independence day:1947 में आजादी का जश्न मना रहा था देश, पर उपवास कर रहे थे गांधी

नेशनल डेस्कः भारत देश इस बार अपनी आजादी की 72वीं सालगिरह मना रहा है। स्वतंत्रता दिवस को लेकर हर भारतीय नागरिक के दिल में एक अलग ही अनुभूति होती, सिर गर्व से ऊंचा और सीना चौड़ा होता है। ये आजादी हमें ऐसे ही नहीं मिली। हमारे कई वीर सपूतों ने भारत माता को आजाद करवाने के लिए अपनी कुर्बानियां दी हैं। उन कुर्बानियों की बदौलत ही आज हम खुली हवा में, बिना किसी बंदिशों के सांस ले रहे हैं। अहिंसा के पुजारी और आजादी की लड़ाई के मुख्य नायक महात्मा गांधी की स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका थी। स्वतंत्रता संग्राम की जंग में शुरू से लेकर अंत तक बापू डटे रहे और आखिरकार 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ। पर क्या आप जानते हैं कि जिस दिन देश आजाद हुआ तो देशवासी खुशी से जश्न मना रहे थे और महात्मा गांधी उस दिन भी उपवास पर थे। 


स्वतंत्रता दिवस को लेकर कुछ खास बातें

  • आजाद मुल्क के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने लाल किले से तिरंगा फराया।
  • जनता सड़कों पर जश्न मना रही थी। देशवाली आजादी की सुबह का आनंद उठा रहे थे। सभी तरफ उल्लास और खुशी का माहौल था पर बापू इनसबसे दूर कोलकाता में थे।
  • देश को आजादी तो मिली थी लेकिन जाते-जाते ब्रिटिश सरकार बंटवारे की चिंगारी भड़का गई। बंटवारे की ही शर्त पर देश आजाद हुआ था।
  • कभी एकसाथ घुलमिल कर रहने वाले हिंदू-मुस्लिम बंटवारे के समय दंगों की पीड़ा झेल रहे थे। 
  • महात्मा गांधी इस बंटवारे और देश में हो रहे दंगों से काफी दुखी थे और वे बंगाल चले गए। इसलिए उन्होंने आजादी के जश्न में हो रहे किसी भी समागम और समारोह में हिस्सा नहीं लिया। 
  • कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता गांधी को मनाने बंगाल भी गए लेकिन उन्होंने सबको वापिस लौटा दिया। 
  • बंटवारे से दुखी बापू ने आजादी की पहली सुबह भी उपवास रखा और उन्होंने चरखा कातते हुए कई पत्रों के जवाब भी दिए थे। 
  • वहीं कहा ये भी जाता है कि आजादी मिलने से कुछ समय पहले गांधी और नेहरू के बीच मतभेद पैदा हो गए थे। 
  • महान समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया की किताब 'भारत विभाजन के गुनहगार’ में इस बात का जिक्र आता है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल ने महात्मा गांधी को बंटवारे के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं दी थी। 
  • किताब में लोहिया कांग्रेस कार्यकारिणी समिति की उस बैठक का भी जिक्र किया है जिसमें गांधी नेहरू और पटेल से पूछते हैं कि उन्हें बंटवारे के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई। इस पर नेहरू ने गांधी को बीच में ही टोकते हुए कहा कि उनको हर सूचना दी गई थी।
  • गांधी नेहरू के रवैये से आहत थे लेकिन परिस्थितियों को भांपते हुए उन्होंने मौन रहना ही उचित समझा और वे तब उस दिन हर समागम से दूर रहे।

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