इस मंदिर में बलि देने के बाद भी जीवित रहता है बकरा, जानें कैसे ?

ये नहीं देखा तो क्या देखा (VIDEO)
आप में से बहुत से लोगों ने सुना होगा कि प्राचीन समय में कुछ पशुओं आदि की बलि देने का रिवाज़ था। जिसके चलते काफ़ी समय यानि कई सालों तक मंदिर व धार्मिक स्थलों में बलि देने की पंरपरा चलती रही। पौराणिक मान्यताओं के मानें तो यज्ञ-हवन आदि करने के बाद देवी-देवता को खुश करने के लिए बलि का रास्ता चुनते थे। तो आज हम आपको इससे ही जुड़ा कुछ बताने वाले हैं जिसे सुनकर शायद आप हैरान हो जाएंगे।

आप सब ने ऐसे कई मंदिरों के बारे में सुना होगा कि जहां जानवरों की बलि दी जाती है लेकिन क्या आपने कभी ये सुना है कि किसी किसी पशु की बलि दी जाए लेकिन उसके खून की एक बूंद भी न बहे। जानकर थोड़ी हैरानी हुई, थोड़ी नहीं बहुत हैरानी हुई होगी। अब मानें या न मानें मगर बिहार के कैमूर भभुआ की एक ऊंची पहाड़ी पर मां मुंडेस्वरी मंदिर स्थित है जहां कुछ ऐसा ही नज़ारा देखने को मिलता है। यहां की प्रचलित मान्यताओं के अनुसार है कि यहां बकरे की बलि देने से सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है। लेकिन दंग करने वाली बात तो ये है कि बकरे की बलि देने के बाद भी बकरे के शरीर से एक बूंद भी खून नहीं निकलता।


जानते हैं मंदिर से जुड़ा अद्भूत चमत्कारी रहस्य-
इस मंदिर में अष्टाकार गर्भगृह के कोने में देवी
मंदिर में मां मुंडेस्वरी की दिव्य प्रतिमा के साथ-साथ अष्टधातु से बना एक अनूठा चतुर्मुखी शिवलिंग स्थापित है। बताया जाता है मुंडेश्वरी माता जैसा स्वरूप पूरी दुनिया में और कहीं नहीं देखने को नहीं मिलता है। पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर के रास्ते में दोनों तरफ़ गणेश जी, शिव जी की पत्थरों पर अनेक कलाकृतियां बनी हुई है।

चावल का लगता है भोग
बताया जाता है कि मां मुंडेश्वरी धाम में माता रानी को केवल चावल जिसे यहां तांडुल भी कहते हैं, का भोग ही लगता था और प्रसाद में तौर पर भी यही तांडुल भक्तों में वितरित किया जाता था। मान्यता है कि इस प्रसाद को खाने से अनेक बीमारिया स्वतः ही ठीक हो जाती हैं।

पशु बलि
इस मंदिर की सबसे बड़ी और अद्भुत विशेषता ये है कि यहां पशु बलि की सात्विक परंपरा है। जिसके अनुसार यहां बकरे की बलि तो दी जाती है, लेकिन उसकी हत्या नहीं की जाती। अब आप सोच रहे होंगे कि आख़िर ये कैसे संभव है तो आपको बता दें कि इस मंदिर में ऐसा ही है।


पौराणिक कथाओं के अनुसार चंड-मुंड के नाश के लिए देवी दुर्गा ने मां मुंडेश्वरी का अद्भूत रूप धारण किया था और इसी पहाड़ी में छिपे चंड-मुंड का यही इस ही स्थान पर वध किया था। जिसके बाद से यहां माता की मां मुंडेश्वरी रूप में पूजा शुरु हुई थी।  

यहां श्रद्धालु भक्त अपनी कामनाओं की पूर्ति के बकरे की सात्विक बलि देते हैं लेकिन माता रक्त की बलि नहीं लेतीं, जब बलि देने के लिए बकरे को माता की मूर्ति के सामने लाया जाता है तो पुजारी 'अक्षत' (चावल के दाने) को मां मुंडेश्वरी की मूर्ति को स्पर्श कराकर बकरे पर फेंकते हैं और बकरा उसी क्षण अचेत,  मृतप्राय सा हो जाता है। थोड़ी देर के बाद अक्षत फेंकने की प्रक्रिया दोहराई जाती है, जिसके बाद बकरा उठ खड़ा होता है तो उसे मुक्त कर दिया जाता है।

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