10 बाइ 10 की झोपड़ी और 2 जोड़ी कुर्ता-पाजामा में जीवन बिता रहे हैं रघुराम राजन के गुरु

नई दिल्ली: जिस व्यक्ति ने आईआईटी दिल्ली से इंजीनियरिंग की हो और अमेरिका की मसहूर ह्यूस्टन यूनिवर्सिटी से पीचएडी की हो और फिर आईआईटी दिल्ली में प्रोफेसर रहे तो उस व्यक्ति के बारे में हर कोई यही कहेगा कि शानौ शोकत की जिंदगी जी रहा होगा। लेकिन मामला इससे बिल्कुल विपरीत है, दिल्ली आईआईटी के प्रोफेसर और अमेरिका की प्रसिद्ध ह्यूसटन यूनिवर्सिटी से पीएचडी करने वाला शख्स 29 साल से वनवासियों के बीच स्वयं वनवासी बनकर जीवन जी रहा है। आलोक सागर नाम का ये शख्स आई आई टी में प्रोफेसर रहने के दौरान भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन का शिक्षक भी रहा।



कायदे से तो इतने बड़े प्रोफाइल के बाद प्रोफेसर आलोक सागर को ऐशो आराम की जिंदगी बितानी चाहिए थी। पर पिछले 29 सालों से सागर मध्यप्रदेश के बीहड़ों में समाज की सेवा में लगे हैं। इस्तीफा देने के बाद आलोक ने बेतूल और होशंगाबाद जैसे आदिवासी और पिछड़े इलाके में रहकर काम करना शुरू किया। यहां के लोग बुनियादी सुविधाओं से अभी कोसों दूर हैं। इस क्षेत्र में सिर्फ एक प्राइमरी स्कूल है।



इलाके में आलोक सागर ने 50,000 से ज्यादा पेड़ लगाए हैं। सागर ने एक अंग्रेजी अखबार को बताया कि लोग अगर चाहें तो जमीनी स्तर पर काम करके देश की सूरत बदल सकते हैं। पर आज लोग अपनी डिग्रियों की प्रदर्शनी लगाकर अपनी बुद्धिमता दिखाने में ज्यादा ध्यान देते हैं।



आलोक सागर मूल रूप से दिल्ली के रहने वाले है। आलोक ने यहीं से साल 1973 में आई आई टी दिल्ली से इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री हासिल की। आलोक ने 1977 में अमेरिका के टेक्सास की ह्यूस्टन यूनिवर्सिटी से पीएचडी किया। पीएचडी के बाद दो साल अमेरिका में नौकरी भी की लेकिन उनका मन नहीं लगा। साल 1980-81 में आलोक भारत लौट आए। और आई आई टी दिल्ली में ही पढ़ाने लगे। इस दौरान रघुराम राजन भी उनके छात्र रहे।



आलोक सागर के पास कुल कमाई में तीन कुर्ता और एक साइकिल है। उनके पास जमापूंजी के नाम पर 10 बाइ 10 की झोपड़ी 3 जोड़ी कुर्ते और एक साइकिल है। वे जिस घर में रह रहे हैं, उसमें दरवाजे तक नहीं हैं। एक संभ्रान्त परिवार से ताल्लुक रखने वाले आलोक सागर के छोटे भाई आज भी आईआईटी में प्रोफेसर हैं। उनकी मां मिरंडा हाउस में फिजिक्स की प्रोफेसर थीं और पिता इंडियन रेवेन्यू सर्विस में अधिकारी थे। आलोक का दिन बीजों को जमा करने और आदिवासियों के बीच उसे बांटने में बीतता है तथा श्रमिक आदिवासी संगठन से जुड़े हैं । आलोक कई आदिवासी भाषाएं जानते हैं।


 

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