Kundli Tv- जगन्नाथ रथयात्रा की तैयारियां ज़ोरों पर

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पुरी में 14 जुलाई को निकलने वाली विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा की तैयारियां जोरों पर चल रही हैं जिसमें विश्व के कोने-कोने से लगभग 2 लाख श्रद्धालु शामिल होंगे। पुरी की परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ, भाई बलदेव व बहन सुभद्रा तीन रथों पर सवार होकर श्रद्धालुओं पर अपनी कृपा दृष्टि बरसाने के लिए उन्हें दर्शन देंगे। प्रतिवर्ष नए रथों का निर्माण किया जाता है। इस वर्ष अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर नए रथों का निर्माण शुरू हो चुका है। तीन विशाल रथों के निर्माण के लिए लगभग 200 कारीगर दिन-रात जुटे हुए हैं। आयोजकों के अनुसार रथयात्रा वाले दिन भगवान जीऊ ही रथ पर सवार होते हैं। वहां का राजा स्वर्ण मंडित झाड़ू लगाकर रथयात्रा का शुभारंभ करवाता  है। रथयात्रा जगन्नाथ मंदिर से शुरू होकर लगभग 4 मील की दूरी पर गुडिचा मंदिर (मौसी घर) सूर्य अस्त होने से पहले पहुंच जाती है। वहां भगवान 10 दिन विश्राम करते हैं, फिर वापस बहुड़ा यात्रा द्वारा मंदिर पधारते हैं। 

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उल्लेखनीय है कि पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर भारत के चार पवित्र धामों में से एक है। वर्तमान मंदिर 800 वर्ष से अधिक प्राचीन है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण जगन्नाथ रूप में विराजित हैं। साथ ही यहां उनके बड़े भाई बलराम (बलभद्र या बलदेव) और उनकी बहन देवी सुभद्रा की पूजा की जाती है।

पुरी रथयात्रा के लिए बलराम, श्रीकृष्ण और देवी सुभद्रा के लिए तीन अलग-अलग रथ निर्मित किए जाते हैं। रथयात्रा में सबसे आगे बलराम जी का रथ, उसके बाद बीच में देवी सुभद्रा का रथ और सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ श्रीकृष्ण का रथ होता है। इसे उनके रंग और ऊंचाई से पहचाना जाता है।

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बलराम जी के रथ को ‘ताल ध्वज’ कहते हैं, जिसका रंग लाल और हरा होता है। देवी सुभद्रा के रथ को ‘दर्पदलन’ या ‘पद्म रथ’ कहा जाता है, जो काले या नीले और लाल रंग  का होता है, जबकि भगवान जगन्नाथ के रथ को ‘नंदीघोष’ या ‘गरुड़ ध्वज’ कहते हैं। इसका रंग लाल और पीला होता है।

भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ 45.6 फुट ऊंचा, बलराम जी का ताल ध्वज रथ 45 फुट ऊंचा और देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ 44.6 फुट ऊंचा होता है। ये सभी रथ नीम की पवित्र और परिपक्व काष्ठ (लकडिय़ों) से बनाए जाते हैं। इसके लिए नीम के स्वस्थ और शुभ पेड़ की पहचान की जाती है जिसके लिए जगन्नाथ मंदिर एक खास समिति का गठन करता है।

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इन रथों के निर्माण में किसी भी प्रकार के कील या कांटे या अन्य किसी धातु का प्रयोग नहीं होता। रथों के लिए काष्ठ का चयन बसंत पंचमी के दिन से शुरू होता है और उनका निर्माण अक्षय तृतीया से प्रारंभ होता है।

जब ये तीनों रथ तैयार हो जाते हैं तब ‘छर पहनरा’ नामक अनुष्ठान सम्पन्न किया जाता है। इसके तहत पुरी के गजपति राजा पालकी में यहां आते हैं और इन तीनों रथों की विधिवत पूजा करते हैं और ‘सोने की झाड़ू’ से रथ मंडप और रास्ते को साफ करते हैं।

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आषाढ़ माह की शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि को रथयात्रा आरंभ होती है।  ढोल, नगाड़ों, तुरही और शंखध्वनि के बीच भक्तगण इन रथों को खींचते हैं। कहते हैं जिसे रथ को खींचने का अवसर प्राप्त होता है वह महाभाग्यवान माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार रथ खींचने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती है। शायद यही बात भक्तों में उत्साह, उमंग और अपार श्रद्धा का संचार करती है।

वास्तव में रथयात्रा एक सामुदायिक पर्व है। इस अवसर पर घरों में कोई भी पूजा नहीं होती है और न ही किसी प्रकार का उपवास रखा जाता है। एक अहम बात यह है कि रथयात्रा के दौरान यहां किसी प्रकार का जातिभेद देखने को नहीं मिलता। समुद्र किनारे बसे पुरी नगर में होने वाली जगन्नाथ रथयात्रा उत्सव के समय आस्था और विश्वास का जो भव्य वैभव और विराट प्रदर्शन देखने को मिलता है वह दुनिया में अन्यत्र दुर्लभ है।
 

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