कश्मीरी पुलिस कर्मी की पत्नी की वेदना

कश्मीर में एक पुलिस कर्मी होना कठिन है और संभवत: एक पुलिस कर्मी की पत्नी होना और भी मुश्किलों भरा है। एक पुलिस अधिकारी की पत्नी आरिफा तौसिफ ने घाटी में पुलिस कर्मियों के परिवारों के सामने दरपेश मुश्किलों और दर्द की भावपूर्ण अभिव्यक्ति एक पत्र में की है। 

आरिफा एक आई.सी.डी.एस. सुपरवाइजर हैं और उन्होंने एक स्थानीय वैबसाइट को लिखे अपने पत्र में कहा है कि पुलिस कर्मियों की पत्नियां अत्यधिक संवेदनशील होती हैं क्योंकि उनमें हमेशा असुरक्षा की भावना रहती है। उनके अनुसार दिन-ब-दिन जोखिम तथा खतरे बढ़ते जा रहे हैं। किसी भी अन्य स्थान पर किसी पुलिस कर्मी के आतंकवादियों के हाथों शहीद होने पर उनका जीवन और अधिक असुरक्षित तथा चिंताजनक बन जाता है। आरिफा ने बताया कि उन्होंने यह लेख उस दिन लिखने का निर्णय किया जब गत माह उन्हें अपने बच्चों से झूठ बोलना पड़ा कि उनके पिता ईद मनाने के लिए उनके पास आएंगे। 

आरिफा ने अपने लेख में लिखा है कि ‘‘यह केवल अकेले बच्चों के पालन-पोषण करने का मामला नहीं है। हम सबसे बड़े झूठे हैं। हम झूठ बोलते हैं कि हम इस सप्ताहांत पर पिकनिक पर जा रहे हैं। हम यह झूठ बोलते रहते हैं कि पिता इस ईद पर अथवा उस शादी पर शामिल होने के लिए आ रहे हैं। हम उनके (पुलिस कर्मी के) बुजुर्ग बीमार माता-पिता से यह झूठ बोलते रहते हैं कि वह आजकल में आने वाले हैं। हम खुद अपने आप से झूठ बोलते हैं।’’ 

राज्य पुलिस को आतंकवादी हमलों की आंच सहनी पड़ी है जिसने गत तीन दशकों में अपने 1660 व्यक्ति खोए हैं, जिनमें इस वर्ष अगस्त तक शहीद हुए 3 दर्जन पुलिस कर्मी शामिल हैं। उनमें से बहुत से अपने घरों में परिवारों के साथ छुट्टियां बिता रहे थे जब उनकी हत्या की गई। सर्वाधिक प्रभावित दक्षिण कश्मीर में बहुत से पुलिस कर्मियों ने अपने परिवारों के पास जाना बहुत कम कर दिया है। यहां तक कि ईद पर भी एक अधिकारी सहित तीन पुलिस कर्मी तीन आतंकवादी हमलों में शहीद हुए जिस कारण पुलिस कर्मियों के परिवारों में और अधिक डर पैदा हो गया। वह लिखती हैं कि ‘‘केवल अकेले सोना ही सबसे अधिक तनावपूर्ण (चीज) नहीं है, मगर मध्यरात्रि में इधर-उधर घूमना असहज, थकाऊ तथा घुटन भरा होता है। जब हम किसी भी तरह की पीड़ा में होती हैं तो हमें दिलासा देने के लिए कोई हमारे आस-पास नहीं होता।’’ 

ऐसा लगता है कि जिस चीज ने आरिफा को सबसे अधिक आहत किया है वह है पुलिस परिवारों की सामाजिक स्वीकार्यता और वह खुल कर इस पर चर्चा करती हैं। वह लिखती हैं कि समाज की बदलती राजनीतिक विचारधारा लोगों को यह समझाना मुश्किल बना देती है कि पुलिस विभाग में नौकरी करने का मतलब कभी भी किन्हीं विशेष लोगों से विश्वासघात नहीं होता। इसलिए तनाव उस समय और भी बढ़ जाता है जब आप घर से बाहर होते हैं क्योंकि किसी भी दुर्भाग्यपूर्ण घटना (उदाहरण के लिए किसी का पैलेट गन से घायल होना) के लिए लोग कहीं न कहीं हमें जिम्मेदार मानते हैं। और फिर जब किसी पुलिस कर्मी के साथ कुछ अनहोनी होती है तो शायद ही कोई हमारे साथ संवेदना व्यक्त करने के लिए होता है। 

आरिफा ने अफसोस व्यक्त करते हुए कहा कि पत्रकार शुजात बुखारी पर हुए आतंकवादी हमले में शहीद हुए दो पुलिस कर्मियों के बारे में शायद ही कोई जानता हो। हालांकि आरिफा अपनी इस बात पर अटल हैं कि कश्मीरी युवाओं के लिए पुलिस में शामिल होना हमेशा चुनाव का मामला नहीं होता। अधिकतर ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि आजीविका के लिए यहां विकल्पों का अत्यंत अभाव है।-मुजफ्फर रैना

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