ऑफ द रिकॉर्डः मोदी-RSS संबंधों में नई मिठास

नेशनल डेस्कः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आर.एस.एस. नेतृत्व को खुश रखने के लिए कई कदम उठा रहे हैं। अपने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तुलना में मोदी ने आर.एस.एस. के साथ हमेशा ही सौहार्दपूर्ण संबंध रखे हैं। मगर मोदी ने वही काम किया जो उनको सही लगा और इस संबंध में उन्होंने आर.एस.एस. प्रमुख मोहन भागवत द्वारा दिए गए सुझावों की भी उपेक्षा की। मोदी ने इस बात को यकीनी बनाए रखा कि दोनों के बीच संचार व्यवस्था कभी न टूटे। चुनावी वर्ष में स्थितियां अलग हो सकती हैं और राजनीतिक मजबूरियों ने मोदी को अपना काम करने का ढंग बदलने के लिए मजबूर किया है। मोदी ने शुक्रवार को आर.एस.एस. नेताओं के साथ डिनर बैठक की थी, उन्होंने अगले दिन भी इन नेताओं को फिर बुलाकर विस्तार से संगठनात्मक और राजनीतिक चर्चा की।
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आर.एस.एस.-भाजपा नेताओं ने सूरजकुंड में 3 दिवसीय शिखर सम्मेलन का आयोजन किया जिसमें देश भर के नेता शामिल हुए और वहां प्रत्येक राज्य की समस्याओं को हल करने के हर मुद्दे पर चर्चा की गई। इस प्रक्रिया में मोदी ने अपने कुछ पुराने साथियों के साथ भी चर्चा की जिनके साथ उन्होंने काम किया था। यह एक असामान्य बात है क्योंकि भाजपा अध्यक्ष का एकमात्र काम है कि वे आर.एस.एस. नेतृत्व से मुलाकात करें और उनको सारी जानकारी दें और इसके बाद वह दोनों फैसले लें।
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मोहन भागवत को छोड़कर आर.एस.एस. के सभी प्रमुख नेता उस बैठक में मौजूद थे जहां 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए तैयारियों की निर्णायक समीक्षा की गई थी। यह फैसला लिया गया कि आर.एस.एस. नेतृत्व को मोदी सरकार को फिर सत्ता में लाने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगाना होगा। इस वार्तालाप दौरान ही मोदी जम्मू-कश्मीर में पी.डी.पी. के साथ संबंधों को तोड़ने पर राजी हुए थे। आर.एस.एस. ने हमेशा ही भाजपा-पी.डी.पी. के संबंधों का कड़ा विरोध किया। मगर बाद में इस बात पर राजी हुआ क्योंकि मोदी वैश्विक संदेश देने के लिए वहां एक परीक्षण करना चाहते थे। अब आर.एस.एस. खुश है और उसका कहना है, ‘‘देर आयद दुरुस्त आयद।’’

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