ऑफ द रिकॉर्डः बच्चों के लिए मोदी का मिड-डे मील उपहार

नेशनल डेस्कः सरकार द्वारा नियुक्त विशेषज्ञों की समिति ने सिफारिश की थी कि स्कूल मिड-डे मील योजना के तहत खाने में अनाज की कुछ सामग्री को घटाया जाए और घी या तेल की मात्रा को दोगुना किया जाए। आधिकारिक सूत्रों ने कहा कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने मार्च, 2016 के बाद से इन सिफारिशों पर कोई कार्रवाई नहीं की जब एम्स में बाल चिकित्सा विभाग के तत्कालीन प्रमुख विनोद के. पाल ने अपनी रिपोर्ट दी थी। मिड-डे मील में अनाज की मात्रा को कम करने का सुझाव राजनीतिक रूप से सही नहीं और यह एक चुनावी मुद्दा बन सकता है। प्राइमरी श्रेणी (1 से 5) के छात्रों के लिए मील में घी या तेल 5 ग्राम होता है।

प्राइमरी से ऊपर के विद्यार्थियों (श्रेणी 6 से 8) के लिए घी या तेल की मात्रा 7.5 ग्राम है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक मील में प्राइमरी विद्यार्थियों के लिए अनाज या चावल की मात्रा 100 ग्राम, प्राइमरी के ऊपर के बच्चों के लिए मील में चावल और गेहूं की मात्रा 150 ग्राम होती है। इसके साथ सब्जियां और दालें भी होती हैं। यह पाया गया कि विभिन्न अवसरों पर बच्चे अक्सर चावल और गेहूं को पूरा नहीं खाते। अब जबकि देश चुनावों की ओर अग्रसर है तो मोदी सरकार की आंखें खुली हैं। ऐसी चर्चा है कि सरकार मिड-डे मील में योगदान कम से कम 33 प्रतिशत बढ़ाएगी।

इस प्रस्ताव में बदलाव का अर्थ होगा कि प्रत्येक मील की लागत 4.13 रुपए से बढ़ कर 6.18 रुपए प्राइमरी स्तर पर और 5.88 रुपए से बढ़कर 8.88 रुपए ऊपरी प्राइमरी स्तर पर होगी। देश में 11.5 लाख सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में लगभग 10 करोड़ बच्चों को हर रोज मिड-डे मील सर्व किया जाता है। इसका साधारण अर्थ यह है कि सरकार को अक्तूबर से मिड-डे मील योजना के लिए प्रति वर्ष और 5000 करोड़ रुपए खर्च करने होंगे। कैबिनेट शीघ्र ही इस मुद्दे पर फैसला ले सकती है।

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