Kundli Tv- प्रदोष काल में ब्रह्मांड को खुश करने के लिए भगवान शंकर करते हैं ये काम!

पुराणों और ज्योतिष के अनुसार सावन में शिव शंकर की पूजा का विशेष महत्व है, लेकिन श्रावण की मासिक शिवरात्रि व प्रदोष व्रत का अपना एक खास महात्म है। शास्त्रों के अनुसार भोलेनाथ की पूजा करने के लिए सबसे पवित्र प्रदोष व्रत को माना गया है। दिन का अंत और रात की शुरूआत के बीच का समय ही प्रदोष काल कहलाता है। इस समय में की गई शिव पूजा का फल बेहद बढ़ जाता हैं, साथ ही इस समय में की गई आराधना से साधक की हर इच्छा पूरी होती है।
 

ब्रह्मांड को खुश करने के लिए शिव करते हैं नृत्य-
मान्यता है कि प्रदोष काल में कैलाशपति भगवान शिव जी कैलाश पर्वत पर डमरु बजाते हुए बहुत प्रसन्नचिेत हृदय से ब्रह्मांड को खुश करने के लिए नृत्य करते हैं। देवी देवता उनको और अधिक प्रसन्न करने के लिए शिव शंभू की स्तुति करते हैं। मां सरस्वती वीणा बजाकर, इन्द्र वंशी धारणकर, ब्रह्मा ताल देकर, माता महालक्ष्मी गाना गाकर, भगवान विष्णु मृदंग बजाकर भगवान शिव की वंदना करते हैं। यक्ष, नाग, गंधर्व, सिद्ध, विद्याधर व अप्सराएं  तक भी प्रदोष काल में भगवान शिव की स्तुति में लीन हो जाते हैं।


शिव-पार्वती को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है प्रदोष व्रत
हर माह की त्रयोदशी तिथि में सूर्यास्त के समय को ‘प्रदोष’ कहा जाता है, कहा जाता है कि इस प्रदोष काल में गई शिव पूजा और उपवास रखने से भगवान शिव प्रसन्न हो जाते हैं। शास्त्रानुसार प्रदोष व्रत रखने से दो गायों को दान करने के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है।


मिट जाती है दरिद्रता
दरिद्रता और ऋण के भार से दु:खी व संसार की पीड़ा से व्यथित मनुष्यों के लिए प्रदोष पूजा व व्रत पार लगाने वाली नौका के समान है। ‘प्रदोष स्तोत्र’ में कहा गया है- यदि दरिद्र व्यक्ति प्रदोष काल में भगवान गौरीशंकर की आराधना करता है तो वह धनी हो जाता है और यदि राजा प्रदोष काल में शिवजी की प्रार्थना करता है तो उसे दीर्घायु की प्राप्ति होती है, वह सदैव निरोग रहता है, और राजकोष की वृद्धि व सेना की बढ़ोत्तरी होती है।

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