श्रीलंका में दोनों शीर्ष पदों पर विराजमान ‘भारत मित्र’ रानिल और दिनेश

punjabkesari.in Monday, Jul 25, 2022 - 05:09 AM (IST)

इस वर्ष के शुरू में श्रीलंका अपने शासकों राजपक्षे परिवार के भ्रष्टाचार और देश पर चढ़े भारी कर्ज के बोझ के कारण अभूतपूर्व संकट में फंस गया,जिसका परिणाम अंतत: देश में जनविद्रोह के पश्चात राजपक्षे परिवार के सत्ताच्युत होने और नई सरकार के गठन के रूप में निकला। तेजी से चले घटनाक्रम में पूर्व प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को श्रीलंका का राष्ट्रपति तथा पूर्व विदेश एवं शिक्षा मंत्री दिनेश गुणवर्धने को प्रधानमंत्री चुन लिया गया है। 

ये दोनों भी श्रीलंका के भूतपूर्व शासकों राजपक्षे परिवार के निकट माने जाते हैं, परंतु सबसे बड़ी बात यह है कि इन दोनों का ही भारत के साथ गहरा और सकारात्मक लगाव रहा है। हालांकि लोगों ने जनविद्रोह के दौरान कहा था कि राजपक्षे परिवार से संबंध रखने वाला कोई भी व्यक्ति अगली सरकार में शामिल न हो। मगर फिर भी उनका ऐसा विचार था कि थोड़े समय के लिए ऐसे लोगों को मौका दिया जाए।

श्रीलंका को आर्थिक संकट से उबरने में मदद के लिए भारत ने इस वर्ष की शुरूआत से अब तक 4 अरब डॉलर दिए हैं और यह राशि श्रीलंका की सहायता में आगे आए अन्य सभी राष्ट्रों से अधिक है। 6 बार श्रीलंका के प्रधानमंत्री रह चुके रानिल विक्रमसिंघे का दशकों से भारत के प्रति झुकाव रहा है। अतीत में अपने देश में अनेक सफल आर्थिक परियोजनाओं को लागू करने वाले रानिल विक्रमसिंघे एक चतुर राजनेता और प्रशासक होने के कारण ‘फॉक्स’ (लोमड़ी) के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। 

रानिल जो अपने शुरूआती करियर में एक टैक्नोक्रेट और वकील रह चुके हैं, श्रीलंका के पिछले शासकों के विपरीत चीन, विशेष रूप से इसकी सैन्य महत्वाकांक्षाओं के समर्थक नहीं हैं। उन्होंने वर्षों से कई विकास परियोजनाओं पर भारत के साथ मिल कर काम किया है तथा हाल ही में उन्होंने इंटरनैशनल मोनेटरी फंड (आई.एम. एफ.)के साथ एक राहत पैकेज के लिए बातचीत की है। 

1994 से 2001 और 2004 से 2015 तक वह विपक्ष के नेता भी रहे हैं। वह एक राजनीतिक परिवार से संबंध रखते हैं और 10 वर्ष से अधिक समय तक श्रीलंका के राष्ट्रपति रह चुके जे.आर. जयवर्धने के भतीजे हैं।

रानिल विक्रमसिंघे की भांति ही देश के नए प्रधानमंत्री दिनेश गुणवर्धने,  जो इससे पहले गोटबाया राजपक्षे तथा महिंदा राजपक्षे की सरकार में विदेश तथा शिक्षा मंत्री थे,भी भारत के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं और उनके परिवार का भारत से गहरा नाता रहा है और समूचा गुणवर्धने परिवार भारत का समर्थक रहा है। इनके पिता फिलिप गुणवर्धने को श्रीलंका में समाजवाद के जन्मदाता के रूप में जाना जाता है। फिलिप गुणवर्धने ने 1920 के दशक में भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया, जिसमें उनकी पत्नी भी उनके साथ थीं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान श्रीलंका से भागने के बाद फिलिप और उनकी पत्नी कुसुमा ने भारत में शरण ली और भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहे भूमिगत स्वतंत्रता सेनानियों के समूह में शामिल हो गए। 

1943 में इन दोनों को इंगलैंड के गुप्तचरों ने पकड़ कर कुछ समय तक मुम्बई की आर्थर रोड जेल में भी रखा था, जहां से एक वर्ष के बाद उन दोनों को वापस श्रीलंका भेज दिया गया और स्वतंत्रता के बाद रिहा कर दिया गया था। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में इनके योगदान के लिए अपनी कोलम्बो यात्रा के दौरान उनके घर जाकर व्यक्तिगत रूप से गुणवर्धने परिवार को धन्यवाद दिया था। फिलिप गुणवर्धने विस्कांसिन विश्वविद्यालय में लोकनायक जयप्रकाश नारायण और भारत के प्रथम रक्षा मंत्री वी.के. कृष्णा मैनन के सहपाठी रह चुके थे। 

बेशक, रानिल विक्रमसिंघे और दिनेश गुणवर्धने दोनों ही श्रीलंका के पूर्व शासक राजपक्षे परिवार के नजदीकी रहे हैं,परंतु इन दोनों की ही कार्यशैली राजपक्षे परिवार से बहुत भिन्न है तथा अब आने वाले दिनों में अपने देश को इस संकट से निकालने में उनकी सफलता या विफलता से उनकी प्रशासनिक क्षमता का पता भी चल जाएगा। जहां तक इन दोनों के भारत के प्रति झुकाव का संबंध है, भारत इस अवसर का उपयोग श्रीलंका को चीन के प्रभाव से निकालने के लिए कर सकता है जिसकी मिसाल भारत ने संकट के ऐसे समय में अन्य देशों की तुलना में श्रीलंका की सबसे अधिक सहायता देना शुरू करके पेश की है। 

दिनेश गुणवर्धने के सामने सर्वोपरि चुनौती देश को अब तक के सबसे खराब आर्थिक संकट से बाहर निकालने के लिए रुके काम दोबारा शुरू करने की है, जिसके कारण बड़े पैमाने पर देश में खाद्यान्न, दवाओं तथा ईंधन की कमी पैदा हो गई है।  


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