नजरिया: नीतीश का सियासी योग

नेशनल डेस्क ( संजीव शर्मा ):  वीरवार को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर पूरा देश योग करता नजर आया। लद्दाख की बर्फीली वादियों से बीच समंदर तक सब जगह से योगरत खास -ओ -आम की तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब सुर्ख रहीं। लेकिन इस सबके बीच भी अपने नीतीश बाबू (बिहार में नीतीश कुमार को जनता यही कहती है  ) फिर से हेडलाइंस बना गए। पाटलीपुत्र परिसर के योग सेशन में नीतीश कुमार की गैर मौजूदगी चर्चा का विषय रही। हालांकि योग तो किरण खेर ने भी नहीं किया। समारोह में जाकर भी वे योग करती नहीं दिखीं, लेकिन जब सियासी योग बन बिगड़ रहे हों तो किरण खेर को कौन पूछे। इसलिए नीतीश कुमार पर ही फोकस फिक्स हो गया। 


तमाम कलम घिस्सू इसे अपने अपने  हिसाब से वांच रहे हैं,जबकि एक हकीकत यह भी है कि यह पहलीबार नहीं यही कि नीतीश ने योग दिवस समारोह से दूरी बनाई हो। वे लगातार चौथी बार योग दिवस पर योग करने नहीं आये। इस लिहाज से इसे सामान्य तौर भी लिया जा सकता था। लेकिन चूकि पहले योग दिवस को लेकर नीतीश ने उस समय जो कहा था (तब वे मोदी संग नहीं थे ) उसी के चलते हर बार उनकी अनुपस्थिति में कारण ढूंढें जाते हैं। बहरहाल इस बार वे मोदी के पाले में भी हैं। लालू को गुडबाय कहने के बाद वे फिर से एनडीए में हैं। इसके बावजूद वे अपनी ही सरकार के योग दिवस समारोह में नहीं आये। 

 यही नहीं उनकी पार्टी के कैबिनेट मंत्रियों में से भी किसी ने इस समारोह में शिरकत नहीं की। यही वो खास वजह है जिसपर अब कई कथाएं वांची जा रही हैं। दिलचस्प ढंग से इस बार नीतीश का यह कदम सोचा समझा सियासी मूव है। दरअसल एनडीए में आने के बाद जेडीयू की नजऱ अब लोकसभा के सीट बंटवारे पर है। पिछले लोकसभा चुनाव परिणामों को देखें तो जेडीयू के पास महज दो सीटें हैं। उससे ज्यादा सीटें तो उपेंद्र कुशवाहा की समता पार्टी ले गई थी। 
उधर लोक जनशक्ति पार्टी के पास भी छह सीटें हैं, जबकि कुल 40  में से अकेले बीजेपी के पास 22 सांसद हैं। उस चुनाव में मोदी लहर ने जेडीयू  (2 ) कांग्रेस (2 )और लालू(4 ) इन सबको 8 सीट पर सीमित कर दिया था। ऐसे में अगर पिछले लोकसभा  चुनाव में प्रदर्शन का पैमाना  लगाया गया तो निश्चित तौर पर नीतीश को घाटा होगा। हालांकि विधानसभा के लिहाज से भी जेडीयू कोई बड़ा दल नहीं है। उसके पास 243 में से महज 70  सीटें हैं। बीजेपी के पास 53 , एलजेपी और आरएसपी के पास दो दो सीट हैं। दिलचस्प ढंग से लालू की पार्टी 81 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल है।   यही वजह है कि जेडीयू और नीतीश अपना मोल भाव बढ़ाने के लिए ऐसी चाल चल रहे हैं। जेडीयू के सभी मंत्रियों का भी एकमुश्त भाव से योग दिवस से दूरी बनाना तो कम से कम यही दर्शाता है कि  एनडीए में जाने के बाद जेडीयू अब अपनी पोजीशन को लेकर चिंता में है। 
झुकने को तैयार नहीं बीजेपी 
सूत्रों की मानें तो नीतीश की इन कलाबाजियों को बीजेपी खूब समझती है। लेकिन इसके बावजूद मोदी-शाह की जोड़ी झुकने के मूड में नहीं है।  अगर 6 -दीनदयाल उपाध्याय मार्ग से आ रही खबरों पर भरोसा करें तो बीजेपी नीतीश को पासवान से भी कम सीटें देने की पक्षधर है। बीजेपी नहीं चाहती कि जेडीयू को ज्यादा शक्तिमान बनाया जाए। उसकी नीति यही है कि नीतीश से कहा जाए कि आप बिहार में राज करो लेकिन दिल्ली का गणित हमें  तय करने दो। अब देखना यह है कि इसपर नीतीश का क्या रुख रहता है। वैसे लालू का साथ छोडऩे के बाद एक तरह से महागठबंधन के रास्ते नीतीश के लिए बंद माने जा रहे हैं। ऐसे में यह संभव है कि नीतीश की इसी मजबूरी का लाभ बीजेपी उठा जाए।  

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