महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे बने मुख्यमंत्री ‘कुफ्र टूटा खुदा-खुदा करके’

punjabkesari.in Friday, Jul 01, 2022 - 05:23 AM (IST)

महाराष्ट्र में जारी राजनीतिक संकट के बीच जब राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी द्वारा मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को 30 जून को विधानसभा में अपना बहुमत सिद्ध करने का आदेश देने के विरुद्ध दायर याचिका सुप्रीमकोर्ट ने 29 जून को रद्द करके 30 जून को ही फ्लोर टैस्ट करवाने का आदेश दिया तो इसके कुछ ही देर बाद 29 जून रात को डेढ़ बजे उद्धव ठाकरे ने त्यागपत्र देने की घोषणा कर दीे। इसके बाद लग रहा था कि दो सप्ताह से जारी हलचल समाप्ति की ओर है लेकिन आज जो उलटफेर हुआ उससे सब हैरान रह गए। भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडऩवीस की ताजपोशी की तैयारी शुरू कर दी और 30 जून को भाजपा नेतृत्व द्वारा अगली रणनीति के बारे में विचार-विमर्श किया जाता रहा। 

इसी दिन दोपहर के समय शिंदे की मुम्बई पहुंच कर देवेन्द्र फडऩवीस से लम्बी मुलाकात के बाद दोनों ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से भेंट की और शिंदे ने राज्यपाल को 49 विधायकों के समर्थन का पत्र सौंप कर राज्य में सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया। उस समय तक देवेन्द्र फडऩवीस के ही दोबारा मुख्यमंत्री बनने और शिंदे के उप-मुख्यमंत्री बनने के अनुमान लगाए जा रहे थे परन्तु बाद में देवेन्द्र फडऩवीस और एकनाथ शिंदे के संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में देवेन्द्र फडऩवीस ने एकनाथ शिंदे को राज्य का मुख्यमंत्री बनाए जाने की घोषणा करके सभी को हैरान कर दिया। इसी के अनुरूप शिंदे ने मुख्यमंत्री तथा बाद में नड्डा के कहने पर फडऩवीस ने उप-मुख्यमंत्री की शाम साढ़े सात बजे शपथ ग्रहण कर ली है, हालांकि पहले उन्होंने कहा था कि वह सरकार में कोई पद नहीं लेंगे। 

अब भाजपा शिंदे के नेतृत्व में बागी शिवसेना विधायकों की मदद से 31 महीने बाद सत्ता में लौट रही है। 2019 में जब महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में 105 सीटों के साथ भाजपा बहुमत वाला दल था, तब फडऩवीस को मुख्यमंत्री बनाया गया पर वह करीब 4 दिन तक ही सत्ता में रह सके। जाहिर है कि उद्धव ठाकरे के सत्ता से हट जाने से फडऩवीस का शिवसेना से बदला पूरा हो गया है और इसके साथ ही वह एक किंग मेकर के रूप में उभर कर सामने आए हैं। बेशक एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठेंगे लेकिन कुदरती तौर पर बात तो 49 विधायकों वाले की बजाय 105 विधायकों वाले की ही चलेगी। 

प्रश्र उठता है कि अब उद्धव ठाकरे का क्या होगा। इन हालात के लिए उनकी कुछ गलतियां भी जिम्मेदार हो सकती हैं। उद्धव ठाकरे अपने पिता की तरह लचीले नहीं हैं और उनकी गफलत का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उन्हें इस बात का पता भी नहीं चला कि कब उनकी पार्टी के सदस्य सूरत और वहां से गुवाहाटी चले गए। उल्लेखनीय है कि शिंदे को ठाणे के प्रभावशाली व्यक्ति के रूप में जाना जाता है। अब जबकि जल्दी ही ठाणे नगर निगम और मुम्बई कार्पोरेशन के चुनाव आने वाले हैं जिनमें एकनाथ शिंदे के बहाने भाजपा को सत्ता में अपनी वापसी का अवश्य मौका मिल सकता है। 

जो भी हो एक बार फिर महााराष्ट्र में शिवसेना की फूट उजागर हो गई है। इससे पहले शिवसेना में छगन भुजबल, नारायण राणे तथा  उद्धव ठाकरे के चचेरे भाई राज ठाकरे ने बगावत की थी और उद्धव के ही साथी ने उन्हें सत्ता में बिठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बाद उनका साथ छोड़ दिया है। इस बीच शिंदे ने 2-3 जुलाई को विधानसभा का सत्र बुला लिया है जिसमें वह बहुमत सिद्ध करेंगे और नए स्पीकर का चुनाव भी किया जाएगा। भाजपा ने स्वयं पीछे रह कर एकनाथ शिंदे के गुट को सत्ता सौंप कर अच्छा ही किया है क्योंकि इस बात का क्या भरोसा कि एकनाथ शिंदे की सरकार टिकेगी भी या नहीं और यदि गिरेगी तो बदनामी उसी की होगी। 

बहरहाल इस सम्बन्ध में वास्तविक फैसला तो जनता के ही हाथ में है और उद्धव को भी पता चल जाएगा कि प्रदेश की जनता उनके साथ है या नहीं। इस बीच एक अन्य घटनाक्रम में शिंदे और फडऩवीस के शपथ ग्रहण के जल्दी ही बाद आयकर विभाग ने 2004, 2009, 2014 और 2020 में दायर चुनावी हल्फनामों के सम्बन्ध में शरद पवार को नोटिस थमा दिया है, अब आगे-आगे देखिए होता है क्या।—विजय कुमार


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