हमारे ‘बेरोजगार’ नेताओं के पास इतनी सम्पत्ति कैसे

पैसा प्रदूषित और भ्रष्ट राजनीतिक घोड़ी को दौड़ाता है और कैसे? वर्तमान में चल रही ग्रेट इंडियन राजनीतिक सर्कस अगले महीने लोकसभा चुनावों के साथ शुरू होगी और जिसमें राजनीतिक दल बड़े-बड़े वायदे कर रहे हैं और पैसा बटोर रहे हैं क्योंकि पैसे बनाने का यही सही समय है। किन्तु इस मामले में उच्चतम न्यायालय रंग में भंग डाल सकता है।

पिछले सप्ताह न्यायालय ने सरकार से पूछा है कि उसने चुनावी प्रक्रिया को स्वच्छ बनाने के लिए फरवरी के अंत तक न्यायालय द्वारा दिए गए कुछ महत्वपूर्ण सुझावों को लागू क्यों नहीं किया जिसमें निर्वाचित कानून निर्माताओं की संपत्ति की निगरानी और जांच के लिए स्थायी तंत्र का निर्माण, संपत्ति के बारे में सूचना को सार्वजनिक न करना, भ्रष्ट मानना और सभी उम्मीदवारों को अपनी अयोग्यता के बारे में जानकारी को सार्वजनिक करना जरूरी है।

न्यायालय के समक्ष ये प्रमाण थे कि 2009 और 2014 के चुनावों के बीच लोकसभा के 26 तथा राज्यसभा के 11 सांसदों तथा 257 विधायकों की आय और संपत्ति में 500 से लेकर 1200 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है और इसका उल्लेख उन्होंने अपने चुनावी शपथ पत्र में भी किया था जो इस बात का संकेत है कि उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग किया है। इससे चिंतित उच्चतम न्यायालय ने सभी उम्मीदवारों के लिए अनिवार्य कर दिया है कि वे अपने पति-पत्नी तथा आश्रित बच्चों की आय के स्रोत को सार्वजनिक करेंगे और साथ ही सरकारी ठेकों में अपनी हिस्सेदारी या हितों को भी प्रकट करेंगे। संसद और निर्वाचन आयोग द्वारा इस समस्या पर ध्यान न देने के लिए उनकी खिंचाई करते हुए न्यायालय ने हैरानी व्यक्त की है कि कार्यपालिका को निर्वाचन नियमों में संशोधन करने से किसने रोका है जिसमें आय से अधिक संपत्ति जुटाने को चुनाव लडऩे के लिए अयोग्य घोषित करने के साथ-साथ दंडनीय अपराध भी घोषित किया जाए।

सांसदों की सम्पत्ति में भारी वृद्धि
यह सच है कि सरकार ने फार्म 26 में बदलाव किया है ताकि जो उम्मीदवार अपना नामांकन पत्र दायर कर रहे हैं, वे अपने पति-पत्नी और आश्रित बच्चों की आय की घोषणा करें। उम्मीदवारों के लिए किसी ठेके में हिस्सेदारी को प्रकट करने हेतु अनिवार्य किया गया है। किन्तु यह लोगों की आंख में धूल झोंकने जैसा है। केन्द्र ने अभी कानून में यह संशोधन नहीं किया है कि यदि कोई उम्मीदवार किसी ऐसे व्यावसायिक प्रतिष्ठान में हिस्सेदारी या हित रखता है जिसका सरकारी कम्पनी से लेन-देन हो तो उसे पद धारण करने से अयोग्य घोषित किया जाए और निर्वाचन आयोग ने भी इसका समर्थन किया है।

प्रश्न उठता है कि एक बेरोजगार जनसेवक भारी संपत्ति कैसे जुटाता है? क्या वे निजी व्यवसाय चला सकते हैं? यदि हां तो ऐसे पूर्वोद्दाहरण क्या हैं? यह राष्ट्रीय हित में है या अपने हित में है? क्या वे आय कर देते हैं? क्या कोई ऐसा कानून या नियम है कि उनसे पूछा जाए कि उन्होंने यह संपत्ति कैसे अर्जित की है? स्विट्जरलैंड और अन्य देशों में रखे गए काले धन का क्या है? अब तक किसी भी नेता के विदेशी खाते के बारे में पता नहीं चला है।

इस मामले में एक कांग्रेसी सांसद का मामला उल्लेखनीय है जिसकी संपत्ति 2004 में 9.6 करोड़ थी और 2009 तक वह 299 करोड़ तक पहुंच गई अर्थात उसमें 3000 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 4 सांसदों की आय में 1200 प्रतिशत, 22 की संपत्ति में 500 प्रतिशत की वृद्धि हुई और राज्यसभा के 8 सांसदों की संपत्ति में 200 प्रतिशत की वृद्धि हुई जबकि वे कहते हैं कि उनके पास कोई रोजगार नहीं है फिर भी 58 प्रतिशत करोड़पति हैं जिनकी संपत्ति 5 करोड़ से अधिक की है। असम के एक विधायक ने अपनी संपित्त में 2011 के विधानसभा चुनावों के बाद 5000 प्रतिशत और केरल के एक विधायक ने 1700 प्रतिशत वृद्धि की घोषणा की है।

