दूध के मिलावटखोरों ने स्वास्थ्य के साथ-साथ डेयरी के धंधे को भी किया बर्बाद

पंजाब के लोगों का अच्छा स्वास्थ्य, सुडौल शरीर तथा लम्बे-चौड़े कद का मुख्य कारण बढिय़ा खुराक यानी दूध व दूध से बने पदार्थ जैसे कि माखन, दही, पनीर, लस्सी आदि हैं, जोकि आजकल कालाबाजारी तथा मिलावटखोरों के गोरखधंधे के कारण ‘चिट्टे’ से भी अधिक खतरनाक जहर बनकर हर उम्र और वर्ग के लोगों के स्वास्थ्य को बर्बाद कर रहा है। 

जब हम अस्पतालों में बच्चों, जवानों तथा बुजुर्गों को लगी नामुराद बीमारियों जैसे कि अचानक गुर्दों का फेल होना, लिवर खराब होना, हृदयाघात, पत्थरी तथा पेट की अन्य बीमारियों को  देखते हैं तो इन सबका मुख्य कारण खतरनाक रसायनों से बने नकली दुग्ध पदार्थ ही हैं। यह गोरखधंधा करने वाले अपनी डेयरियों, फैक्टरियों के माध्यम से नकली दुग्ध पदार्थ बनाते समय सर्फ, यूरिया, सिंथैटिक पाऊडर व नकली घी, मावा आदि का बड़ी ही बेरहमी से इस्तेमाल करते हैं, जोकि स्वास्थ्य के लिए अत्यंत खतरनाक हैं। इसलिए सरकारों को इस धंधे पर तुरंत रोक लगाने के लिए कड़े कदम उठाने की जरूरत है। 

आज किसानों को अपनी फसलों की लागत के अनुसार पूरी कीमत नहीं मिल रही और उनकी हालत अत्यंत दयनीय हो गई है। एक ओर देश के हर कोने में किसान अपनी फसलों की लागत के अनुसार सही कीमत लेने के लिए संघर्ष कर रहा है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण लोगों का मुख्य सहायक धंधा डेयरी फार्मिंग इन मिलावटखोरों के कारण बंद होने की कगार पर है क्योंकि मिलावटखोरों के कारण इनको अपने दूध की सही कीमत नहीं मिल पाती। खल, दाना, चारा आदि महंगा होने के कारण लोगों ने पशु रखने कम कर दिए हैं। जहां ग्रामीण अपने घरों में  4-5 पशु रखते थे, अब यह संख्या कम होकर एक-दो ही रह गई है। गांव में बगैर जमीन वाले गरीब लोगों के लिए तो यह रोजगार का अच्छा साधन है जिससे घर का हर बुजुर्ग, जवान, महिलाएं तथा बच्चे काम में लगे रहते हैं। मगर यह धंधा लगभग में बंद होने की कगार पर है। 

गत दिनों मिलावटखोरी के खिलाफ सरकार काफी सक्रिय नजर आई। पंजाब में कई स्थानों पर फूड सेफ्टी तथा स्वास्थ्य विभाग ने अचानक डेयरियों, दूध के कारखानों तथा खाने-पीने वाली वस्तुएं बनाने वाली फैक्टरियों पर अचानक छापेमारी की और विशेष तौर पर पटियाला के आसपास तथा पटियाला क्षेत्र में मिलावटी दूध से बने पदार्थ बड़ी मात्रा में पकड़े। मिलावटखोरी संबंधी प्राप्त आंकड़ों के अनुसार देश में 68 प्रतिशत दूध व दुग्ध उत्पाद खाद्य सुरक्षा तथा गुणवत्ता अथारिटी के मापदंडों पर खरे नहीं उतरते, जो अत्यंत चिंता की बात है। सरकारों को इस समस्या की ओर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। 

कुछ वर्ष पूर्व कुछ सामाजिक कार्यकत्र्ताओं ने मिलकर मिलावटखोरों के विरुद्ध आवाज उठाई थी और वे मांग करते थे कि दूध का सर्वे किया जाए और मिलावटखोरों के दूध की आवाजाही की जांच की जाए। मगर यह गोरखधंधा करने वाले लोगों ने कोई परवाह नहीं की क्योंकि इनको अफसरशाही तथा राजनीतिक लोगों की शह प्राप्त थी, उलटे सामाजिक कार्यकत्र्ताओं के खिलाफ ही कानूनी कार्रवाई करने की धमकी देकर उनकी आवाज दबा दी गई। मौजूदा समय में वेरका मिल्कफैड, जो किसानों के इस सहायक धंधे का सच्चा मित्र बनकर सामने आया, वह भी पिछले कुछ समय से घाटे में जा रहा है, जिसका मुख्य कारण मिलावटी दुग्ध पदार्थ ही हैं क्योंकि भोले-भाले लोग सस्ता समझ कर स्थानीय डेयरियों से दूध खरीद लेते हैं। 

किसानों का डेयरी फार्मिंग को सहायक धंधे के तौर पर कम अपनाने का एक कारण यह है कि किसानों को अपने पशुओं के अच्छे स्वास्थ्य तथा बीमारियों आदि का इलाज करवाने के लिए अत्यंत मुश्किलों का सामना करना पड़ता है क्योंकि पशु अस्पताल बहुत कम हैं और जो हैं भी वहां दवाओं तथा स्टाफ की कमी है। किसानों को अपने पशुओं का इलाज करवाने के लिए झोलाछाप डाक्टरों से ही काम चलाना पड़ता है। अत: कुल मिलाकर सरकार को डेयरी फार्मिंग के धंधे को बचाने के लिए कोई ठोस नीति बनानी चाहिए। नकली दूध और दुग्ध उत्पाद बनाने वालों के खिलाफ कानूनी शिकंजा कसना चाहिए। पंजाबी लोग, जो सुबह उठते ही दूध तथा दूध से बने पदार्थों के साथ अपने दिन की शुरूआत करते हैं, कम से कम उनके दिन का आगाज तो शुद्ध पदार्थों से हो, यही मेरी कामना है।-सुखदर्शन सिंह मिहोण

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