माघ पूर्णिमा 2019 : आज पूरा हो जाएगा कल्पवास, जानें महत्व

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तीर्थराज प्रयाग में गंगा-यमुना और अदृश्य सरस्वती के मिलन स्थल पर कल्पवास की परंपरा आदिकाल से चली आ रही है। इसका आरंभ 21 जनवरी को पौष पूर्णिमा के साथ हुआ था। कुछ लोग मकर संक्रांति से भी कल्पवास आरंभ करते हैं। ऐसा माना जाता है कि प्रयाग में सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के साथ शुरू होने वाले एक मास के कल्पवास से एक कल्प (ब्रह्मा का एक दिन) का पुण्य मिलता है।

इस वर्ष अद्र्धकुंभ होने से इसका महत्व और ज्यादा बढ़ गया है। आदिकाल से चली आ रही इस परंपरा के महत्व की चर्चा वेदों से लेकर महाभारत और राम चरितमानस में अलग-अलग नामों से मिलती है। आज भी कल्पवास नई और पुरानी पीढ़ी के अध्यात्म की राह का एक पड़ाव है जिसके जरिए स्वनियंत्रण और आत्मशुद्धि का प्रयास किया जाता है।

बदलते समय के अनुरूप कल्पवास करने वालों के तौर-तरीके में कुछ बदलाव जरूर आए हैं लेकिन कल्पवास करने वालों की संख्या में कमी नहीं आई है।

कल्पवास की शुरूआत के पहले दिन तुलसी और शालिग्राम की स्थापना और पूजन होता है। कल्पवासी अपने टैंट के बाहर जौ का बीज रोपित करता है। कल्पवास की समाप्ति पर इस पौधे को कल्पवासी अपने साथ ले जाता है जबकि तुलसी को गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है।

कल्पवास के लिए वैसे तो उम्र की कोई बाध्यता नहीं है लेकिन माना जाता है कि संसारी मोह-माया से मुक्त और जिम्मेदारियों को पूरा कर चुके व्यक्ति को ही कल्पवास करना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि जिम्मेदारियों से बंधे व्यक्ति के लिए आत्मनियंत्रण कठिन माना जाता है।

मिथिलावासी मकर संक्रांति को काफी महत्व देते हैं इसलिए वह मकर संक्रांति से ही माघ मेले में पहुंच जाते हैं और मकर संक्रांति से माघी पूर्णिमा तक कल्पवास करते हैं। हालांकि ऐसे लोगों की संख्या कम होती है। पौष पूर्णिमा से कल्पवास आरंभ होता है और माघी पूर्णिमा के साथ संपन्न होता है। 

एक माह तक चलने वाले कल्पवास के दौरान कल्पवासी को जमीन पर शयन करना होता है। इस दौरान फलाहार, एक समय का आहार या निराहार रहने का प्रावधान है। कल्पवास करने वाले व्यक्ति को नियमपूर्वक 3 समय गंगा स्नान और यथासंभव भजन-कीर्तन, प्रभु चर्चा और प्रभु लीला का दर्शन करना चाहिए।

कल्पवास की शुरूआत करने के बाद इसे 12 वर्षों तक जारी रखने की परंपरा है।

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