मीडिया की स्वतंत्रता का दमन करते हैं ‘मानहानि व गोपनीयता’ जैसे कानून

बौद्धिक बेईमानी, आडम्बर, झूठे तर्क तथा सही और गलत के बारे में पक्षपातपूर्ण राजनीति के बढ़ते दायरे के बीच भारतीय मीडिया की एकमात्र ताकत रही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी पिछले कुछ दिनों में खतरे में देखी गई है। भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग का राजनीतिकरण कर दिया गया है, जिसका पहला शिकार बना है सत्य। हमने इसकी उम्मीद नहीं की थी। मीडिया की जटिल दुनिया में हम हमेशा यह उम्मीद करते हैं कि बुद्धिजीवी वर्ग देश में हो रही प्रमुख घटनाओं के प्रति उदासीन बन कर नहीं रहेगा लेकिन आजकल ऐसा हो रहा है।

मीडिया का चेहरा बदला
हम मानते हैं कि कोई लोकतंत्र तभी फलता-फूलता है जब बुद्धिजीवी वर्ग, जिसमें मीडिया कर्मी भी शामिल हैं, लोगों का सही मार्गदर्शन करता है तथा सच्चाई (पक्षपात रहित सच्चाई)को देश के सामने रखता है। लेकिन पिछले कुछ समय में मीडिया का चेहरा भी बदल गया है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो प्रिंट और इलैक्ट्रानिक मीडिया का एक वर्ग बड़े औद्योगिक घरानों का हिस्सा बन चुका है, जो राजनीतिक दलों तथा उनके हितों से जुड़े हुए हैं। हम जानते हैं कि इस तरह के ‘निर्देशित तंत्र’ के क्या नुक्सान होते हैं। मैं मीडिया के बदलते चेहरे के मामले में विस्तार में नहीं जाना चाहता। संतोषजनक बात यह है कि मीडिया कर्मियों का एक बड़ा वर्ग स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति तथा जनता के सूचना के अधिकार की रक्षा के लिए आज भी पूर्ण रूप से सजग है।

‘द हिन्दू’ में एन. राम द्वारा राफेल डील पर की गई रिपोर्टिंग के मामले में द एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, प्रैस क्लब ऑफ इंडिया तथा वूमैन्स प्रैस एसोसिएशन द्वारा एक संयुक्त वक्तव्य में सरकार के रुख की आलोचना तथा सरकारी गोपनीयता कानून (ओ.एस.ए.) तथा मानहानि कानून पर पुनॢवचार की मांग की गई है। यह बात हौसला बढ़ाने वाली है। यह मुश्किलों के बावजूद मीडिया कर्मियों के संघर्ष करने की ताकत को दर्शाता है। मुझे याद है कि कैसे सभी पत्रकार तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के खिलाफ हो गए थे, जब वह मीडिया की स्वतंत्रता को कुचलने के लिए मानहानि विधेयक लेकर आए थे।

इससे पहले इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लगाए जाने का भी मीडिया ने विरोध किया था। उस समय उच्चतम न्यायपालिका ने भी ‘समर्पित न्यायपालिका’ के माहौल के सामने हथियार डाल दिए थे। यहां तक कि आम लोगों ने भी इसका विरोध किया था। मैं इन ऐतिहासिक तथ्यों का जिक्र यह बताने के लिए कर रहा हूं कि लोकतंत्र की सफलता के लिए जागरूकता जरूरी है। इसलिए जानकारी और विचारों का स्वतंत्र प्रवाह भी आवश्यक है।

मैं इन मसलों को भारतीय मीडिया की दुनिया में हुई कुछ खराब घटनाओं की रोशनी में उठा रहा हूं। पहला, द शिलांग टाइम्स के सम्पादक और प्रकाशक के खिलाफ मेघालय कोर्ट का आदेश, जिसमें सम्पादक और प्रकाशक को अवमानना का दोषी माना गया तथा उन पर दो-दो लाख का जुर्माना डाला गया। इस बीच खुशी की बात यह है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने 15 मार्च को मेघालय हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जोकि मीडिया की स्वतंत्रता के मामले में बड़ी राहत है।