एक नेता ने सरकारी सेवा की घोषणा की है और अपनी वाॢषक आय 3 करोड़ रुपए बताई है। किस सरकारी सेवा में 3 करोड़ रुपए मिलते हैं? लोकसभा के 542 सांसदों में से 113 ने अपने व्यवसाय को राजनीति, छोटे-मोटे कार्य, गृहिणी आदि बताया है। इसलिए ऐसे युग में जहां पर सार्वजनिक मामलों से निजी लाभ और निजी संपत्ति जोड़ी जाती है और उसके लिए सत्ता का दुरुपयोग किया जाता है ऐसे में संपत्ति में वृद्धि होना कोई हैरानी की बात नहीं।

चुनाव आयोग उठा रहा कदम
निर्वाचन आयोग उम्मीदवारों द्वारा अपनी संपत्ति के विवरण में विसंगतियों को सार्वजनिक करने की दिशा में कदम उठा रहा है और हाल ही में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मिजोरम और तेलंगाना विधानसभा चुनावों में मैदान में उतरे उम्मीदवारों की संपत्ति के विवरणों की जांच की जा रही है।

निर्वाचन आयोग केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड और आयकर महानिदेशक (जांच) के सहयोग से यह स्पष्ट करेगा कि किन उम्मीदवारों के शपथ पत्र में विसंगति पाई गई। तथापि निर्वाचन आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार ऐसा करना आसान नहीं है। उसके लिए निर्वाचन आयोग को अधिक शक्तियां देनी होंगी। आयोग को उम्मीदवारों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करने की शक्ति दी जानी चाहिए जिनकी पांच वर्ष की अवधि के दौरान संपत्ति में बेतहाशा वृद्धि हुई है और साथ ही उस पर निगरानी रखने के लिए एक विशेष प्रकोष्ठ भी बनाया जाना चाहिए। संपत्ति के बाजार मूल्य की जांच के लिए रीयल एस्टेट परामर्शदाताओं  की सेवाएं ली जा सकती हैं साथ ही आय कर विवरणी दाखिल करना भी अनिवार्य बनाया जाए।

उम्मीदवारों के आपराधिक रिकार्ड का प्रचार हो
यही नहीं उच्चतम न्यायालय ने सरकार से यह भी पूछा है कि उसने पिछले वर्ष सितम्बर में दिए गए राजनीति के अपराधीकरण के बारे में दिए गए आदेश पर क्या कार्रवाई की। न्यायालय चाहता था कि उम्मीदवार अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि का ब्यौरा नामांकन पत्र में मोटे अक्षरों में दे जिसमें उसके विरुद्ध लंबित सभी आपराधिक मामलों का ब्यौरा हो और आयोग उम्मीदवार के इस ब्यौरे को अपनी वैबसाइट पर डालेगा ताकि मतदाता उम्मीदवार के बारे में अपनी राय बना सके। यही नहीं उम्मीदवार और पार्टी दोनों को उम्मीदवार की आपराधिक पृष्ठभूमि की घोषणा करनी होगी और ऐसे उम्मीदवारों के आपराधिक रिकार्ड का टी.वी. चैनलों पर व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए और नामांकन पत्र दाखिल करने के बाद कम से कम तीन बार उसका प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए ताकि लोकतांत्रिक प्रणाली में अपराधीकरण पर अंकुश लगे।

तथापि न्यायालय ने ऐसे उम्मीदवारों को चुनाव लडऩे से अयोग्य घोषित करने से इंकार कर दिया जिन पर गंभीर अपराधों के मुकद्दमे चल रहे हैं और न्यायालय ने संसद से आग्रह किया है कि वह इस बारे में एक कानून बनाए ताकि गंभीर अपराधों का सामना कर रहे उम्मीदवारों को चुनाव लडऩे से रोका जा सके। इसके अलावा राजनीतिक दलों को बलात्कार, हत्या, अपहरण जैसे जघन्य और गंदे अपराधों का सामना कर रहे उम्मीदवारों को टिकट नहीं देनी चाहिए किन्तु यह बहुत ही कठिन कार्य है क्योंकि चुनाव जीतने और हर कीमत पर चुनाव जीतने के लिए धन बल, बाहुबल महत्वपूर्ण कारक हैं। एक पूर्व निर्वाचन आयुक्त के अनुसार ‘‘विजेता कोई पाप नहीं कर सकता। एक बार सांसद या विधायक चुने जाने के बाद अपराधी के सारे अपराध धुल जाते हैं।

वर्तमान में केवल दोषसिद्ध अपराधियों को चुनाव लडऩे से प्रतिबंधित किया गया है। हैरानी की बात यह भी है कि सरकार ने उच्चतम न्यायालय में दिए गए एक शपथ पत्र में स्वीकार किया है कि सांसदों और विधायकों सहित 1765 से अधिक जन प्रतिनिधियों के विरुद्ध आपराधिक मामले चल रहे हैं और इस मामले में 11 राज्यों तथा दिल्ली में 12 विशेष अदालतों के गठन के बावजूद नेताओं के विरुद्ध मामले खिंचते जा रहे हैं। चुनाव हमारे लोकतंत्र के लिए आधारशिला है। अब हम अगले चुनाव की तैयारी कर रहे हैं। इसमें हमें उम्मीदवारों की स्वयं घोषित ईमानदारी और नैतिकता पर भरोसा नहीं करना चाहिए। लोकतंत्र में संप्रभुता की असली रक्षक जनता को राजनीति से गंदगी को समाप्त करने के लिए हरसंभव प्रयास करना चाहिए। हमारा देश छोटे आदमी की लंबी परछाई की अनुमति नहीं दे सकता क्योकि राष्ट्र को अपराधी और झूठ बोलने वाले नेताओं की भारी कीमत चुकानी पड़ती है।-पूनम आई. कौशिश

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