मोदी की नई टीम: गरीबों और वंचितों की आकांक्षाओं की प्रतीक

2021-07-12T14:43:53.177

भले ही सभी पत्रकारों, संपादकों और राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने कैबिनेट के बहुप्रतीक्षित विस्तार/फेरबदल के बारे में अंदरुनी जानकारियां लेने से लेकर अटकलें लगाने तक में कोई भी कसर नहीं छोड़ी  हो, लेकिन आखिरकार बुधवार को जब यह सूची सामने आई, तो इसने बिना किसी अपवाद के हर किसी को पूरी तरह से अचंभित कर दिया। 

न केवल यह विस्तार/फेरबदल समस्त जानकारों के अनुमानों की तुलना में अत्यधिक व्यापक था, बल्कि इस सूची में कई नाम ऐसे थे जिनके बारे में किसी ने दूर-दूर तक सोचा भी नहीं था। बेशक, कुछ अटकलों में व्यक्त किए गए संभावित नाम इस सूची में स्थान पाने में सफल रहे हैं। 
 
नए मंत्रिमंडल, जिसमें मंत्रियों की संख्या 53 से बढ़कर 77 हो गई है, में शामिल हर नाम पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूरी तरह से सोच-समझकर अपनी मुहर लगाई है। भले ही इस व्यापक फेरबदल को अंतिम क्षण तक पूरी तरह से गोपनीय रखा गया हो या इस सूची में हर किसी के अनुमान से परे अनगिनत नाम हों, लेकिन यह तो तय है कि इस कैबिनेट विस्तार, जो नरेन्द्र मोदी के दूसरी बार प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के ठीक दो साल बाद किया गया है, पर आने वाले कुछ और दिनों तक व्यापक चिंतन-मनन करने, इसकी तह में जाने और गहन विश्लेषण करने का काम निरंतर जारी रहेगा। 

हालांकि, राजनीतिक पर्यवेक्षकों की विशेष रुचि जिसमें होनी चाहिए, वह यह है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल (सी.ओ.एम.) में आज सही मायनों में ‘भारत’ का एक लघु रूप स्पष्ट नजर आता है। 

समस्त सामाजिक और क्षेत्रीय आकांक्षाएं (और हमारे देश में जिनकी एक बड़ी सूची है) इस सूची में अपना प्रतिबिंब ढूंढने का दावा कर सकती हैं। बस यह प्रयास करना कि यह लक्ष्य निश्चित रूप से काफी विशाल हो, प्रधानमंत्री मोदी अपनी विशिष्ट दक्षता और हमारी सामाजिक आकांक्षाओं की गहरी समझ के साथ इसे उस हद तक सटीक बनाने में सक्षम रहे हैं जो व्यावहारिक रूप से संभव था। स्वयं उनके अपने शब्दों में जीवन दरअसल आगे बढऩे का नाम है और उन्होंने आगे बढऩे का काम वास्तव में कर दिखाया है! 

अब संख्याओं पर ध्यान देते हैं। लगभग तीन दर्जन सदस्यों को शामिल किए जाने के बाद, मंत्रिमंडल में सदस्यों की कुल संख्या 77 हो गई है। इनमें से 27 मंत्री अन्य पिछड़ा वर्ग (ओ.बी.सी.) से आते हैं। 
बीजेपी गठबंधन के सहयोगी दलों से दो सदस्यों-रामचंद्र प्रसाद सिंह (जे.डी.यू.-बिहार) और अनुप्रिया पटेल (अपना दल-यू.पी.) को शामिल किया गया है, जो अपनी-अपनी पार्टियों के अग्रणी नेता हैं और ओ.बी.सी. वर्ग से आते हैं। इसके अलावा, सत्य पाल सिंह बघेल (यू.पी.), दर्शना विक्रम जरदोश (गुजरात) और कपिल मोरेश्वर पाटिल (महाराष्ट्र) जैसे ओ.बी.सी. के लोकप्रिय व स्थापित जन प्रतिनिधियों को भी मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। पहले से शामिल अन्य मंत्रियों के साथ, अब ओ.बी.सी. वर्ग के मंत्रियों की कुल संख्या काफी प्रभावशाली हो गई है।  

अनुसूचित जाति (एससी) के प्रतिनिधियों की भागीदारी भी कम नहीं है। अब हमारे पास समाज के इस वर्ग से मंत्रिमंडल में एक दर्जन सदस्य हैं। इनमें से कई अपने-अपने क्षेत्रों में लोगों के कल्याण के लिए अथक प्रयास कर रहे हैं। 

अनुसूचित जनजाति (एस.टी.) वर्ग से आठ मंत्रियों को शामिल किया गया है। इस बड़ी संख्या ने बहुत से लोगों को गंभीरता से सोचने के लिए बाध्य किया है। जनजातियों को हमेशा ही केंद्र सरकार में नाम मात्र का प्रतिनिधित्व मिला है। लेकिन उनकी संख्या अब आठ (08) हो गई है। इनमें से तीन कैबिनेट मंत्री हैं। 
इस सूची में अर्जुन मुंडा (झारखंड) और सर्बानंद सोनोवाल (असम) जैसे प्रतिष्ठित नेता और पूर्व मुख्यमंत्री शामिल हैं। सूची में बिशेश्वर टुडू (ओडिशा) जैसे समर्पित राजनेता भी शामिल हैं, जो बिना किसी प्रचार के समुदाय के कल्याण के लिए निरंतर काम कर रहे हैं। पुरुष-महिला अनुपात के पैमाने पर, इस नए मंत्रिमंडल में अब 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के बाद से महिलाओं का सबसे अधिक प्रतिनिधित्व है। 

शायद ही किसी ने इस बात पर ध्यान दिया कि इस बार 07 महिलाओं ने शपथ ली है और इसके साथ ही मंत्रिमंडल में महिलाओं की कुल संख्या 11 हो गई है। नरेन्द्र मोदी ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने महिलाओं को सांकेतिक प्रतिनिधित्व से ज्यादा हिस्सेदारी दी है और निर्मला सीतारमण तथा दिवंगत सुषमा स्वराज जैसी नेताओं को मंत्रिमंडल रक्षा समिति (सीसीएस) या बिग फोर की महत्वपूर्ण सूची में शामिल किया है।    
         
यह नई टीम क्षेत्रीय आकांक्षाओं के प्रति अपनी संवेदनशीलता की दृष्टि से भी उल्लेखनीय है। प्रधानमंत्री श्री मोदी न केवल राज्यों, बल्कि उन राज्यों के भीतर के उपेक्षित इलाकों को भी समायोजित करने को लेकर सचेत रहे हैं। राजनीतिक पंडितों ने आगामी विधानसभा चुनावों के आलोक में इस विस्तार को लेकर बहुत कुछ कहा है।

हमारे जैसे संसदीय लोकतंत्र में चुनावों के महत्व को नकारना भोलापन होगा। और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य का निश्चित रूप से अपना एक महत्व है। लेकिन सिर्फ राज्य के चुनावों को इतनी व्यापक कवायद के पीछे के प्रेरक तत्व के रूप में देखना अदूरदर्शिता होगी। अगर राज्य के चुनाव (चाहे उत्तर प्रदेश के हों या गुजरात के या फिर मणिपुर के) ही एकमात्र कसौटी थी, तो तमिलनाडु से एल. मुरुगन को शामिल करने की व्याख्या कैसे की जाएगी? और इस समय पश्चिम बंगाल से निसिथ प्रमाणिक और जॉन बारला को शामिल करने का क्या चुनावी लाभ मिलेगा? जरा सोचिए!
 


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Content Writer

jyoti choudhary

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