अधिक ध्यान देना चाहिए। इसी में पाॢटयों, लोगों और देश का हित निहित है।—विजय कुमार


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Chief Editor

vijay kumar

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