हनुमान जयंती: कम ही लोग जानते हैं बजरंग बली से जुड़ी ये बातें

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वास्तव में देव आराधना व उपासना हमारे अतीत के धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक स्थितियों-परिस्थितियों के दर्पण हैं, जिनमें तात्कालिक समग्र जीवन दर्शन ढल जाता है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये चार पदार्थ ही मानव जीवन के लक्ष्य होते हैं। या तो स्वयं या किसी से प्रेरणा लेकर अथवा यह देख कर कि अमुक व्यक्ति को अमुक साधन से अमुक फल की प्राप्ति हुई, मनुष्य भी उसी ओर आकर्षित होता है। तब वह अपने विशेष संकल्प व उद्देश्य से किसी न किसी देवता की उपासना व अनुष्ठान में लग जाता है। वह सारी मनोकामनाएं व मनोरथ पूर्ण करने की क्षमता रखता है।

वह अचिन्ता शक्ति जिसके नाम पर आसन जमाता है वह उसका इष्ट देवता होता है। कलियुग में राम भक्त हनुमान जी की आराधना व उपासना शीघ्र तथा अधिकाधिक फलदायक सिद्ध हो चुकी है। 

जो अपने शीश पर अमूल्य मणियों से बने हुए सुंदर मुकुट को धारण किए हुए हैं।

जिनका शरीर सुवर्ण के विशाल पर्वत सा सुंदर और दीप्तिमान है।

जो अपने हाथ में चक्र, त्रिशूल तथा वज्र के समान अमोघ गदा को धारण किए हुए हैं।

जो अपने वज्र समान पैरों में सूर्य की दी हुई पादुका धारण किए हुए हैं।

जिनकी मोहक आंखों में दया तथा आशीर्वाद की किरणें प्रस्फुटित होती रहती हैं। जो अपने शरीर में सुंदर यज्ञोपवीत धारण किए हुए हैं।

जिनके अधरों की लाली प्रात:काल के सूर्य को भी लज्जित कर देती है।

जो अपने शरीर पर पीतवस्त्र किए हुए हैं।

जिनकी चामत्कारिक पूंछ आकाश में इंद्रधनुष की तरह शोभायमान होती है। 

जिनका नाम लेने मात्र से ही सभी बाधाओं का विनाश हो जाता है।

जिनके तेज से सम्पूर्ण सृष्टि प्रकाशित है।

जो अष्ट सिद्धियों तथा नव निधियों को देने वाले हैं।

जिनके हृदय में श्री रामचंद्र जी जगत जननी श्री सीता जी सहित विद्यमान हैं।

जिन्होंने नौ भांति से रक्षित रावण की स्वर्णपुरी लंका को जला कर राख बना डाला।

जिनकी माया से सुरसा, लंकिनी तथा जल प्रेत आदि चकरा गए।

जिन्होंने अहिरावण, अक्षय कुमार, कालनेमि आदि भयंकर राक्षसों का संहार किया।

ब्रह्मचर्य की साक्षात मूर्त, सिंदूरधारी, शंकर सुवन श्री हनुमान जी सारे विश्व में धर्म और मानवता की रक्षा करते रहें। ब्रह्मचर्य का पालन करना प्रत्येक मनुष्य का परम धर्म है। ब्रह्मचर्य का पालन करके ही श्री महावीर जी ने अनेकानेक अद्भुत कार्य किए।

एक सबल मित्र को चाहिए कि वह अपने निर्बल मित्र की रक्षा तथा सेवा का भार वहन करे। आपत्ति काल में ही सच्चे मित्र की परीक्षा होती है। महावीर जी ने सुग्रीव की यथासंभव सहायता करके उसे पम्पापुर का राजा बनाने में महान योगदान दिया था। अपनी शक्ति का उपयोग अच्छे कार्यों की सिद्धि के लिए करना चाहिए। परोपकार में चाहे अपने प्राणों की भी बाजी लगानी पड़े, वहां भी सतर्कता के साथ अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।

अधर्म पर चलने वाले लोगों की सहायता करना या उनके भय से चुप रहना दोनों ही महान पाप हैं। अत: मनुष्य का यह परम धर्म है कि रावण जैसे अत्याचारी लोगों की स्वर्णिम लंकापुरी जैसे वैभव को जलाने या नष्ट करने में अपनी बुद्धि तथा शक्ति दोनों का सदुपयोग करना चाहिए।

अपने आराध्य देव की रक्षा में तन, मन तथा धन की बाजी लगा देनी चाहिए। मनुष्य को चाहिए कि वह अपने धन तथा शक्ति का अभिमान न करे, क्योंकि ये दोनों ही नश्वर हैं। महान बल होते हुए भी भगवान श्री हनुमान जी के हृदय में अभिमान लेश मात्र भी नहीं था। मनुष्य को एक ही आराध्य देव को ध्यान में रखना चाहिए और उन्हीं के रूप में सभी देवताओं को देखना चाहिए।

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