यहां पुजारी पिंजरे में बंद होकर देता है श्रद्धालुओं को प्रसाद, जानिए क्या है वजह (PICS)

ऊना (सुरेन्द्र शर्मा): अाज हम आपको एक मंदिर की अनोखी परंपरा के बारे में बताने जा रहे हैं जहां पुजारी पिंजरे में बंद होकर प्रसाद देता है। दरअसल ऊना के सघन वन क्षेत्र से घिरे इन मंदिर में बंदरों की बड़ी भारी तादाद है और यह न केवल श्रद्धालुओं को परेशान करते हैं बल्कि उनसे प्रसाद छीन लेते हैं। इसी लिए पुजारी को बंद पिंजरे में श्रद्धालुओं को प्रसाद देने के लिए मजबूर होना पड़ता है। करीब 5500 वर्ष पुराने इस तीर्थ स्थल की मान्यताओं के बारे में जानने के लिए हजारों श्रद्धालु यहां शिरकत करते हैं। तलमेहड़ा के सदाशिव मंदिर ध्योमेश्वर महादेव में मंदिर ट्रस्ट गौ अभ्यरण स्थापित करेगा। इस समय यहां 40 से अधिक गऊओं पर आधारित गौशाला संचालित की जा रही है। 
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मंदिर ट्रस्ट द्वारा गौशाला के विस्तार के लिए काम शुरू कर दिया गया है। इसके अतिरिक्त मंदिर में विस्तारीकरण योजना के तहत आसपास के क्षेत्र में भी सौंदर्यीकरण योजना शुरू की जाएगी। इनके द्वारा यहां चल रहे अटूट लंगर में अब आटोमैटिक चपाती मशीन के साथ-साथ इसे हाईटैक भी किया जा रहा है। जिला ऊना के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक तलमेहड़ा के सदाशिव मंदिर की विशेष धार्मिक मान्यता है कि पूरा वर्ष यहां लाखों की तादाद में श्रद्धालू नमन करने और भगवान शंकर की आराधना करने के लिए पहुंचते हैं। मान्यता है कि करीब 5500 वर्ष पहले महाभारत काल में पांडवों के पुरोहित श्री धौम्य ऋषि ने तीर्थ यात्रा करते हुए इसी ध्यूंसर नामक पर्वत पर शिव की तपस्या की थी। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर दर्शन देते हुए वर मांगने को कहा था जिस पर ऋषि ने वर मांगा कि इस पूरे क्षेत्र में आकर उनके द्वारा स्थापित किए गए ध्योमेश्वर शिव की पूजा करने वाले की मनोकामनाएं पूरी हों। मान्यताओं के मुताबिक भगवान शिव तथास्तु कह कर अंर्तध्यान हो गए थे।
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प्राचीन काल में स्थापित किए गए शिवलिंग को ध्यूंसर सदाशिव के नाम से जाना जाता है। किवदंतियों के मुताबिक श्री गंगा के तट पर तपस्या में लीन स्वामी ओंकारानंद गिरी को सन 1937 में स्वप्र में भगवान शिव ने दर्शन देते हुए इस स्थल के महत्व का ज्ञान करवाया था। इसके बाद मंदिर की खोज करते हुए ओंकारानंद गिरी जी ने 1947 में सनातन उच्च विद्यालय के तत्कालीन प्रधानाचार्य शिव प्रसाद शर्मा के सहयोग से मंदिर स्थल की खोज की और यहां विधिवत पूजा अर्चना शुरू कर दी। मंदिर के वर्तमान पुजारी उत्तराखंड के सिद्ध राज शास्त्री के मुताबिक 1948 में पहली बार जिला के इस सबसे ऊंचे स्थल पर मौजूद पवित्र शिवलिंग के स्थान पर शिवरात्री का आयोजन किया गया था। 
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1988 तक स्वामी ओंकारानंद गिरी जी इस मंदिर का संचालन करते रहे उनके उपरांत मंदिर समिति इसके प्रबंधों का जिम्मा संभाले हुए हैं। यहां करीब 5000 से अधिक क्षमता के लंगरहाल के साथ-साथ जगह-जगह श्रद्धालुओं के बैठने के लिए अच्छी व्यवस्था की गई है। जिला के सबसे खूबसूरत स्थलों में से एक तलमेहड़ा की पहाड़ी श्रंख्लाओं में से सबसे ऊंचे पहाड़ में से एक पर स्थित सदाशिव मंदिर से पूरे जिला का आलौकिक नजारा देखने को मिलता है। यूं तो पूरा वर्ष श्रद्धालु आते हैं लेकिन श्रावण माह में यहां श्रद्धालुओं की इतनी भीड़ उमड़ती है कि खड़े होने के लिए भी जगह नहीं बचती। अनेक श्रद्धालु यहां भंडारों का आयोजन करते हैं तो प्रत्येक रविवार रात्रि को यहां विशाल जागरण आयोजित किए जाते हैं जिसमें असंख्य श्रद्धालु भगवान शिव का गुणगान सुनते हैं।
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इस मंदिर में अब पॉलीथिन या उससे संबंधित किसी भी चीज का प्रयोग बंद कर दिया गया है। इसकी जगह इको-फ्रैंडली चीजों का प्रयोग किया जाएगा। प्रसाद के लिए भी एक मशीन मंगवाई जा रही है जो तिरुपति बाला जी मंदिर की तर्ज पर विशुद्ध रूप से कागज की पैकिंग में प्रसाद का वितरण करेगी। मंदिर समिति के पूर्व अध्यक्ष एवं वर्तमान ट्रस्ट के प्रमुख पदाधिकारी प्रवीण शर्मा कहते हैं कि ट्रस्ट न केवल श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं दे रहा है बल्कि मंदिर के सौंदर्यीकरण, गौशाला संचालन के साथ-साथ अटूट लंगर का भी संचालन कर रहा है। इस मंदिर की तरफ से जरूरतमंद लोगों के उपचार एवं दूसरे प्रकार की आर्थिक मदद भी दी जाती है। इसमें गरीबों को राशन और कन्याओं की शादी के लिए भी सहायता प्रदान की जाती है। पिछले कुछ वर्षों से मंदिर के चढ़ावे में काफी वृद्धि हुई है, इससे यहां सुविधाएं जुटाना और आसान हुआ है। 
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