ऑफ द रिकॉर्डः मणिशंकर के बाद कांग्रेस के लिए जयराम रमेश बने सिरदर्द

नेशनल डेस्कः राहुल गांधी को कांग्रेस पार्टी में जयराम रमेश की पहेली का सामना करना पड़ रहा है, यद्यपि वह शिक्षित हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था का अच्छा अध्ययन करने वाले हैं। जयराम रमेश 1991 से कांग्रेस से जुड़े हुए हैं जब वह तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के सलाहकार बने थे। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। वह 2004 के बाद से राज्यसभा के सदस्य बने हुए हैं। वह कैबिनेट मंत्री के पद पर भी रहे। वह राहुल गांधी के करीबी समझे जाते हैं। अगर खबरों पर विश्वास किया जाए तो उन्हें 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए 15, गुरुद्वारा रकाबगंज मार्ग पर स्थित कांग्रेस वार रूम का चार्ज भी दिया गया है। वह 2004 के बाद से वार रूम का एक हिस्सा रहे हैं।
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सोनिया गांधी की जीत के बाद उनका ग्राफ लगातार बढ़ता गया। वह संभवत: अकेले ही ऐसे ‘सैनिक’ हैं जो पार्टी प्रमुख नेताओं के अभिभाषण अपने लैपटॉप से हर समय लिखने को तैयार रहते हैं। उनके भारतीय उद्योगपतियों के साथ अच्छे संबंध नहीं और सत्ता के गलियारे में चर्चा है कि वह चीन के हाथों में खेल रहे हैं। रमेश ने अपने राजनीतिक जीवन में कभी भी पीछे मुड़ कर नहीं देखा लेकिन उन्होंने हाल ही में राहुल गांधी से भी कन्नी काटी।
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ऐसी चर्चा है कि उन्होंने सैफुद्दीन सोज द्वारा कश्मीर पर लिखी विवादास्पद पुस्तक के विमोचन में शामिल होकर पार्टी के निर्देश का उल्लंघन किया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि पी. चिदम्बरम ने भी निमंत्रण मिलने के बावजूद समारोह से दूरी बनाए रखी। यहां तक कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने समारोह में न शामिल होने का फैसला किया यद्यपि शुरू में वह इसके लिए तैयार हो गए थे। रमेश ने समारोह में हिस्सा लिया और राहुल गांधी इससे खुश नहीं। मालूम हुआ है कि रमेश अब प्रियंका गांधी की मदद से कांग्रेस अध्यक्ष को शांत करने की कोशिश कर रहे हैं।

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