भारतीय प्रतिनिधिमंडल की अफगानिस्तान यात्रा आगाज तो अच्छा है...

punjabkesari.in Saturday, Jun 04, 2022 - 03:53 AM (IST)

अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता संभालने के बाद से वहां गरीबी और भुखमरी पहले की तुलना में बढ़ी है। अफगानिस्तान में तालिबानियों ने सत्ता पर तो कब्जा जमा लिया है लेकिन इस समय वहां के लोग अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए जूझ रहे हैं। 

अत: अफगानिस्तान के लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार अब तक वहां 20 हजार मीट्रिक टन गेहूं, 13 टन दवाएं, कोविड रोधी वैक्सीन की 5 लाख खुराकें और सर्दियों के मौसम में इस्तेमाल किए जाने वाले कपड़े आदि जीवनोपयोगी वस्तुएं भेज चुकी है। अपने मानवीय सहायता अभियान का जायजा लेने और अफगानिस्तान की सहायता करने के संबंध में तालिबान नेताओं से बातचीत के लिए भारतीय विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव जे.पी. सिंह के नेतृत्व में अफगानिस्तान गया प्रतिनिधिमंडल वहां अनेक नेताओं से मिला। 

तालिबान के विदेश मंत्री ‘अमीर खान मुत्तकी’ तथा उप विदेश मंत्री ‘शेर मोहम्मद अब्बास स्टानेकजई’ से भारतीय प्रतिनिधिमंडल की वार्ता वहां सत्ता पलट के बाद दोनों देशों के बीच अब तक की सबसे उच्च स्तरीय वार्ता है जिसे अफगान विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ‘अब्दुल्ल काहर बाल्खी’ ने अच्छी शुरूआत बताया है।‘अब्दुल काहर बाल्खी’ ने हाल ही में मानवीय आधार पर दी गई सहायता के लिए भारत का धन्यवाद किया तथा भारत में रहने वाले अफगान नागरिकों को जरूरी सुविधाएं देने का अनुरोध भी किया। 

अफगानिस्तान के सभी 34 प्रांतों में भारत की 400 से अधिक परियोजनाएं चल रही हैं। भारत ने वहां संसद भवन तक का निर्माण करने के अलावा हर क्षेत्र के विकास में बढ़-चढ़ कर योगदान डाला है। इनमें सड़कें, स्कूल, अस्पताल, बांध, बिजली सबस्टेशन, दूरसंचार नैटवर्क, बिजली ट्रांसमिशन लाइनें, सोलर पैनल लगाने जैसी परियोजनाएं शामिल हैं। उक्त परियोजनाओं पर भारत ने अफगानिस्तान में लगभग 3 अरब डालर का निवेश किया है जबकि भारत ने पिछले वर्ष ही वहां 8 करोड़ डालर के विभिन्न प्रोजैक्ट शुरू करने की घोषणा की है। इस दौरे के दौरान भारतीय प्रतिनिधिमंडल वहां भारत की सहायता से निर्मित अस्पताल, स्कूल और बिजली प्लांट के अलावा अन्य परियोजनाएं देखने गया। 

हालांकि भारत ने अभी तालिबान शासन को मान्यता नहीं दी तथा गत वर्ष अगस्त महीने में तालिबानियों द्वारा सत्ता पर कब्जा कर लेने के बाद वहां के बुरे हालात देखते हुए भारतीय कर्मचारियों को वापस बुला लिया गया था परंतु वहां काम करने वाले अफगान कर्मचारी लगातार भारतीय दूतावास परिसर की देखभाल करते रहे थे। दोनों देशों के पुराने कूटनीतिक संबंधों को देखते हुए इस यात्रा को महत्वपूर्ण माना जा रहा है जिसके बारे में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ‘अरिंदम बागची’ ने कहा है कि ‘‘यदि भारत व तालिबान में समझौता होता है तो वह अफगानिस्तान के साथ पिछले ऐतिहासिक समझौतों की बुनियाद पर ही होगा।’’ 

भारत द्वारा अफगानिस्तान की सहायता पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए ‘हक्कानी नैटवर्क’ के सरगना और अफगानिस्तान के गृह मंत्री ‘सिराजुद्दीन हक्कानी’ के भाई एवं तालिबान के वरिष्ठ नेता ‘अनस हक्कानी’ ने कहा है कि : 

‘‘भारत के लिए अफगानिस्तान के दरवाजे हमेशा खुले हुए हैं और हमने दोनों देशों के संबंधों को मजबूत करने पर जोर दिया है। अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार बनने के बाद शांति और विचार-विमर्श का समय आ गया है। अब हमारे पास दुनिया, विशेषकर भारत सहित पड़ोसी देशों के लिए ‘इस्लामिक अमीरात आफ अफगानिस्तान’ की नीति है।’’ ‘‘आइए और हमारे साथ पुराने दोस्तों की तरह रहिए। हम चाहते हैं कि भारत अपना दूतावास फिर खोले। अफगानिस्तान की ‘इस्लामिक अमीरात सरकार’ अपने देश में भारतीय राजनयिक मिशन, परियोजनाओं और व्यापारियों को सुरक्षा देने के लिए बाध्य है।’’ 

उल्लेखनीय है कि अफगानिस्तान में तालिबान मुक्त शासन के दौरान हमेशा भारत के अफगानिस्तान के साथ रिश्ते अच्छे तथा तालिबान के शासन के दौरान खराब ही रहे हैं। यह पहला मौका है जब भारत के अफगानिस्तान में तालिबान के शासन वाली सरकार के साथ औपचारिक रिश्ते बनने जा रहे हैं। बदले हुए हालात में भारतीय प्रतिनिधिमंडल की अफगानिस्तान यात्रा के परिणामों का पता तो बाद में ही चलेगा, फिलहाल इतना अवश्य कहा जा सकता है कि यह शुरूआत अच्छी है। हालांकि हमें अफगानिस्तान के साथ संबंधों को आगे बढ़ाते हुए फूंक-फंूक कर कदम रखना होगा परंतु यह भारत के लिए उसके साथ संबंध सुधारने का एक अच्छा अवसर है अत: भारत को इस मामले में आगे बढऩा चाहिए।—विजय कुमार 


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