केंद्र और बंगाल सरकार का मिलजुल कर चलना ही देश हित में है

5/25/2021 5:56:40 AM

भारत में संघीय शासन प्रणाली है। यहां केंद्र में एक लोकसभा और राज्यसभा है जबकि देश के 28 राज्यों तथा 8 केंद्र शासित प्रदेशों का एक संघ है जहां अधिकांश राज्यों में विधानसभाएं व कुछ में विधान परिषदें भी हैं। 

केंद्र के हाथ में सेना, दूरसंचार, विदेश, वित्त, रेलवे, विमानन आदि महत्वपूर्ण मंत्रालय हैं। इनके अलावा केन्द्र सरकार की ऐसी अनेकों योजनाएं हैं जिन्हें जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए राज्य सरकार की प्रशासनिक मशीनरी की जरूरत पड़ती है और इस के सहयोग के बिना जनहित की इन योजनाओं को लागू कर पाना केन्द्र सरकार के लिए संभव नहीं होता। 

इसी प्रकार राज्यों को प्राकृतिक आपदा सहित कई मामलों में केन्द्र के सहयोग की जरूरत पड़ती है और किसी भी देश की खुशहाली व तरक्की के लिए केंद्र तथा राज्यों का परस्पर सहयोग से आपस में मिल कर चलना जरूरी है। कोरोना महामारी के प्रकोप के दौरान चुनाव आयोग के तौर-तरीकों के विरोध के बीच जहां बंगाल में चुनाव 8 चरणों में करवाए गए वहीं असम में 3 और केरल, तमिलनाडु व पुड्डचेरी में एक ही चरण में मतदान करवाया गया। यही नहीं, केंद्र ने पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ चुनाव प्रचार में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच तीखे कटु वचनों का आदान-प्रदान हुआ तथा चुनावी हिंसा में 2 दर्जन से अधिक राजनीतिक कार्यकत्र्ता व अन्य लोग मारे गए।

10 मार्च को नंदीग्राम में चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी के पैर में लगी चोट भी चर्चा का विषय बनी जिसे ममता ने अपने ऊपर हमला तथा भाजपा ने इसे ममता द्वारा सहानुभूति बटोरने की कोशिश बताया। हालांकि स्वयं तो ममता नंदीग्राम से शुभेंदु अधिकारी के विरुद्ध चुनाव हार गईं परंतु अपनी पार्टी को 213 सीटें जिता कर उन्होंने राज्य की सत्ता पर कब्जा करने में फिर सफलता प्राप्त कर ली।

यही नहीं, सत्ता लिप्सा के कारण या कथित रूप से ममता बनर्जी के व्यवहार से नाराज होकर कम से कम 34 विधायकों, दर्जनों अन्य नेताओं व अनेक अभिनेता-अभिनेत्रियों ने भाजपा का दामन थाम लिया। एक ओर जहां भाजपा का केंद्रीय और प्रादेशिक नेतृत्व इन दलबदलुओं को आंखें मूंद कर पार्टी में शामिल करता चला गया तो दूसरी ओर भाजपा नेताओं के एक वर्ग में इसके विरुद्ध बगावत भी शुरू हो गई। 

‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ के कुछ नेताओं को भी दलबदलुओं को पार्टी में शामिल करना पसंद नहीं था। उनका कहना था कि ज्यादातर दलबदलू ‘सत्ता के स्वार्थ’ की खातिर ही दूसरी पार्टी में जाते हैं। जहां तृणमूल कांग्रेस से आए दलबदलुओं को चुनाव लड़वाने का भाजपा का प्रयोग विफल रहा वहीं अब ममता बनर्जी की जीत के बाद सत्ता की खातिर पार्टी छोड़ कर भाजपा में गए तृणमूल कांग्रेस के एक दर्जन के लगभग विधायकों और सांसदों ने पश्चाताप करते हुए दोबारा पार्टी में वापस आने की इच्छा से ममता को पत्र लिख कर अपनी भूल के लिए माफी भी मांगी है। 

बदले हुए हालात में एक अच्छा घटनाक्रम यह हुआ है कि जहां चुनाव परिणामों के आते ही ममता बनर्जी का चोटिल पैर ठीक हो गया है वहीं बंगाल की खाड़ी के तटवर्ती राज्यों पर धावा बोलने आ रहे भयानक तूफान ‘यास’ से बचाव के लिए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा बुलाई गई वीडियो कांफ्रैंस में ममता ने शामिल होकर स्थिति से निपटने के लिए सभी एहतियाती कदम उठाने का आश्वासन दिया है। परंतु बैठक के बाद ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार पर पश्चिम बंगाल को यास तूफान के मुकाबले के लिए अग्रिम सहायता राशि के तौर पर मात्र 400 करोड़ रुपए देने पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा है कि बंगाल की तुलना में कम जनसं या वाले राज्यों को अधिक राशि दी गई है। 

पहले यह समझा जा रहा था कि ममता बनर्जी इस बैठक में शामिल नहीं होंगी परंतु केंद्र-राज्य संबंधों में यह एक सुखद मोड़ है क्योंकि दोनों को ही एक-दूसरे की जरूरत है। चुनावों के दौरान जो कुछ भी हुआ उसे भुला कर अब केंद्र और बंगाल सरकार के आपस में मिलजुल कर चलने में ही दोनों का और देश का हित है, झगड़े से किसी भी समस्या का हल नहीं होता। परस्पर सहयोग और अच्छे संबंधों में ही सफलता का रहस्य निहित है। यदि केंद्र और राज्य सरकार के संबंध अच्छे होंगे तो इससे जहां विकास योजनाएं समय पर पूरी होंगी और प्रशासनिक तालमेल बढ़ेगा, वहीं इससे देश का संघीय ढांचा भी मजबूत होगा।—विजय कुमार


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