इसके अलावा हमारे सामने एक अन्य बड़ा मामला ‘द हिन्दू’ में राफेल डील के बारे में इस समाचारपत्र के चेयरमैन एन. राम द्वारा प्रकाशित समाचारों का है। मैं एन. राम को व्यक्तिगत तौर पर जानता हूं। वह एक विश्वसनीय और प्रोफैशनल पत्रकार हैं जिनकी ईमानदारी पर कोई संदेह नहीं है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि ‘‘हमने जो प्रकाशित किया है वह बिल्कुल सही है तथा जनहित में है।’’ उन्होंने कहा कि हमने राफेल डील के दस्तावेज नहीं चुराए हैं तथा विशेष तौर पर यह भी कहा कि ‘‘हम अपने सूत्रों का खुलासा नहीं करेंगे।’’ एन. राम ने बिल्कुल सही कहा, जिनकी निष्पक्षता और व्यावसायिक योग्यता के लिए मैं उनकी प्रशंसा करता हूं।

मीडिया कर्मियों पर दोधारी तलवार
सरकार चाहे कोई भी हो, मीडिया कर्मियों के ऊपर हमेशा दोधारी तलवार लटकती रहती है, विशेष तौर पर जब वह खोजी प्रकृति का काम करते हैं। इसमें एक है मानहानि कानून और दूसरा सरकारी गोपनीयता कानून (ओ.एस.ए.)। कुल मिलाकर इनका परिणाम उन सम्पादकों, प्रकाशकों तथा पत्रकारों की प्रताडऩा के रूप में सामने आता है, जो सत्य के साथ खड़े होते हैं।

पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी भी यह स्वीकार करते थे कि ओ.एस.ए. निरंकुश तथा अप्रासंगिक कानून है। ऐसे कानूनों से छुटकारा पाने के लिए मीडिया कर्मियों को ही आगे आना चाहिए तथा न्यायपालिका की सहायता और समर्थन से ही यह सम्भव हो सकता है। अफसोसजनक बात यह है कि भारत के वी.वी.आई.पी. ऐसे मसलों पर उस समय चुप्पी साध लेते हैं जब वे सत्ता में होते हैं तथा सत्ता से बाहर होने पर ऐसे मसलों को जोर-शोर से उठाते हैं। मुझे याद है कि यू.पी.ए. के शासनकाल में कुछ मंत्रियों ने इस संबंध में आवश्यक कदम उठाने का वायदा किया था लेकिन हुआ कुछ भी नहीं।

जमीनी हकीकत अलग
राफेल डील का मामला ही ले लीजिए, इस समय यह बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। मैं इस मामले में भाजपा और कांग्रेस के राजनीतिक खेल में नहीं जाना चाहता। भारत में हथियारों की खरीद के लिए नियम-कायदे बने हैं, जिनमें दलालों की कोई भूमिका नहीं है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है। बोफोर्स तोपों की खरीद के मामले में हमने यह देखा है कि इस संबंध में भी द हिन्दू के एन. राम तथा इंडियन एक्सप्रैस ने खोजी खबरें छापी थीं। यह गैर पारदर्शी सिस्टम का उदाहरण था। आज नरेन्द्र मोदी के शासन में भी यही हो रहा है।

विस्तृत परिप्रेक्ष्य में एन. राम ने ये खबरें प्रकाशित कर प्रशंसनीय कार्य किया है। अटार्नी जनरल वेणुगोपाल ने पहले यह दावा किया कि एन. राम ने रक्षा मंत्रालय से ‘चोरी किए गए’ दस्तावेज प्रकाशित किए लेकिन बाद में वह अपनी बात से मुकर गए और कहा कि ये फोटो प्रतियां थीं। एन. राम ने स्पष्ट किया है कि उन्होंने इस जानकारी के लिए कोई पैसा नहीं दिया है तथा जनहित में उन्हें यह जानकारी अपने आप मिली है। मेरा मानना है कि गोपनीयता लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है क्योंकि यह अप्रत्यक्ष तौर पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है इसलिए कम से कम गोपनीयता और अधिक से अधिक पारदर्शिता भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति के लिए जरूरी है, जो लोकतंत्र की मजबूती में भी सहायक है।-हरि जयसिंह        

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