Kundli Tv- रामचरितमानस: कभी न करें स्त्री का अपमान वरना पक्की है आपकी हार

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हिंदू धर्म में गोस्वामी तुलसीदास जी का बहुत अहम रोल रहा है। इन्होंने महान ग्रंथ  श्रीरामचरितमानस की रचना की, जिसमें इन्होंने न केवल श्रीराम की जीवनी पर प्रकाश डाला बल्कि इस ग्रंथ के जरिए इन्होंने समाज में स्त्रियों की महत्ता को भी लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया। तो आइए आज हम जानते हैं कि इन्हीं के महान ग्रंथ की कुछ चौपाईयां जिसमें इन्होंने नारी के बारे में अपने विचार सांझे किए हैं। 


जननी सम जानहिं पर नारी ।
तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे।।
अर्थात:
गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि जो पुरुष अपनी पत्नी के सिवाए अन्य स्त्री को अपनी मां को समान समझता है, उसके दिल में भगवान रहते हैं। वहीं इसके उल्ट जो व्यक्ति अपनी पत्नी के होते हुए भी किसी अन्य स्त्री से संबंध रखता है, उसे शास्त्रों में पापी माना जाता है। एेसे लोगों पर कभी ईश्वर की कृपा नहीं होती, क्योंकि भगवान एेसे लोगों से दूर रहते हैं। 

धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी।
आपद काल परखिए चारी।।
अर्थात:
अपनी इस चौपाई में तुलसीदास जी ने मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए जिन प्रमुख लोगों के योगदान की चर्चा की है, उसमें नारी को विशेष रूप से शामिल किया गया है। तुलसीदास जी कहते हैं कि धीरज, धर्म, मित्र और नारी की परीक्षा कठिन परिस्थितियों में ही की जा सकती है।

सो परनारि लिलार गोसाईं। 
तजउ चउथि के चंद कि नाईं।।
अर्थात:
तुलसीदास जी इस चौपाई के जरिए मनुष्यों को समझाने के प्रयास कर रहे हैं कि जो व्यक्ति अपना कल्याण, सुंदर यश, सुबुद्धि, शुभ गति और नाना प्रकार के सुख चाहता हो, वह उसी प्रकार स्त्री का मुख न देखें जैसे लोग चौथ के चंद्रमा को नहीं देखते। तुलसीदास जी ने लोगों को इस चौपाई के जरिए स्त्री के सम्मान को सुरक्षित करते हुए मनुष्य को कुदृष्टि से बचने को कहा है। 

मूढ़ तोहि अतिसय अभिमाना।
नारी सिखावन करसि काना।।
अर्थात:
तुलसीदास जी इस दोहे में यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि अगर कोई आपके फायदे की बात कर रहा हो तो आप अपने अभिमान को भूलकर उसे स्वीकार कर लें। रामचरितमानस के इस दोहे में प्रभु श्री राम सुग्रीव के बड़े भाई बाली के सामने एक स्त्री का सम्मान करते हुए कहते हैं कि दुष्ट बाली, तुम तो अज्ञान पुरुष हो ही, लेकिन अभिमान के चलते तुमने अपनी विद्वान पत्नी की बात भी नहीं मानी और इसलिए तुम हार गए। 
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