क्या प्रियंका गांधी से डर गई भाजपा

क्या भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) प्रियंका गांधी से डर गई है। क्या बुआ-बबुआ की जोड़ी यानी अखिलेश यादव और मायावती भी प्रियंका से डर गए हैं। क्या भाजपा से ज्यादा अखिलेश और मायावती डर रहे हैं या भाजपा खेमे में ज्यादा हलचल है। एक छोटी-सी कविता है...जब एक डर दूसरे डर के विरुद्ध होता है, युद्ध होता है। चुनावी युद्ध में सभी दलों के डर सामने आ रहे हैं। भाजपा के डर में हालांकि खुशी भी शामिल है। भाजपा को लगता है कि प्रियंका के आने से यू.पी. में कुछ जगह चुनाव त्रिकोणीय हो जाएगा और उसका लाभ भाजपा को ही मिलेगा लेकिन भाजपा को इससे बड़ा डर दूसरा है।

प्रियंका गांधी जिस तरह से आम जनता के बीच जाकर आम जनता की भाषा में सीधे चूल्हे-चौके से जुड़े सवाल उठा रही हैं, नौकरियों की बात कर रही हैं और किसानों के दर्द को सामने ला रही हैं उससे भाजपा को डर है। प्रियंका जिस सहज सरल ङ्क्षहदी में आम जनता के बीच जाकर आम बातें कर रही हैं उससे भाजपा डर रही है। असली डर यही है कि कहीं प्रियंका चुनाव का पूरा नैरेटिव यानी कथानक तो नहीं बदल रही हैं। इस समय कथानक राष्ट्रवाद है जो पुलवामा और बालाकोट के बाद भाजपा के पक्ष में दिख रहा है लेकिन भाजपा को डर है कि कहीं प्रियंका की सांची बात इसे किसानों-नौजवानों में न बदल दे। 

भाजपा को डर
भाजपा को डर है तभी अहमदाबाद में प्रियंका के सात मिनट के भाषण के बाद भाजपा ने स्मृति ईरानी को मैदान में उतारा। स्मृति ईरानी ने रॉबर्ट वाड्रा और राहुल गांधी के साथ-साथ पहली बार प्रियंका गांधी को जमीनखोरी के मामले में लपेटा। तीनों को रक्षा सौदों के दलालों से पैसे लेकर जमीन खरीदने-बेचने वाला बताया। इसके बाद कुछ अन्य भाजपा नेताओं के ऊल-जलूल बयान आए। कला संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने पप्पू-पप्पी की बात कह दी। इससे भी साफ हो गया कि भाजपा प्रियंका से डर रही है। भाजपा प्रियंका से इसलिए भी डर रही है क्योंकि वह बिना गाली-गलौच के बात कर रही हैं। बशीर बद्र का एक शेर है... तू इधर-उधर की न बात कर, तू यह बता कि कारवां क्यों लुटा, मुझे रहजनों से गर्ज नहीं, तेरी रहबरी का सवाल है। यही सवाल भाजपा को परेशान कर रहे हैं क्योंकि प्रियंका गांधी बिना पी.एम. मोदी को चोर कहे...उनकी रहबरी यानी चौकीदारी पर सवाल उठा रही हैं।

भाजपा डर रही है क्योंकि कांग्रेस को भी एक ऐसा नेता मिल गया है जो भाषण देना जानता है, जो मन की बात करना जानता है। कहने को तो भाजपा के पास प्रियंका गांधी वाड्रा की काट करने वाले दर्जनों नेता हैं। सबसे बड़े तो खुद नरेन्द्र मोदी हैं जो भाषण देने के मामले में सौ पर भारी पड़ते हैं लेकिन भाजपा फिर भी प्रियंका से डर रही है क्योंकि उसे लगता है कि वह जनता का ध्यान अपनी तरफ खींच सकती है। भाजपा प्रियंका से डर रही है क्योंकि उसे लग रहा है कि भले ही प्रियंका यू.पी. तक सीमित हों लेकिन उनकी आवाज, उनके भाषण, उनकी बोट यात्रा जैसे कार्यक्रम पूरे देश भर में दिख रहे हैं।

