Kumbh Mela 2019 Prayagraj: जानें, क्यों मनाया जाता है कुंभ

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गंगा, यमुना, सरस्वती, कावेरी, गोदावरी, कृष्णा, सिंधु, क्षिप्रा, ब्रह्मपुत्र आदि सभी नदियों के अपने-अपने संगम हैं। हिंदू धर्म के तीन देवता हैं शिव, विष्णु और ब्रह्मा और तीन देवियां हैं पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती। इसीलिए सभी जगह त्रिवेणी का महत्व और बढ़ जाता है। त्रिवेणी का अर्थ है वह स्थान जहां तीन नदियां आकर मिलती हों। जहां तीन नदियों का संगम होता हो।  प्रयाग की गंगा नदी में एक स्थान ऐसा है जहां तीन नदियों का मिलन होता है।

संगम और त्रिवेणी वस्तुत: एक ही स्थान है जहां गंगा, यमुना, सरस्वती का संगम होता है। यह दुर्लभ संगम विश्व प्रसिद्ध है। गंगा, यमुना के बाद भारतीय संस्कृति में सरस्वती को महत्व अधिक मिला है। हिंदू धर्म के अधिकतर तीर्थ नदियों के तट पर ही बसे हुए हैं। उसमें भी जहां तीन नदियों का संगम हो रहा है वह स्थान महत्वपूर्ण माना जाता है। प्रयाग संगम पर गंगा और यमुना नदी अलग-अलग नजर आती हैं लेकिन कहते हैं कि उसी में सरस्वती भी मिली हुई है जो अलग नजर नहीं आती।

सरस्वती नदी के साथ अद्भुत ही बात है कि प्रत्यक्ष तौर पर सरस्वती नदी का पानी कम ही स्थानों पर देखने को मिलता है। इसका अस्तित्व अदृश्य रूप में बहता हुआ माना गया है। जैसे ग्रहों में सूर्य तथा तारों में चंद्रमा है वैसे ही तीर्थों में संगम को सभी तीर्थं का अधिपति माना गया है तथा सप्तपुरियों को इसकी रानियां कहा गया है। 

कुंभ पर्व की एक कथा
कुंभ पर्व की एक कथा प्रजापति कश्यप की पत्नियों कद्रू और विनता के बीच हुई तकरार से संबंधित है। कथा कुछ इस प्रकार है- एक बार प्रजापति कश्यप की पत्नियों कद्रू और विनता के बीच सूर्य के अश्व (घोड़े) काले हैं या सफेद विषय को लेकर विवाद छिड़ गया। विवाद ने प्रतिष्ठा का रूप ले लिया और शर्त लग गई कि जिसकी बात झूठी निकलेगी वह दासी बनकर रहेगी। कद्रू के पुत्र थे‘नागराज वासुकि’ और विनता के पुत्र थे ‘वैनतेय गरुड़’। कद्रू ने विनता के साथ छल किया और अपने नागवंश को प्रेरित करके उनके कालेपन से सूर्य के अश्वों को ढक दिया। फलत: विनता शर्त हार गई और उसे दासी बनकर रहना पड़ा।

इस पर कद्रू ने गरुड़ से कहा कि यदि नागलोक में वासुकि से रक्षित ‘अमृत कुम्भ’ जब भी कोई ला देगा, तब मैं विनता को दासत्व से मुक्ति दे दूंगी। कद्रू के मुख से उपाय सुनकर स्वयं गरुड़ ने नागलोक जाकर वासुकि से अमृत कुंभ अपने अधिकार में ले लिया और अपने पिता कश्यप मुनि के उत्तराखंड में गंध मादन पर्वत पर स्थित आश्रम के लिए वह चल पड़े। उधर वासुकि ने देवराज इंद्र को अमृत हरण की सूचना दे दी।

‘अमृत कुंभ’ को गरुड़ से छीनने के लिए देवराज इंद्र ने गरुड़ पर चार बार हमला किया जिससे मार्ग में पडऩे वाले स्थलों प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और त्र्यंबकेश्वर (नासिक) में कलश से अमृत छलक कर गिर पड़ा। उक्त चारों स्थलों पर अमृतपात की स्मृति में कुंभ पर्व मनाया जाने लगा।

कुंभ के बारे में कितना जानते हैं आप !

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