अल्पसंख्यकों व गैर कश्मीरियों के पलायन से कश्मीर में अस्त-व्यस्त हो रहा जनजीवन

10/21/2021 2:50:18 AM

पाकिस्तान के शासक घाटी में रहने वाले स्थानीय अल्पसंख्यकों तथा गैर कश्मीरियों में भय पैदा करके उन्हें यहां से भगाने की मंशा से 2 अक्तूबर से अभी तक अनेक स्थानीय अल्पसंख्यकों व गैर कश्मीरियों की हत्या अपने पाले हुए आतंकवादियों से करवा चुके हैं। एक सुरक्षा अधिकारी के अनुसार, ‘‘किसी जानकार को मारने की बजाय अज्ञात की जान लेने से डर का अधिक माहौल पैदा होता है और मुझे लगता है कि आतंकवादी इसमें सफल हो गए हैं।’’ 

लगभग 50,000 कश्मीरी पंडितों और सिखों के अलावा इस समय घाटी में रोजी-रोटी के सिलसिले में पंजाब, हरियाणा, बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, राजस्थान, बंगाल और उत्तराखंड से आए 3 से 4 लाख लोग यहां छोटे-मोटे काम करके न सिर्फ अपने परिवारों का पेट पालते हैं बल्कि यहां की अर्थव्यवस्था में भी योगदान डालते हैं। इनमें गोल-गप्पे बेचने वालों, नाई, क्रिकेट के बल्ले बनाने वालों, दर्जी, बढ़ई, राज मिस्त्री, वैल्डर, खेतों और ईंट भट्ठों पर मजदूरी करने वालों, बगीचों में सेब तोडऩे वालों, स्थानीय लोगों के पास छोटी-मोटी नौकरियां करने वालों के अलावा होटलों में रसोइए, रंग-रोगन करने वाले, कपड़ों की फेरी लगाने वाले आदि शामिल हैं। श्रीनगर के ‘हवल’ में एक सड़क का नाम ही ‘छोटा बिहार’ पड़ गया है। 

इस महीने के शुरू से जारी अल्पसंख्यकों और गैर कश्मीरियों की हत्याओं के चलते ये लोग कश्मीर छोड़ कर ज्यादातर बस और टैक्सी आदि से जम्मू और ऊधमपुर रेलवे स्टेशनों पर अपने राज्यों को जाने के लिए पहुंच रहे हैं, जहां इनकी भीड़ लगी हुई है। इनका कहना है कि कश्मीर वर्षों से इनका दूसरा घर रहा है परंतु अब वे भारी मन और दुखी हृदय से इसे छोडऩे को विवश हैं। घाटी में क्रिकेट के बल्ले बनाने वाले कारखाने में काम करने वाले  छत्तीसगढ़ के रहने वाले एक मजदूर ने जम्मू रेलवे स्टेशन पर कहा, ‘‘कश्मीर जन्नत था परंतु अब यह जहन्नुम बन गया है और यहां से पलायन करने वाले बहुत से लोग अब शायद यहां वापस नहीं आएंगे।’’ 

आतंकवादियों ने अपने स्वार्थों की खातिर घाटी के लोगों के लिए परेशानी पैदा कर दी है क्योंकि सुरक्षा बलों द्वारा अब घर-घर तलाशी लेने के अलावा श्रीनगर के लाल चौक पर भी आने-जाने वाले सभी लोगों की तलाशी ली जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कश्मीर में सब कुछ थम सा गया है। बाहरी लोगों के कश्मीर छोड़ देने से यहां का व्यापार एवं अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी, महंगाई बढ़ेगी तथा निर्माण एवं विकास कार्यों में बाधा आएगी। यहां तक कि खाने-पीने की वस्तुओं और नाई, दर्जी, धोबी जैसे काम करवाने के लिए भी कठिनाई पैदा हो सकती है। खेती और बागवानी को भी आघात लगेगा क्योंकि फल तोडऩे के लिए बागानों के मालिक बाहरी मजदूरों पर ही निर्भर करते हैं। 

इसी कारण जहां स्थानीय लोगों द्वारा गैर कश्मीरियों को यहां से पलायन करने से रोकने के लिए प्रेरित किया जा रहा है वहीं मस्जिदों से भी ऐलान करके इमाम स्थानीय मुसलमानों से अपील कर रहे हैं कि वे अपने-अपने इलाकों में अल्पसंख्यकों और गैर कश्मीरियों का ध्यान रखें। इस बीच जहां आतंकवादियों पर बड़ी कार्रवाई की तैयारी में प्रशासन ने पुंछ और राजौरी के सीमावर्ती जिलों के लोगों को घरों के अंदर ही रहने का निर्देश दिया है, वहीं कुछ ऐसे लोग भी हैं जो इन मजबूर लोगों को पलायन करने से रोकने के लिए भरसक प्रयत्न कर रहे हैं तथा इसके लिए उन्होंने अपने गैर कश्मीरी कर्मचारियों के वेतन तक रोक लिए हैं। 

कुल मिलाकर पाकिस्तान के पाले हुए इन आतंकवादियों के इस दुष्कृत्य ने यहां के अल्पसंख्यकों के साथ-साथ यहां रहने वाले गैर कश्मीरियों को पलायन करने के लिए विवश करके अपने ही भाई-बंधुओं की मुश्किलें बढ़ा कर उनका जीवन दूभर कर दिया है। अत: प्रशासन को स्थानीय अल्पसंख्यकों व गैर कश्मीरियों की सुरक्षा यकीनी बनाने के लिए कठोर पग उठाने चाहिएं ताकि इनका पलायन रोक कर इस सीमांत क्षेत्र को अस्त-व्यस्त होने से बचाया जा सके।—विजय कुमार 


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