‘मोदी को और कितना वक्त चाहिए?’

लोकसभा चुनाव से पहले असहमति और हताशा के स्वरों ने ओडिशा के शांत माहौल में भूचाल ला दिया था। किसी समय मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के नजदीकी रहे बैजयंत जय पांडा को आखिरकार भाजपा में शामिल कर लिया गया, जिसे पार्टी द्वारा काफी समय तक इंतजार करवाया गया।

पिछले सप्ताह ढेंकनाल लोकसभा क्षेत्र से 4 बार सांसद रहे तथागत सतपथी ने राजनीति से संन्यास की घोषणा कर दी। 63 वर्षीय सतपथी के पास पटनायक को खुश करने के लिए सब कुछ था: पारिवारिक पृष्ठभूमि (वह ओडिशा के मूल सत्ताधारी दम्पति देवेन्द्र और नंदिनी सतपथी के वंशज हैं), बीजद के प्रति वफादारी तथा समलैंगिकता और नशे पर संसद में उनके विचारों व गृह क्षेत्र में अपनी मातृ भाषा के बीच संतुलन बनाए रखने की उनकी क्षमता। 

मुख्यमंत्री से तालमेल
राजनीति छोडऩे पर मुख्यमंत्री ने उन्हें रोकने का कोई प्रयास नहीं किया। सतपथी बताते हैं : ‘‘मैं उनसे मिला और उनका धन्यवाद किया। उन्होंने मुझे रोकने की कोशिश नहीं की।’’ क्या यह इस बात का इशारा है कि पटनायक इस बार उन्हें टिकट नहीं देना चाहते थे। सतपथी का कहना है कि ऐसा नहीं है। ‘‘उनका व्यवहार मेरे प्रति इतना अच्छा रहा है कि उन्होंने ढेंकनाल में कभी भी मेरा विकल्प तैयार करने की कोशिश नहीं की और न ही मेरे समानांतर कोई सिस्टम खड़ा किया। इसलिए मैं मानता हूं कि उनका मुझे किनारे करने का कोई इरादा नहीं था।’’

क्षेत्रीय मीडिया ने इस बात की ओर इशारा करते हुए खबरें छापी हैं कि सतपथी अपनी पत्नी अध्याशा के लिए टिकट चाहते थे जबकि सतपथी का कहना है कि उनकी पत्नी की राजनीति में कोई रुचि नहीं है। पांडा की तरह भाजपा में जाने के सवाल पर वह कहते हैं कि किसी अन्य पार्टी में जाने का उनका कोई इरादा नहीं है। वह बीजद के साथ शुरू से जुड़े रहे हैं।

पत्रकारिता में लौटेंगे
सतपथी पहले ओडिशा गण परिषद से जुड़े हुए थे जोकि एक गैर-राजनीतिक संगठन है। बाद में यह संगठन राजनीतिक दल में परिवर्तित हो गया तथा इसने कांग्रेस के साथ मिलकर काम किया। सतपथी की मां नंदिनी कांग्रेस पार्टी में रही हैं लेकिन वह अपनी मां की तरह इस पुरानी पार्टी में नहीं गए। 2000 में जब पटनायक मुख्यमंत्री चुने गए तब सतपथी ने अपने उडिय़ा दैनिक समाचारपत्र ‘धारित्री’ के माध्यम से सरकारी नीतियों की समीक्षा की। 2004 के संसदीय चुनावों से पहले पटनायक उनसे मिले तथा सतपथी के पिता की सीट ढेंकनाल से उनको टिकट दिया। लेकिन अब सतपथी एक ऐसे दौर में धारित्री समाचार पत्र की ओर लौटने की योजना बना रहे हैं जब बहुत से पत्रकार राजनीति में आने के लिए लालायित हैं।

कई मामलों में भिन्न मत रखने वाले सतपथी को बीजद संसदीय दल का मुख्य सचेतक बनाया गया था। धारित्री में प्रकाशित हस्ताक्षरित सम्पादकीय कई बार पटनायक सरकार की नीतियों के प्रति आलोचनात्मक होते थे जिससे उनके कई दोस्तों ने यह अंदाजा लगाया कि वह पार्टी छोडऩा चाहते हैं क्योंकि नवीन पटनायक ऐेसे मामलों में काफी क्रूर हैं। सभी जानते हैं कि पटनायक के खिलाफ विद्रोह करने वाले राज्यसभा सांसद प्यारे मोहन मोहपात्रा को जलील करके पार्टी से निकाल दिया गया था।

भीड़ से अलग है सोच
सतपथी काफी सतर्क व्यक्ति हैं तथा पटनायक के साथ मामलों को उन्होंने हमेशा विवेकपूर्ण तरीके से सुलझा लिया। सतपथी का कहना है, ‘‘मैंने कभी नेता के साथ झगड़ा नहीं किया, मैंने कभी उनके या पार्टी के खिलाफ बात नहीं की। हस्ताक्षरित सम्पादकीय सरकार की नीतियों के खिलाफ थे न कि नेता के खिलाफ।’’ सतपथी स्वीकार करते हैं कि मोदी सरकार के प्रति गोल-मोल रवैया अपनाने के लिए उन्होंने पार्टी की निंदा की थी।

सतपथी का कहना है कि कुछ ऐसे कानून हैं जो किसी समय सामाजिक तौर पर प्रासंगिक थे लेकिन अब उनका महत्व नहीं रह गया है। समलैंगिकता के खिलाफ कानून को समाप्त करने की जरूरत थी। अब जबकि वह संसद को छोडऩे जा रहे हैं उनको एकमात्र मलाल इस बात का है कि मार्च 2017 में उनके द्वारा पेश किया गया प्राइवेट मैम्बर बिल पास नहीं हो सका। इस बिल का नाम था ‘राइट टू प्रोटैक्शन ऑफ स्पीच एंड रैपूटेशन बिल’। एक मीडिया कर्मी होने के नाते सतपथी को इस बात की चिंता है कि अब उन्हें कुछ सीमाओं के भीतर काम करना पड़ेगा। ‘‘वह लोकतंत्र लोकतंत्र नहीं है जहां मीडिया वह काम न कर सके जिसकी उससे उम्मीद की जाती है। ओडिशा और देश में लगाए गए प्रतिबंध उचित नहीं हैं। मुख्यमंत्री द्वारा काफी हद तक मीडिया को नियंत्रित किया जा रहा है।’’ और आखिर में राजनीति में ‘बूढ़े आदमियों’ पर निशाना। ‘मैंने कहा हर चीज की एक हद होती है।’

इसकी व्याख्या करते हुए सतपथी कहते हैं ‘‘पांच, छ:, सात कार्यकाल, प्रधानमंत्री मोदी को कितना समय चाहिए? वह तीन बार मुख्यमंत्री रहे हैं तथा एक बार प्रधानमंत्री का कार्यकाल पूरा करने जा रहे हैं। पटनायक 5 बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं। अब उन्हें नौजवानों के लिए रास्ता छोड़ देना चाहिए क्योंकि 2020 तक भारत की 80 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु वर्ग के लोगों की होगी।’’-राधा आर.

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