ऑफ द रिकॉर्डः दिल्ली में कांग्रेस के लिए केजरीवाल एक पहेली

नेशनल डेस्कः कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की समान विचार वाली पार्टियों के साथ गठबंधन करने या सीटों का तालमेल बनाने की योजना को पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और दिल्ली में काफी बड़ी रुकावट का सामना करना पड़ रहा है। शेष राज्यों में क्षेत्रीय दलों के साथ कांग्रेस की बातचीत सुचारू ढंग से चल रही है क्योंकि गुलाम नबी आजाद, अहमद पटेल और कमलनाथ जैसे 3 वरिष्ठ नेता मैत्रीपूर्ण समझौते की बातचीत को अंतिम रूप देने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं।


बसपा के साथ बातचीत धीमी गति से प्रगति पर है और वह सही रास्ते पर है क्योंकि मायावती कांग्रेस के साथ अखिल भारतीय गठबंधन चाहती हैं। कमलनाथ इस बात पर जोर दे रहे हैं कि गठबंधन राज्य-दर-राज्य स्तर पर होना चाहिए क्योंकि प्रत्येक राज्य में राजनीतिक स्थिति अलग-अलग तरह की है। वह चाहते हैं कि अन्य राज्यों में गठबंधन होने के साथ ही मायावती भी समझौते में शामिल हों मगर सबसे बड़ी समस्या दिल्ली में है जहां लोकसभा की 7 सीटें हैं।

शीला दीक्षित और अजय माकन के साथ कटु संबंध होने के बावजूद ‘आप’ सीटों पर तालमेल करने की इच्छुक है। अगर सूत्रों पर विश्वास किया जाए तो ‘आप’ ने अजय माकन के लिए नई दिल्ली, संदीप दीक्षित के लिए ईस्ट दिल्ली और कांग्रेस के एक अन्य उम्मीदवार के लिए आऊटर दिल्ली की सीट की पेशकश की है मगर कांग्रेस अधिक सीटें चाहती है, यद्यपि वह दिल्ली में कमजोर स्थिति में है और पार्टी में फूट है।‘आप’ की दलील है कि दिल्ली में चतुष्कोणीय मुकाबला होगा।

कांग्रेस, भाजपा, ‘आप’ और बसपा अलग-अलग चुनाव लड़ती हैं तो भाजपा का सभी सातों सीटें जीतना यकीनी है। गेंद अब राहुल गांधी के पाले में है। इसी तरह कांग्रेस इस मामले को लेकर दुविधा में है कि क्या वह पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के साथ जाए या फिर माकपा के साथ। अहमद पटेल और ममता बनर्जी के बीच हुई बैठक में कुछ सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं मगर अनिश्चितता अभी बरकरार है। आंध्र प्रदेश में भी गंभीर समस्या मौजूद है जहां कांग्रेस को सहयोगी दल ढूंढने में संघर्ष करना पड़ रहा है। जगनमोहन रैड्डी की वाई.एस.आर. कांग्रेस की अपनी समस्याएं हैं और वह कांग्रेस के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन नहीं चाहती।

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