भाजपा इसलिए भी डर रही है क्योंकि उसे पता है कि अभी पहले चरण के चुनाव में वक्त है और राजनीति में एक हफ्ता भी कम होता है। भाजपा जानती है कि पुलवामा से पहले वह एक बेहद मुश्किल चुनाव लड़ रही थी लेकिन बालाकोट पर हवाई हमले ने उसका चुनावी तरकश राष्ट्रवाद के तीरों से भर दिया है। पहले दो ही तीर थे...किसानों को 6 हजार और सामान्य वर्ग को 10 फीसदी आरक्षण का... लेकिन वह भी जानती थी कि इनके भरोसे चुनाव लड़ा तो जा सकता है लेकिन जीतने की कोई गारंटी नहीं है। एक तड़का चाहिए था वह मिला राष्ट्रवाद से। पुलवामा के बाद हुए तमाम सर्वे बता रहे हैं कि पाकिस्तान पर हमले के बाद भाजपा के खाते में 20-25 सीटें ज्यादा आती दिख रही हैं यानी वह यू.पी. में संभावित नुक्सान की भरपाई करने में सफल हो रही है लेकिन भाजपा को डर है कि प्रियंका गांधी वाड्रा चुनावी रंग में भंग डाल सकती हैं। 

अखिलेश-माया चिंता में
भाजपा के साथ-साथ अखिलेश यादव और मायावती भी प्रियंका से डरे लगते हैं। यहां मायावती को डर ज्यादा है। कहा जाता है कि मायावती का वोट बैंक तो ट्रांसफर हो जाता है लेकिन जरूरी नहीं है कि अखिलेश यादव का यादव वोट बैंक भी ट्रांसफर हो। माना जा रहा है कि भले ही यादव मायावती को वोट न दे लेकिन वह भाजपा को तो बिल्कुल नहीं देगा। अब कहीं ऐसा न हो कि यादव कांग्रेस को वोट दे दे। मायावती को डर लग रहा है कि यदि प्रियंका ने यू.पी. में कांग्रेस को जिंदा कर दिया तो कहीं मुस्लिमों को न लगने लगे कि कांग्रेस ही सीट निकाल सकती है, लिहाजा मुस्लिम वोट भी कांग्रेस को न मिल जाए। ऐसा हुआ तो मायावती का खेल बिगड़ सकता है। यह डर मायावती को सता रहा है, अखिलेश को सता रहा है और कहीं-कहीं भाजपा को भी डरा रहा है। 

अपने नेताओं पर भरोसा करे भाजपा
लेकिन बड़ा सवाल उठता है कि क्या भाजपा को प्रियंका से डरना चाहिए। डरना तो नहीं लेकिन सावधान जरूर रहना चाहिए। पप्पू-पप्पी जैसी टिप्पणियों से तो बिल्कुल ही बचना चाहिए। प्रियंका को नजरअंदाज नहीं कर सकते, यह बात भाजपा समझ गई है लेकिन व्यक्तिगत हमलों से नुक्सान भी हो सकता है। आखिर 5 सालों में रॉबर्ट वाड्रा पर आरोप लग रहे हैं लेकिन क्यों कुछ नहीं हुआ। चाहे राजस्थान में हो या हरियाणा में लेकिन यहां भाजपा के पक्ष में यह बात जाती है कि जांच एजैंसियों को जो नए कागज मिल रहे हैं, उन्हें किसी अदालत ने खारिज नहीं किया है।

भाजपा को अपने मोदी, अपनी सुषमा स्वराज, अपनी स्मृति ईरानी पर भरोसा करना चाहिए। ये नेता जब भाषण देने निकलेंगे तो जनता को राष्ट्रवाद से भटकने नहीं देंगे। सबसे बड़ी बात है कि मोदी सरकार का दावा है कि उसने 22 करोड़ लोगों को इस या उस योजना के तहत लाभ पहुंचाया है। चाहे मुद्रा योजना हो या फिर उज्ज्वला या फिर आवास योजना। अब अगर 22 करोड़ लाभार्थी और साथ में 11 करोड़ भाजपा के खुद के कार्यकत्र्ता हों तो फिर इन 33 करोड़ देवी-देवता रूपी वोटरों के सहारे भाजपा सत्ता में आ ही सकती है। आखिर पिछले चुनावों में तो 17 करोड़ वोट हासिल करके ही भाजपा को 282 सीटें मिल गई थीं।

लेख की शुरूआत में बशीर बद्र का शे’र बताया था जो प्रियंका गांधी भाजपा के लिए कह रही हैं...तू इधर- उधर की न बात कर, तू यह बता कि कारवां क्यों लुटा, हमें रहजनों से गर्ज नहीं, तेरी रहबरी का सवाल है। भाजपा इस पर पलट कर कांग्रेस की प्रियंका से पूछ सकती है...मैं बताऊं कि कारवां क्यों लुटा, तेरा रहजनों से था वास्ता, हमें रहजनों से गिला नहीं, तेरी रहबरी पे मलाल है।-विजय विद्रोही

Related Stories:

RELATED वाराणसी: प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ चुनाव नहीं लड़ेंगी प्रियंका गांधी